गणेश चतुर्थी: आस्था, विवेक और समरसता का संकल्प

पत्रकार, लेखक व स्तंभकार:- हेमेन्द्र क्षीरसागर
गणेश चतुर्थी केवल भगवान गणेश की पूजा-अर्चना का पर्व नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति में ज्ञान, विवेक, शुभारंभ और सामाजिक समरसता का संदेश देने वाला महत्वपूर्ण उत्सव है। विघ्नहर्ता, मंगलकर्ता और बुद्धि-विवेक के देवता भगवान गणेश की आराधना के साथ यह पर्व हमें जीवन में सकारात्मकता, अनुशासन और सद्बुद्धि अपनाने की प्रेरणा देता है। भारतीय परंपरा में किसी भी शुभ कार्य से पहले गणेशजी का स्मरण किया जाता है। इसके पीछे गहरा जीवन-दर्शन छिपा है। गणेशजी का विशाल मस्तक अधिक सोचने, बड़े कान ध्यानपूर्वक सुनने, छोटी आंखें एकाग्रता रखने और उनका वाहन मूषक सूक्ष्म से सूक्ष्म विषय पर ध्यान देने का संदेश देता है। अर्थात गणेश आराधना केवल धार्मिक कर्मकांड नहीं, बल्कि बेहतर जीवन जीने की कला भी है। गणेशोत्सव का सामाजिक पक्ष भी अत्यंत महत्वपूर्ण है। सार्वजनिक गणेशोत्सव लोगों को एक स्थान पर एकत्र करता है और समाज में सहयोग, सहभागिता तथा भाईचारे की भावना मजबूत करता है। मोहल्लों, गांवों और नगरों में आयोजित होने वाले कार्यक्रम नई पीढ़ी को अपनी संस्कृति और परंपराओं से जोड़ने का माध्यम बनते हैं। यही कारण है कि गणेशोत्सव धार्मिक आस्था के साथ सामाजिक चेतना का भी पर्व बन गया है। इतिहास की दृष्टि से सार्वजनिक गणेशोत्सव को व्यापक जनभागीदारी से जोड़ने में लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक की महत्वपूर्ण भूमिका रही। उन्होंने गणेशोत्सव को सामाजिक एकजुटता और राष्ट्रीय चेतना के मंच के रूप में विकसित किया। इस परंपरा ने आगे चलकर समाज को संगठित करने में महत्वपूर्ण योगदान दिया। आज जब पर्यावरण संरक्षण पूरी दुनिया की आवश्यकता बन चुका है, तब गणेशोत्सव मनाने के तरीके पर भी विचार करना जरूरी है। हमारी आस्था प्रकृति के प्रति संवेदनशीलता के साथ आगे बढ़े, यही भारतीय संस्कृति की मूल भावना है। इसलिए मिट्टी से बनी पर्यावरण-अनुकूल प्रतिमाओं को प्राथमिकता देना, प्राकृतिक रंगों का उपयोग करना, अनावश्यक प्लास्टिक से बचना और विसर्जन के लिए निर्धारित कृत्रिम कुंडों का उपयोग करना समय की आवश्यकता है। उत्सव की भव्यता केवल बड़े पंडाल, तेज ध्वनि और महंगे आयोजनों से तय नहीं होनी चाहिए। वास्तविक भव्यता तब होगी, जब गणेशोत्सव किसी जरूरतमंद के चेहरे पर मुस्कान लाए, बच्चों को शिक्षा की प्रेरणा दे, स्वच्छता का संदेश फैलाए और समाज में सेवा एवं सद्भाव की भावना मजबूत करे। गणेशजी को प्रथम पूज्य कहा जाता है। शायद इसलिए कि किसी भी शुभ शुरुआत से पहले हमें विवेक, संयम और सकारात्मक सोच को स्थान देना चाहिए। आज आवश्यकता है कि हम गणेशोत्सव को केवल उत्सव न मानकर स्वच्छता, पर्यावरण, सेवा और सामाजिक समरसता का संकल्प पर्व बनाएं। आइए, इस गणेश चतुर्थी भगवान गणेश से केवल अपने व्यक्तिगत सुख-समृद्धि की प्रार्थना न करें, बल्कि ऐसा समाज बनाने का संकल्प लें जिसमें ज्ञान हो, विवेक हो, प्रकृति के प्रति सम्मान हो और हर व्यक्ति के जीवन में मंगल का प्रकाश हो। गणपति बप्पा मोरया! मंगलमूर्ति मोरया!
