मुंबई-अहमदाबाद हाईवे पर पलटा दूध का टैंकर, मदद से पहले बाल्टी लेकर दौड़ी भीड़
सड़क पर बहने लगा दूध तो बाल्टी, डिब्बे और कैन लेकर पहुंचे लोग; हादसे के बीच दूध समेटने की होड़ ने खड़े किए संवेदनशीलता पर सवाल

इंद्र यादव/मुंबई। मुंबई-अहमदाबाद राष्ट्रीय राजमार्ग पर दूध से भरा अमूल का एक भारी-भरकम टैंकर अनियंत्रित होकर सड़क किनारे पलट गया। हादसे के बाद टैंकर से बड़ी मात्रा में दूध निकलकर सड़क पर बहने लगा और देखते ही देखते हाईवे का एक हिस्सा सफेद नजर आने लगा। लेकिन दुर्घटना के बाद सामने आया नजारा हादसे से ज्यादा लोगों के व्यवहार को लेकर चर्चा का विषय बन गया। सड़क पर दूध बहने की खबर मिलते ही आसपास के कई लोग बाल्टी, डिब्बे, केन और बोतलें लेकर मौके पर पहुंच गए और दूध समेटने की होड़ मच गई। कोई बाल्टी भरता दिखाई दिया तो कोई कैन और दूसरे बर्तनों में दूध जमा करने में जुटा रहा। हालांकि उपलब्ध जानकारी में टैंकर चालक की स्थिति या हादसे में किसी के घायल होने की स्पष्ट पुष्टि नहीं है, इसलिए यह कहना उचित नहीं होगा कि मौके पर मौजूद लोगों ने किसी घायल की मदद नहीं की, लेकिन दुर्घटनास्थल पर दूध भरने के लिए उमड़ी भीड़ की तस्वीरों ने संवेदनशीलता पर सवाल जरूर खड़े कर दिए हैं। किसी सड़क दुर्घटना के बाद पहली प्राथमिकता घायलों की मदद करना, पुलिस और एम्बुलेंस को सूचना देना तथा दुर्घटनास्थल को सुरक्षित रखने में सहयोग करना होना चाहिए, लेकिन यहां सड़क पर बहता दूध देखकर जिस तरह लोग बर्तन लेकर पहुंच गए, उसने आपदा में अवसर तलाशने की मानसिकता पर बहस छेड़ दी है। दुर्घटनाग्रस्त वाहन से निकला सामान मुफ्त या लावारिस नहीं हो जाता, वहीं सड़क पर बहा दूध धूल, गंदगी, ईंधन या अन्य दूषित पदार्थों के संपर्क में आने के कारण स्वास्थ्य के लिए भी खतरनाक हो सकता है। इस घटना की तस्वीर अपने आप में एक तीखा सवाल छोड़ती है—क्या दुर्घटना भी अब कुछ लोगों के लिए मुफ्त सामान हासिल करने का मौका बनती जा रही है? हादसा किसी के लिए मुसीबत होता है, तमाशा या ‘लॉटरी’ नहीं। सड़क पर दुर्घटनाग्रस्त वाहन देखकर सबसे पहले यह देखना जरूरी है कि किसी व्यक्ति को तत्काल सहायता की जरूरत तो नहीं है। मुंबई-अहमदाबाद हाईवे की इस घटना में सड़क पर बहते दूध से ज्यादा उसे बर्तनों में भरने के लिए उमड़ी भीड़ चर्चा में है और यह घटना एक बार फिर याद दिलाती है कि सड़क हादसे केवल यातायात नियमों की ही नहीं, बल्कि समाज की संवेदनशीलता की भी परीक्षा लेते हैं।
