जंतर-मंतर पर प्रदर्शन की मान्यता खत्म करने पर भड़के कपिल सिब्बल, बोले— देश में विरोध करना भी अपराध बन गया है

मोदी सरकार पर लोकतांत्रिक अधिकारों को दबाने का आरोप, कहा— विरोध प्रदर्शन मौलिक अधिकार है, सुप्रीम कोर्ट से अधिकारों की रक्षा की उम्मीद
नई दिल्ली। दिल्ली के जंतर-मंतर को विरोध-प्रदर्शन के लिए निर्धारित स्थल के रूप में मिली मान्यता समाप्त किए जाने के फैसले पर राज्यसभा सांसद और वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने केंद्र की मोदी सरकार की कड़ी आलोचना की है। शनिवार को आयोजित एक ऑनलाइन प्रेस कॉन्फ्रेंस में उन्होंने आरोप लगाया कि देश में ऐसी परिस्थितियां पैदा हो गई हैं, जहां विरोध करना भी अपराध माना जाने लगा है। उन्होंने उम्मीद जताई कि सुप्रीम कोर्ट नागरिकों के शांतिपूर्ण विरोध-प्रदर्शन के संवैधानिक अधिकार की रक्षा करेगा। सिब्बल ने कहा कि लोकतंत्र में नागरिकों को सरकार की नीतियों और फैसलों के खिलाफ शांतिपूर्ण तरीके से अपनी आवाज उठाने का अधिकार है। उन्होंने आरोप लगाया कि मौजूदा सरकार इस अधिकार को सीमित करने का प्रयास कर रही है। उन्होंने कहा, “हम आज ऐसी स्थिति में हैं, जहां विरोध करना एक अपराध बन गया है। दूसरे शब्दों में कहें तो विरोध करने का अधिकार ही अपराध बन गया है, जबकि हमारे देश में विरोध करना एक मौलिक अधिकार है।”
जंतर-मंतर की जगह रामलीला मैदान क्यों जाएं प्रदर्शनकारी?
जंतर-मंतर को विरोध-प्रदर्शन के लिए निर्धारित स्थल की मान्यता समाप्त करने के फैसले पर सवाल उठाते हुए सिब्बल ने कहा कि प्रदर्शनकारियों को रामलीला मैदान जाने के लिए कहा जा रहा है, जबकि दशहरा जैसे आयोजनों के दौरान वहां प्रदर्शन करना संभव नहीं होता। उन्होंने सवाल किया कि जब राजधानी में जंतर-मंतर जैसा स्थान पहले से उपलब्ध था, तो उसकी मान्यता समाप्त करने की आवश्यकता क्यों पड़ी? सिब्बल ने कहा कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में विरोध करने के लिए ऐसे स्थान उपलब्ध होने चाहिए, जहां नागरिक अपनी बात प्रभावी ढंग से सरकार और संबंधित संस्थाओं तक पहुंचा सकें।
हिंसा के लिए बाहरी लोगों को ठहराया जिम्मेदार
जंतर-मंतर पर पूर्व में हुए विरोध-प्रदर्शनों का उल्लेख करते हुए सिब्बल ने दावा किया कि हिंसा प्रदर्शनकारियों के कारण नहीं, बल्कि बाहरी लोगों की वजह से हुई थी। उन्होंने आरोप लगाया कि प्रदर्शन स्थल पर बिना किसी स्पष्ट कारण के पत्थरों से भरा एक ट्रक लाया गया था। उनके अनुसार, कुछ अज्ञात व्यक्तियों और सादे कपड़ों में मौजूद पुलिसकर्मियों ने हिंसा की। सिब्बल ने यह भी आरोप लगाया कि प्रदर्शनकारियों को घसीटा गया, उन पर लाठीचार्ज किया गया और महिलाओं के साथ मारपीट हुई। हालांकि, इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है। उन्होंने कहा कि विरोध-प्रदर्शनों के दौरान परिवहन सेवाओं पर भी पाबंदियां लगाई गईं। उनके मुताबिक, मेट्रो सेवाएं रोकने और दिल्ली आने वाली ट्रेनों पर प्रतिबंध लगाने जैसे कदमों से प्रदर्शनकारियों की आवाजाही प्रभावित हुई।
विदेशों में लोकतंत्र की बात, देश में विरोध पर पाबंदी क्यों?
सिब्बल ने न्यूयॉर्क, लंदन और पेरिस जैसे शहरों का उदाहरण देते हुए कहा कि दुनिया के कई प्रमुख शहरों में सरकारी संस्थानों के आसपास शांतिपूर्ण विरोध-प्रदर्शन के लिए स्थान उपलब्ध हैं। उन्होंने केंद्र सरकार पर निशाना साधते हुए कहा कि विदेशों में भारत की लोकतांत्रिक परंपराओं, विविधता और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का उल्लेख किया जाता है, लेकिन देश के भीतर विरोध की आवाज को दबाने का प्रयास हो रहा है। सिब्बल ने चेतावनी भरे अंदाज में कहा कि यदि लोगों की असहमति व्यक्त करने के रास्ते लगातार सीमित किए गए, तो सामाजिक असंतोष बढ़ सकता है। उन्होंने स्थिति की तुलना ‘प्रेशर कुकर’ से करते हुए इसके लिए सरकार को जिम्मेदार ठहराया।
संविधान के अनुच्छेद 19 का दिया हवाला
वरिष्ठ अधिवक्ता सिब्बल ने संविधान के अनुच्छेद 19 का उल्लेख करते हुए कहा कि नागरिकों को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और शांतिपूर्ण सभा करने का अधिकार प्राप्त है। हालांकि, राज्य की सुरक्षा और सार्वजनिक व्यवस्था जैसे आधारों पर कानून के अनुसार उचित प्रतिबंध लगाए जा सकते हैं। उन्होंने दावा किया कि जंतर-मंतर पर पहले भी शांतिपूर्ण प्रदर्शन हुए हैं और 10 अक्टूबर को प्रस्तावित ‘जंतर-मंतर 2.0’ प्रदर्शन भी शांतिपूर्ण रहता। सिब्बल ने राहुल गांधी और विपक्षी ‘इंडिया’ गठबंधन के सहयोगियों द्वारा सुप्रीम कोर्ट की ओर निकाले गए मार्च का उल्लेख करते हुए कहा कि वह प्रदर्शन भी बिना हिंसा के संपन्न हुआ था। उन्होंने सवाल किया कि विरोध करने वाले युवाओं के साथ अलग व्यवहार क्यों किया जा रहा है और शांतिपूर्ण प्रदर्शनों से सरकार को किस प्रकार का खतरा हो सकता है।
बेरोजगारी और आर्थिक हालात को लेकर भी सरकार पर निशाना
सिब्बल ने केंद्र सरकार की आर्थिक नीतियों की आलोचना करते हुए दावा किया कि बेरोजगारी, आर्थिक संकट और सार्वजनिक निवेश में कमी के कारण लोगों का सरकार पर भरोसा कमजोर हुआ है। उन्होंने कहा कि जनता की समस्याओं को सुनने और उनके समाधान की दिशा में कदम उठाने के बजाय विरोध की आवाज को सीमित करना लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए उचित नहीं है। सिब्बल ने राजनीतिक टिप्पणी करते हुए कहा कि मौजूदा सरकार जितनी जल्दी सत्ता से हटेगी, उनके अनुसार देश के लिए उतना ही बेहतर होगा। उन्होंने भरोसा जताया कि सुप्रीम कोर्ट नागरिकों के संवैधानिक अधिकारों की रक्षा सुनिश्चित करेगा। फिलहाल जंतर-मंतर पर प्रदर्शन की मान्यता समाप्त किए जाने के फैसले को लेकर उनके आरोपों और आपत्तियों पर केंद्र सरकार का पक्ष इस बयान में सामने नहीं आया है।
