पर्यावरण की रक्षा सामूहिक राष्ट्रीय और वैश्विक जिम्मेदारी: जस्टिस प्रकाश श्रीवास्तव
एनजीटी के अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन में बोले अध्यक्ष- जलवायु परिवर्तन बदल रहा पारिस्थितिकी तंत्र और मानव जीवन; 17 देशों के न्यायिक प्रतिनिधि कर रहे शिरकत

नई दिल्ली। नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) के अध्यक्ष जस्टिस प्रकाश श्रीवास्तव ने कहा कि पर्यावरण की रक्षा करना किसी एक संस्था, क्षेत्र या देश की जिम्मेदारी नहीं है, बल्कि यह एक सामूहिक राष्ट्रीय और वैश्विक जिम्मेदारी है। उन्होंने कहा कि पर्यावरणीय चुनौतियां देशों की सीमाओं को नहीं मानतीं, इसलिए इनसे निपटने के लिए राष्ट्रीय प्रयासों के साथ अंतरराष्ट्रीय सहयोग भी जरूरी है। जस्टिस श्रीवास्तव शनिवार को नई दिल्ली के विज्ञान भवन में एनजीटी द्वारा आयोजित दो दिवसीय अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन ‘द फ्यूचर ऑफ एनवायरनमेंट एंड क्लाइमेट डायनेमिक्स’ के उद्घाटन सत्र को संबोधित कर रहे थे। सम्मेलन का उद्घाटन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने किया। कार्यक्रम में भारत के मुख्य न्यायाधीश जस्टिस सूर्यकांत, केंद्रीय पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्री भूपेंद्र यादव, अटॉर्नी जनरल आर. वेंकटरमणी सहित कई गणमान्य व्यक्ति उपस्थित रहे। जस्टिस श्रीवास्तव ने प्रधानमंत्री मोदी के नेतृत्व में पर्यावरण संरक्षण की दिशा में उठाए गए कदमों का उल्लेख करते हुए स्वच्छ भारत मिशन, जल जीवन मिशन और अंतरराष्ट्रीय सौर गठबंधन जैसी पहलों की चर्चा की। उन्होंने कहा कि ऐसी पहलें भारत के पर्यावरण प्रबंधन और वैश्विक पर्यावरण सहयोग से जुड़े प्रयासों को दर्शाती हैं।
‘जलवायु परिवर्तन के सबसे गंभीर परिणाम कमजोर वर्ग झेल रहे’
जलवायु परिवर्तन पर चिंता जताते हुए जस्टिस श्रीवास्तव ने कहा कि दुनिया ऐसे दौर से गुजर रही है, जब जलवायु परिवर्तन पारिस्थितिकी तंत्र, अर्थव्यवस्था और मानव बस्तियों के स्वरूप को प्रभावित कर रहा है। सूखा और बाढ़ जैसी चरम मौसमी घटनाओं का असर गंभीर होता जा रहा है, जैव विविधता और प्राकृतिक संसाधनों पर दबाव बढ़ रहा है तथा प्रदूषण भौगोलिक सीमाओं से परे पहुंच रहा है। उन्होंने इस बात पर भी जोर दिया कि पर्यावरणीय क्षति का गंभीर असर अक्सर उन समुदायों पर पड़ता है, जिनका इस संकट को पैदा करने में योगदान सबसे कम रहा है। ऐसे में पर्यावरण संरक्षण को सामाजिक और पर्यावरणीय न्याय से अलग करके नहीं देखा जा सकता। उन्होंने सवाल उठाया कि वर्तमान पीढ़ी आने वाली पीढ़ियों के लिए कैसा ग्रह छोड़कर जाएगी और उनके भविष्य की सुरक्षा के लिए आज किस तरह के कानूनी, संस्थागत और सामाजिक कदम उठाए जाने चाहिए।
17 देशों के न्यायिक प्रतिनिधियों की भागीदारी
दो दिवसीय सम्मेलन में भारत सहित विदेशों से न्यायाधीश, पर्यावरण विशेषज्ञ, वरिष्ठ सरकारी अधिकारी और विभिन्न संस्थाओं के प्रतिनिधि हिस्सा ले रहे हैं। आधिकारिक जानकारी के मुताबिक सम्मेलन में 17 देशों के न्यायिक प्रतिनिधियों की भागीदारी है। इसका उद्देश्य विभिन्न देशों के न्यायिक दृष्टिकोण, वैज्ञानिक ज्ञान, पर्यावरणीय शासन की पद्धतियों और संस्थागत अनुभवों का आदान-प्रदान करना है। सम्मेलन में पर्यावरण और जलवायु से जुड़े मुद्दों पर अलग-अलग तकनीकी सत्र आयोजित किए जा रहे हैं। इनमें ‘क्लाइमेट जस्टिस, इक्विटी एंड इंक्लूजन: फ्रॉम प्रिंसिपल्स टू एक्शन’, ‘द फ्यूचर ऑफ एनवायरनमेंटल लॉ एंड गवर्नेंस’ और वैश्विक पर्यावरणीय चुनौतियों एवं सहयोग जैसे विषय शामिल हैं। एनजीटी के आधिकारिक सम्मेलन कार्यक्रम में जलवायु न्याय, पर्यावरण कानून एवं शासन, वैश्विक पर्यावरणीय चुनौतियों तथा भविष्य के लिए वन संरक्षण जैसे विषयों को तकनीकी सत्रों में शामिल किया गया है। जस्टिस श्रीवास्तव ने कहा कि सम्मेलन की चर्चा केवल सिद्धांतों तक सीमित नहीं रहनी चाहिए, बल्कि उससे व्यावहारिक कार्रवाई और सार्थक वैश्विक सहयोग की दिशा निकलनी चाहिए। उनके मुताबिक पर्यावरण की रक्षा अंततः लोगों, न्याय और पृथ्वी के भविष्य से जुड़ा विषय है और लक्ष्य ऐसा भविष्य बनाना होना चाहिए जिसमें विकास टिकाऊ, पर्यावरणीय शासन जवाबदेह और पृथ्वी आने वाली पीढ़ियों के लिए स्वस्थ तथा रहने योग्य बनी रहे।
