सरकारी डॉक्टरों की निजी प्रैक्टिस पर सख्ती की तैयारी, सभी के लिए एक जैसे होंगे नियम
स्वास्थ्य विभाग और मेडिकल कॉलेज के डॉक्टरों के लिए अलग-अलग नियमों पर सवाल, नई व्यवस्था में बढ़ सकती है निगरानी

भोपाल, मध्य प्रदेश। लोक स्वास्थ्य एवं चिकित्सा शिक्षा विभाग के एकीकरण को करीब दो वर्ष हो चुके हैं, लेकिन सरकारी डॉक्टरों की निजी प्रैक्टिस को लेकर अब भी अलग-अलग नियम लागू हैं। इसे लेकर पूर्व स्वास्थ्य विभाग के डॉक्टरों में नाराजगी है। अब सरकार विभाग के अंतर्गत आने वाले सभी डॉक्टरों के लिए निजी प्रैक्टिस के नियम एक समान करने के साथ उन पर सख्ती करने की तैयारी में है। पूर्व स्वास्थ्य विभाग के डॉक्टरों के लिए निजी प्रैक्टिस की शर्तें अपेक्षाकृत कठिन हैं। वे अपने घर में उपचार से संबंधित कोई लाइसेंसी उपकरण नहीं रख सकते। उदाहरण के तौर पर डेंटिस्ट को बिना डेंटल चेयर के ही उपचार करना पड़ता है। उन्हें निजी अस्पतालों में प्रैक्टिस की अनुमति भी नहीं है। इसके विपरीत मेडिकल कॉलेजों के डॉक्टर यानी फैकल्टी डीन से अनुमति लेकर निजी अस्पतालों में प्रैक्टिस कर सकते हैं और उन्हें सर्जरी करने की भी अनुमति है। रीवा के शासकीय मेडिकल कॉलेज से संबद्ध अस्पताल में बीते माह एक प्रसूता की मृत्यु के बाद सरकार डॉक्टरों की निजी प्रैक्टिस को लेकर सख्ती करने की तैयारी में है। इसके साथ ही विभाग के अंतर्गत आने वाले सभी डॉक्टरों के लिए प्रैक्टिस के नियम एक समान किए जाने की तैयारी है। मेडिकल कॉलेजों के डॉक्टरों के लिए भी निजी प्रैक्टिस को लेकर कई नियम निर्धारित हैं। वे अपने क्लीनिक में सोनोग्राफी मशीन और डेंटल चेयर सहित कुछ उपकरण नहीं रख सकते, लेकिन इन नियमों का पालन नहीं होने की शिकायतें सामने आती रही हैं। पैथोलॉजी और माइक्रोबायोलॉजी विभाग के कुछ फैकल्टी सदस्यों द्वारा घरों में लैब संचालित किए जाने की बात भी सामने आई है। इसी तरह कई निजी नर्सिंग होम में शासकीय मेडिकल कॉलेजों के डॉक्टरों के नाम प्रदर्शित होने के बावजूद संबंधित कॉलेजों के स्तर पर प्रभावी निगरानी नहीं होने के सवाल उठ रहे हैं। नियम के अनुसार निजी अस्पताल से मेडिकल कॉलेज के डॉक्टर को होने वाली आय का 25 प्रतिशत संबंधित कॉलेज में जमा कराना होता है, लेकिन इसके पालन को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं। अब निजी प्रैक्टिस के नियमों में एकरूपता लाने के साथ निगरानी व्यवस्था कड़ी किए जाने की तैयारी है, जिससे स्वास्थ्य विभाग और मेडिकल कॉलेजों के डॉक्टरों के लिए अलग-अलग व्यवस्था समाप्त की जा सके।
