महाराष्ट्र में पहली बार ‘चारा विकास नीति’ को मंजूरी, डेयरी और पशुपालन को मिलेगा उद्योग का स्वरूप
सूखा प्रभावित क्षेत्रों में चारे की कमी दूर करने पर जोर, कम पानी में चारा उत्पादन से लेकर हाइड्रोपोनिक तकनीक तक को मिलेगा बढ़ावा

मुंबई। महाराष्ट्र में दुग्ध व्यवसाय और पशुपालन को बढ़ावा देने के लिए राज्य सरकार ने पहली बार ‘महाराष्ट्र चारा विकास नीति’ लागू करने का निर्णय लिया है। मंगलवार को मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस की अध्यक्षता में हुई मंत्रिमंडल की बैठक में इस नीति को मंजूरी दी गई। नई नीति के माध्यम से राज्य में पशुधन के लिए आवश्यक चारे की उपलब्धता सुनिश्चित करने के साथ डेयरी और पशुपालन जैसे कृषि पूरक व्यवसायों को उद्योग का स्वरूप देने पर जोर दिया जाएगा। नई नीति में जिलावार चारा उत्पादन, खेती योग्य घास की प्रजातियां, चारे के लिए उपयोगी वृक्ष, उन्नत चारा फसलें तथा पारंपरिक और गैर-पारंपरिक चारा स्रोतों को शामिल किया गया है। इसके साथ ही सरकार की विभिन्न चारा विकास योजनाओं के बेहतर नियोजन पर भी जोर दिया जाएगा। राज्य में वर्ष 2026 के खरीफ मौसम के दौरान 265 तालुकों में ट्रिगर-1 लागू किया गया है। इन तालुकों सहित राज्य के अन्य कमी वाले क्षेत्रों में पशुओं के लिए चारे की उपलब्धता सुनिश्चित करने में नई नीति महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगी। ‘विकसित महाराष्ट्र 2047’ कार्यक्रम में पशु चारा और पशु आहार से संबंधित उपायों को भी शामिल किया गया है। सरकार का प्रयास है कि दुग्ध व्यवसाय और पशुपालन केवल कृषि के पूरक व्यवसाय तक सीमित न रहें, बल्कि इन्हें उद्योग के रूप में विकसित किया जाए। राज्य में पशुधन की संख्या, उपलब्ध चारे और चारे की कमी का अध्ययन कर उपाय सुझाने के लिए सरकार ने राज्यस्तरीय टास्क फोर्स का गठन किया था। इस टास्क फोर्स ने चारे की कमी दूर करने के लिए अल्पकालीन और दीर्घकालीन उपायों की सिफारिश की है। नई नीति के तहत सरकारी बंजर भूमि, चरागाह और अन्य उपलब्ध सरकारी जमीन का इस्तेमाल चारा उत्पादन के लिए करने पर जोर दिया जाएगा। चरागाहों में उन्नत घास और दलहनी चारा प्रजातियों की खेती को प्रोत्साहित किया जाएगा। हॉर्टी-पाश्चर पद्धति के तहत फल बागानों में दो पेड़ों के बीच खाली जगह पर चारा फसलों की खेती की जाएगी। इससे एक ही जमीन से किसानों को दोहरा लाभ प्राप्त करने का अवसर मिलेगा। इसी तरह सिल्वी-पाश्चर पद्धति के तहत बंजर, पथरीली और पहाड़ी जमीन पर सुबाभूल, अंजन और सहजन जैसे चारा देने वाले पेड़ों के साथ बहुवर्षीय घास लगाई जाएगी। खेतों की मेड़, बांध, तालाबों के किनारे, घरों के आसपास की खाली जमीन, जलमार्ग तथा खेती के लिए अनुपयुक्त जमीन पर गिनी घास, सिग्नल घास और स्टायलो घास लगाने को भी बढ़ावा दिया जाएगा। उपलब्ध चारे की गुणवत्ता बढ़ाने के लिए मुरघास, यूरिया प्रक्रिया, कपास की फसल के बेकार अवशेषों पर ओजोन प्रक्रिया और एंजाइम प्रक्रिया जैसी तकनीकों का इस्तेमाल किया जाएगा। चारे के उचित भंडारण के लिए हे बेल्स, फीड ब्लॉक, लीफ मील और कड़बा कुट्टी जैसी व्यवस्थाओं पर जोर रहेगा। वैकल्पिक चारा संसाधनों के रूप में अजोला, हाइड्रोपोनिक चारा उत्पादन और कांटारहित कैक्टस को बढ़ावा दिया जाएगा। इसके अलावा चारे की बर्बादी रोकने, चारा ग्राहक सेवा केंद्र स्थापित करने, सार्वजनिक-निजी भागीदारी के माध्यम से चारा विकास, विस्तार कार्यक्रम तथा संस्थागत बीज श्रृंखला विकसित करने की योजना है। नीति के अल्पकालीन लाभ के तहत वर्तमान सूखे जैसी परिस्थितियों से निपटने के लिए कम पानी में अधिक चारा उत्पादन पर जोर दिया जाएगा। उपलब्ध चारे की टिकाऊ क्षमता बढ़ाई जाएगी, जिससे आने वाले समय में चारा संकट वाले क्षेत्रों में जरूरत के मुताबिक आपूर्ति करना आसान हो सके। वहीं दीर्घकालीन लक्ष्य राज्य में पशुपालन व्यवसाय में उद्यमिता को बढ़ावा देना है। इसके लिए पशुपालकों की सबसे महत्वपूर्ण जरूरतों में शामिल चारे की पर्याप्त और नियमित उपलब्धता सुनिश्चित करने पर विशेष जोर दिया जाएगा।
