भगवान विश्वकर्मा : देवशिल्पी, सृजन-कौशल के अधिष्ठाता

पत्रकार, लेखक, स्तंभकार — हेमेन्द्र क्षीरसागर
भारतीय संस्कृति में पर्व केवल उत्सव नहीं, बल्कि जीवन-दर्शन को समझने और उसे व्यवहार में उतारने के अवसर भी हैं। 17 सितंबर को मनाई जाने वाली भगवान विश्वकर्मा जयंती इसी व्यापक दृष्टि का प्रतीक है। भगवान विश्वकर्मा को देवशिल्पी, वास्तुकार और सृजन-कौशल के अधिष्ठाता के रूप में स्मरण किया जाता है। यह पर्व हमें बताता है कि निर्माण केवल ईंट-पत्थर जोड़ने का कार्य नहीं, बल्कि कल्पना, परिश्रम, कौशल और जिम्मेदारी के समन्वय का परिणाम है।
श्रम-संस्कृति का सम्मान
भारतीय परंपरा में भगवान विश्वकर्मा को दिव्य शिल्प एवं वास्तुकला का प्रतीक माना गया है। पौराणिक आख्यानों में उनके द्वारा दिव्य लोकों, भवनों और अस्त्र-शस्त्रों के निर्माण का उल्लेख मिलता है। इन कथाओं का यथार्थ संदेश यह है कि ज्ञान जब कौशल से जुड़ता है और कौशल जब श्रम से मिलता है, तभी सृजन संभव होता है। विश्वकर्मा जयंती इसी सृजन-शक्ति के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने का अवसर है। इस दिन औजारों, मशीनों, उपकरणों, कारखानों और कार्यस्थलों की पूजा की परंपरा केवल धार्मिक कर्मकांड नहीं है, बल्कि उस श्रम-संस्कृति का सम्मान है जिसके बल पर समाज और राष्ट्र आगे बढ़ता है।
कार्य के प्रति निष्ठा
आज जब सफलता को अक्सर केवल परिणाम और आर्थिक उपलब्धि से मापा जाता है, तब विश्वकर्मा जयंती हमें उस व्यक्ति की ओर देखने की प्रेरणा देती है जिसके हाथों से विकास की वास्तविक नींव तैयार होती है। कारीगर, बढ़ई, लोहार, मिस्त्री, इंजीनियर, तकनीशियन, शिल्पकार, मशीन ऑपरेटर और निर्माण श्रमिक। ये सभी आधुनिक भारत के सृजनकर्ता हैं। किसी भी राष्ट्र की प्रगति केवल नीतियों और योजनाओं से नहीं होती। उसके पीछे लाखों हाथों का परिश्रम, तकनीकी दक्षता और कार्य के प्रति निष्ठा होती है।
जिम्मेदारी का संकल्प
विश्वकर्मा जयंती पर मशीनों और औजारों की पूजा करना हमारी परंपरा है, लेकिन इस परंपरा का वास्तविक अर्थ तभी पूरा होगा जब हम अपने कार्य के प्रति ईमानदारी, गुणवत्ता और जिम्मेदारी का संकल्प लें। पूजा के साथ यह विचार भी होना चाहिए कि औजार पवित्र हैं तो उनसे किया जाने वाला काम भी उत्कृष्ट होना चाहिए। कार्यस्थल सुरक्षित हों, श्रमिकों को उचित सम्मान मिले, तकनीक का उपयोग मानव हित में हो।
आत्मनिर्भरता की ओर
भारत के सामने आज रोजगार के साथ-साथ रोजगार देने वाली युवा शक्ति तैयार करने की चुनौती भी है। कौशल विकास, स्थानीय शिल्प, छोटे उद्योग, कुटीर उद्योग और तकनीकी प्रशिक्षण को बढ़ावा देकर युवाओं को आत्मनिर्भर बनाया जा सकता है। विश्वकर्मा जयंती इस दिशा में सामाजिक चेतना का अवसर भी बन सकती है। हुनर को सम्मान, हुनरमंद को अवसर और नवाचार को प्रोत्साहन। ये तीन सूत्र भारत की आर्थिक और सामाजिक शक्ति को नई गति दे सकते हैं।
लोककल्याण का भाव
भगवान विश्वकर्मा जयंती हमें केवल देवशिल्पी की पूजा करने का अवसर नहीं देती, बल्कि सृजन, श्रम, कौशल, तकनीक और जिम्मेदारी के प्रति अपनी दृष्टि को परिष्कृत करने का संदेश देती है। आज आवश्यकता ऐसे भारत के निर्माण की है जहां हाथ का हुनर और आधुनिक तकनीक एक-दूसरे के पूरक बनें। जहां श्रमिक केवल श्रमशक्ति नहीं, बल्कि राष्ट्र निर्माण का सम्मानित सहभागी हो। जहां हर निर्माण में गुणवत्ता, सुरक्षा तथा लोककल्याण का भाव हो।
