
मुंबई। बॉम्बे हाई कोर्ट ने रेलवे सुरक्षा बल (आरपीएफ़) के एक कांस्टेबल को सेवा से हटाने के फैसले को सही ठहराते हुए स्पष्ट किया कि यात्रियों की सुरक्षा की जिम्मेदारी निभाने वाले बल से इस प्रकार के आचरण की कोई गुंजाइश नहीं हो सकती। अदालत ने कहा कि ऐसा व्यवहार जनता के भरोसे को कमजोर करता है और इसे किसी भी हाल में बर्दाश्त नहीं किया जा सकता। न्यायमूर्ति भारती डांगरे और मंजूषा देशपांडे की खंडपीठ ने कांस्टेबल राजेश जांगिड़ की याचिका खारिज कर दी, जिसमें उसने विभागीय जांच के बाद 14 अगस्त 2018 को दी गई सेवा समाप्ति की सजा को चुनौती दी थी। इस निर्णय को पहले ही अपील और पुनर्विचार में बरकरार रखा जा चुका था। मामले के अनुसार, 18 जून 2018 को ड्यूटी समाप्त होने के बाद कांस्टेबल रेलवे प्लेटफॉर्म पर एक महिला के बगल में बैठा था। घटना का वीडियो क्लिप वायरल हुआ, जिसमें दोनों के बीच कहासुनी और एक अन्य व्यक्ति द्वारा कांस्टेबल को थप्पड़ मारते हुए देखा गया। हालांकि महिला या किसी अन्य व्यक्ति की ओर से औपचारिक शिकायत दर्ज नहीं कराई गई थी, लेकिन सीसीटीवी फुटेज और वीडियो साक्ष्य रिकॉर्ड पर मौजूद थे। याचिकाकर्ता ने तर्क दिया कि शिकायत के अभाव में अनुशासनात्मक कार्रवाई अधिकार क्षेत्र से बाहर थी और उसका कृत्य अनजाने में हुआ। लेकिन अदालत ने इस दलील को खारिज करते हुए कहा कि रेलवे सुरक्षा बल नियम, 1987 के तहत शिकायत के बिना भी अनुशासनात्मक जांच शुरू की जा सकती है। अदालत ने कहा कि उपलब्ध वीडियो और सीसीटीवी साक्ष्यों से स्पष्ट है कि आरोपी का कृत्य अनजाने में नहीं था, बल्कि वह महिला की गरिमा को ठेस पहुंचाने वाला “घिनौना” और “अनैतिक” व्यवहार था। कोर्ट ने यह भी माना कि आरोपी को सभी सबूत उपलब्ध कराए गए थे और उसे अपनी बात रखने का पूरा अवसर दिया गया। सजा को अनुपातहीन बताने की दलील को खारिज करते हुए हाई कोर्ट ने कहा कि दुराचार की गंभीरता को देखते हुए सेवा से हटाने की सजा पूरी तरह उचित है। अदालत ने जोर देकर कहा कि एक अनुशासित बल के सदस्य से इस प्रकार की हरकत न केवल अस्वीकार्य है, बल्कि यह पूरी व्यवस्था की साख को भी नुकसान पहुंचाती है।




