रंग, कद-काठी और घुंघराले बाल देखकर मान लिया ईसाई, हाई कोर्ट ने रद्द किया आदेश
कस्टम विभाग के असिस्टेंट कमिश्नर के एससी प्रमाणपत्र का मामला, मद्रास हाई कोर्ट ने सतर्कता समिति को 8 सप्ताह में दोबारा जांच पूरी करने का दिया निर्देश

चेन्नई। किसी व्यक्ति का रंग, लंबाई, शारीरिक बनावट, घुंघराले बाल और उसके तमिल-अंग्रेजी बोलने की क्षमता क्या उसका धर्म तय कर सकती है? अनुसूचित जाति प्रमाणपत्र से जुड़े एक मामले में जिला सतर्कता समिति ने कुछ इसी तरह के आधारों पर एक अधिकारी को ईसाई मान लिया था। अब मद्रास हाई कोर्ट ने समिति के इस आदेश को रद्द करते हुए जाति प्रमाणपत्र की नए सिरे से जांच करने का निर्देश दिया है। मामला तिरुवन्नामलाई निवासी रविकुमार से जुड़ा है, जो अनुसूचित जाति के लिए आरक्षण के आधार पर कस्टम विभाग में असिस्टेंट कमिश्नर के पद पर कार्यरत थे। पिछले वर्ष मई में उनकी सेवानिवृत्ति के आसपास उनके जाति प्रमाणपत्र की जांच शुरू हुई थी। जांच के बाद जिला सतर्कता समिति ने रविकुमार के जाति प्रमाणपत्र पर सवाल उठाते हुए उसे वास्तविक नहीं माना। समिति के आदेश में रविकुमार और उनके परिवार के रंग, लंबे कद, शारीरिक बनावट और घुंघराले बालों जैसी विशेषताओं का उल्लेख किया गया था। उनके तमिल और अंग्रेजी बोलने को भी आधारों में शामिल करते हुए उनके ईसाई होने का निष्कर्ष निकाला गया। समिति के इस फैसले को रविकुमार ने मद्रास हाई कोर्ट में चुनौती दी। उन्होंने अदालत से कस्टम विभाग को समिति के आदेश के आधार पर उनके खिलाफ कार्रवाई करने से रोकने की मांग की। मामले की सुनवाई करते हुए न्यायमूर्ति टी. भरत चक्रवर्ती ने पाया कि रविकुमार के पिता ने वर्ष 1960 में ईसाई धर्म अपनाया था, लेकिन बाद में उन्होंने दोबारा हिंदू धर्म अपना लिया था और संबंधित हिंदू समुदाय ने उन्हें स्वीकार भी कर लिया था। अदालत ने इन परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए जिला सतर्कता समिति के उस आदेश को रद्द कर दिया, जिसमें रविकुमार को ईसाई मानते हुए उनके अनुसूचित जाति प्रमाणपत्र की वैधता पर प्रतिकूल निष्कर्ष निकाला गया था। हाई कोर्ट ने जिला सतर्कता समिति को रविकुमार के जाति प्रमाणपत्र की दोबारा जांच करने और आठ सप्ताह के भीतर कानून के अनुसार नया आदेश पारित कर प्रक्रिया पूरी करने का निर्देश दिया है। यह मामला इसलिए भी चर्चा में आया क्योंकि समिति ने धर्म और जाति की पहचान के लिए व्यक्ति की शारीरिक विशेषताओं और भाषा बोलने जैसी बातों को आधार बनाया था, जिन्हें हाई कोर्ट के समक्ष चुनौती दी गई।
