बालाघाट का दशहरा: जब साकार होते हैं श्रीराम और महावीर

“तपस्या से मुकुट तक, सात दशक से अधिक पुरानी परंपरा आज भी जीवित”

हेमेन्द्र क्षीरसागर
मां दुर्गा और प्रभु श्रीराम की असीम कृपा से मध्यप्रदेश के हृदयस्थल बालाघाट में विगत 64 वर्षों से महावीर सेवादल समिति द्वारा दशहरा पर्व पर अनूठे चल समारोह की परंपरा निभाई जा रही है। यह आयोजन केवल धार्मिक उत्सव नहीं, बल्कि आस्था, साधना और लोकसंस्कृति का ऐसा संगम है‌। जिसने बालाघाट के दशहरे को विशिष्ट पहचान दी है। चल समारोह में भगवान श्रीराम की शोभायात्रा के साथ महावीर अर्थात रामभक्त हनुमान का स्वरूप धारण किए साधक नगर भ्रमण करते हैं। लगभग 40 किलो वजनी मुकुट सिर पर धारण किए साधक के पीछे उनकी सेना जय भवानी, जय श्रीराम और जयवीर महावीर के जयघोष के साथ आगे बढ़ती है। नगर की सड़कों के दोनों ओर हजारों श्रद्धालु दर्शन के लिए उमड़ते हैं। उस समय का दृश्य ऐसा प्रतीत होता है, मानो कुछ क्षणों के लिए पवनपुत्र हनुमान स्वयं धरती पर अवतरित हो गए हों।
नैनन देखी रामलीला
स्तुत्य, हनुमान स्वरूप धारण करना केवल धार्मिक वेशभूषा धारण करना नहीं, बल्कि कठोर साधना और संयम की प्रक्रिया है। प्रतिवर्ष सैकड़ों युवा इसके लिए अपनी इच्छा व्यक्त करते हैं, लेकिन समिति द्वारा किसी एक साधक का चयन किया जाता है। चयन के बाद वह साधक निर्धारित अवधि तक ब्रह्मचर्य का पालन करते हुए स्वयं को प्रभु आराधना में समर्पित करता है। परंपरा के अनुसार साधक लगभग 40 दिनों तक सांसारिक जीवन से विरत रहकर मंदिर में साधना करता है। व्रत रखता है। सीमित आहार ग्रहण करता है, भूमि पर शयन करता है। राम नाम का जाप करते हुए स्वयं को हनुमान स्वरूप धारण करने के लिए तैयार करता है। दशहरा से एक दिन पूर्व मुकुट धारण कर नगर का अर्द्धभ्रमण और दशहरे के दिन मुख्य चल समारोह में नगर परिक्रमा इस साधना का प्रमुख हिस्सा है। श्रद्धालुओं के लिए यह क्षण आस्था का चरम होता है। मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम और संकटमोचक हनुमान के स्वरूप का यह साक्षात दर्शन मानो नैनन देखी रामलीला का अनुभव करा देता है।
पानीपत से जुड़ी परंपरा
आलोकित, हनुमान स्वरूप धारण कर नगर परिक्रमा की यह परंपरा केवल बालाघाट तक सीमित नहीं है। हरियाणा के पानीपत में भी इसकी एक पुरानी और समृद्ध परंपरा रही है। जिसकी कड़ी अविभाजित भारत के उस क्षेत्र से जुड़ती है, जो आज पाकिस्तान में है। परंपरागत विवरणों के अनुसार, मुजफ्फरगढ़ के लय्या क्षेत्र में लगभग आठ दशक पहले श्री गुरु प्यारालाल झाम्ब के मार्गदर्शन में नवरात्र के दौरान हनुमान स्वरूप धारण कर नगर परिक्रमा की शुरुआत हुई थी। वर्ष 1941 में श्री गुरु प्यारालाल झाम्ब और श्री ढालूराम द्वारा हनुमान सभा का गठन किए जाने। हनुमान स्वरूप के लिए विशेष मुकुट तैयार किए जाने का उल्लेख मिलता है।
विभाजन के समय मुकुट भारत ले आए
बेला में भगत दुलीचंद महाराज, जो गुरु प्यारालाल झाम्ब के शिष्य थे, ने वहां वर्षों तक हनुमान स्वरूप धारण कर नगर परिक्रमा की। भारत विभाजन के समय वे हनुमान जी का मुकुट अपने साथ भारत ले आए। कठिन परिस्थितियों के बावजूद उन्होंने उसे अपनी आस्था का प्रतीक मानकर सुरक्षित रखा और पानीपत पहुंचे। विभाजन के बाद पानीपत में उन्होंने नवरात्र के दौरान हनुमान स्वरूप धारण कर नगर परिक्रमा की परंपरा को पुनः आरंभ किया। उनके शिष्यों किशनलाल दीवान, मोहनलाल, लुधिनचंद दीवान, अथरचंद दीवान और नोताराम चावला सहित अनेक श्रद्धालुओं ने इसे आगे बढ़ाया। समय के साथ यह परंपरा पानीपत और देश के अन्य शहरों तक भी पहुंची। इसी व्यापक धार्मिक-सांस्कृतिक परंपरा की एक महत्वपूर्ण कड़ी बालाघाट में दिखाई देती है। जहां महावीर सेवादल समिति ने इसे सात दशकों से अधिक समय से श्रद्धा और अनुशासन के साथ जीवित रखा है।
सेवा और समर्पण की पीढ़ियां
अद्भुत, ऐसी परंपराएं केवल साधक की तपस्या से नहीं, बल्कि अनेक समर्पित सेवादारों के योगदान से पीढ़ी-दर-पीढ़ी जीवित रहती हैं। भगत दुलीचंद महाराज के सुपुत्र स्वर्गीय चरणजीत चावला और कालूराम चावला ने लंबे समय तक सभा में प्रमुख सेवादार के रूप में योगदान दिया। वेदप्रकाश गांधी भी सभा की स्थापना से लगातार अपनी सेवाएं देते रहे हैं। वर्तमान में भगत दुलीचंद महाराज के पौत्र संजय महाराज सभा के प्रमुख सेवादारों में हैं। उनके भ्राता हरीश महाराज (सोनू) और रमेश नारंग भी इस धार्मिक परंपरा के संचालन में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं। सभा का संकल्प इस विरासत को आने वाली पीढ़ियों तक उसी श्रद्धा और अनुशासन के साथ पहुंचाना है।
अनूठी परंपरा की शक्ति
अभिभूत, बालाघाट का दशहरा चल समारोह आज एक धार्मिक आयोजन से कहीं आगे बढ़कर जिले की सांस्कृतिक पहचान बन चुका है। आधुनिकता के दौर में जब अनेक पारंपरिक आयोजन अपना मूल स्वरूप खोते जा रहे हैं। तब यहां की यह परंपरा आस्था और लोकसंस्कृति को जीवंत बनाए हुए है। हनुमान स्वरूप धारण करने वाले साधक की तपस्या, श्रीराम की शोभायात्रा, जयघोष करते श्रद्धालु और दर्शन के लिए उमड़ता जनसमुदाय सब मिलकर दशहरे को एक ऐसे आध्यात्मिक अनुभव में बदल देते हैं। जिसे केवल देखा नहीं, महसूस किया जाता है। बालाघाट का दशहरा इसलिए विशिष्ट है कि यहां रावण दहन के साथ मर्यादा, भक्ति, शक्ति और समर्पण की जीवंत परंपरा भी दिखाई देती है। श्रीराम आदर्श का संदेश देते हैं और महावीर हनुमान सेवा, साहस तथा समर्पण का। यही इस अनूठी परंपरा की सबसे बड़ी शक्ति है।

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