मुंबई की 1,200 बीएमसी स्कूलों के तीन लाख विद्यार्थियों की होगी आंखों की जांच
बाल दृष्टि’ अभियान के तहत अब तक 40,270 विद्यार्थियों की जांच, 361 को मिले चश्मे और चार बच्चों की हुई तिरछी आंखों की सर्जरी

मुंबई। स्कूल में ब्लैकबोर्ड स्पष्ट दिखाई नहीं देने के कारण पढ़ाई में पिछड़ने वाले विद्यार्थियों को समय पर नेत्र उपचार उपलब्ध कराने के उद्देश्य से बृहन्मुंबई महानगरपालिका (बीएमसी) और विजन फाउंडेशन ऑफ इंडिया ने संयुक्त रूप से ‘बाल दृष्टि’ अभियान शुरू किया है। मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस की पहल पर शुरू किए गए इस अभियान के तहत अगले तीन वर्षों में बीएमसी के 1,200 विद्यालयों के तीन लाख विद्यार्थियों की आंखों की जांच करने का लक्ष्य रखा गया है। ‘बाल दृष्टि’ अभियान मुख्य रूप से बच्चों में दृष्टिदोष की पहचान और उपचार पर केंद्रित है। यह अभियान आयुष्मान भारत के अंतर्गत स्कूल स्वास्थ्य एवं कल्याण कार्यक्रम से जुड़ा है। कई बार छोटे बच्चे अपनी आंखों से स्पष्ट दिखाई नहीं देने की समस्या बता नहीं पाते। ऐसे बच्चे ब्लैकबोर्ड के पास बैठने, पढ़ने से बचने या बोर्ड पर लिखी सामग्री धीरे-धीरे उतारने जैसे व्यवहार करने लगते हैं। अक्सर इसे पढ़ाई में लापरवाही समझ लिया जाता है, जबकि इसकी वजह आंखों की समस्या भी हो सकती है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार देश में लगभग 93 लाख बच्चे दृष्टिबाधित हैं। इंडियन जर्नल ऑफ ऑप्थैल्मोलॉजी में प्रकाशित वर्ष 2022 के एक अध्ययन के अनुसार बाल अंधत्व के कारण भारत की सकल राष्ट्रीय आय को लगभग 1,300 करोड़ रुपये का अप्रत्यक्ष नुकसान होता है। अपवर्तन दोष और एम्ब्लायोपिया बच्चों में दृष्टि संबंधी समस्याओं के प्रमुख कारणों में शामिल हैं। बताया गया है कि 75 प्रतिशत से अधिक दृष्टिदोषों को रोका जा सकता है या उपचार से उनमें सुधार किया जा सकता है। फरवरी से सितंबर 2026 के दौरान ‘बाल दृष्टि’ अभियान के तहत बीएमसी के 227 विद्यालयों में 40,270 विद्यार्थियों की आंखों की जांच की गई। इन विद्यालयों में पंजीकृत कुल 59,150 विद्यार्थियों में से लगभग 68 प्रतिशत तक जांच सुविधा पहुंचाई गई। जांच कराने वालों में 20,390 लड़के और 19,880 लड़कियां शामिल हैं। जांच के दौरान कई विद्यार्थियों में गंभीर दृष्टिदोष भी सामने आए। एक विद्यार्थी की आंख में माइनस 11.50 एसपीएच का निकट दृष्टिदोष पाया गया, जबकि कुछ विद्यार्थियों में यह समस्या माइनस 16 एसपीएच तक दर्ज की गई। माइनस 6 एसपीएच या उससे अधिक की स्थिति को उच्च निकट दृष्टिदोष माना जाता है। ऐसे बच्चों को कुछ सेंटीमीटर से अधिक दूरी की वस्तुएं भी धुंधली दिखाई दे सकती हैं। जांच के दौरान एक विद्यार्थी में मोतियाबिंद की भी पहचान हुई। अभियान के तहत अब तक 361 विद्यार्थियों को चश्मे उपलब्ध कराए गए हैं। जिन बच्चों में आंखों की गंभीर समस्या होने की आशंका पाई गई, उन्हें ताड़देव रोड स्थित विजन फाउंडेशन ऑफ इंडिया के कम्युनिटी आई क्लिनिक में विस्तृत जांच के लिए भेजा जा रहा है। जांच के बाद चश्मे, विशेषज्ञ उपचार या सर्जरी की आवश्यकता निर्धारित की जाती है। उपचार पूरा होने तक अभिभावकों से घर और स्कूल के माध्यम से संपर्क बनाए रखा जा रहा है। अब तक चार विद्यार्थियों की तिरछी आंखों की सर्जरी की गई है। इसके अलावा जांच में 31 विद्यार्थियों में रंग दृष्टिदोष पाया गया। हालांकि इस समस्या को ठीक नहीं किया जा सकता, लेकिन समय पर पहचान होने से अभिभावक और शिक्षक बच्चों की पढ़ाई की पद्धति में आवश्यक बदलाव कर सकते हैं। इससे विद्यार्थियों को भविष्य में शिक्षा और करियर के चुनाव में भी उचित मार्गदर्शन मिल सकता है।
लोअर परेल स्थित गणपतराव कदम महानगरपालिका विद्यालय में चौथी कक्षा में पढ़ने वाले नौ वर्षीय वेदांत नेरुलकर को पहली बेंच पर बैठने के बावजूद ब्लैकबोर्ड स्पष्ट दिखाई नहीं देता था। तिरछी आंखों की समस्या के कारण उसे पढ़ाई समझने में कठिनाई होती थी और वह कक्षा में कम बोलने लगा था। ‘बाल दृष्टि’ अभियान के दौरान उसकी समस्या सामने आने के बाद जुलाई में उसकी निःशुल्क सर्जरी की गई। सर्जरी के बाद वेदांत अब ब्लैकबोर्ड पढ़ पा रहा है और कक्षा में पूछे जाने वाले सवालों के जवाब भी दे रहा है। उसकी मां ने बताया कि अब उनका बेटा स्पष्ट देख सकता है, बिना परेशानी पढ़ाई कर रहा है और दोस्तों के बीच पहले से अधिक आत्मविश्वास के साथ रहता है।
अभियान के तहत आगे के उपचार के लिए भेजे गए 1,950 विद्यार्थियों में से अब तक 549 विद्यार्थी, यानी लगभग 28 प्रतिशत, संबंधित क्लिनिक तक पहुंचे हैं। अब प्रत्येक विद्यार्थी की प्रारंभिक जांच से लेकर विशेषज्ञ परामर्श, चश्मा वितरण और उपचार पूरा होने तक नियमित निगरानी पर विशेष ध्यान दिया जाएगा। मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने बीएमसी और विजन फाउंडेशन ऑफ इंडिया की टीमों द्वारा विद्यार्थियों की जांच, उपचार के लिए रेफरल और घर-घर संपर्क के माध्यम से किए जा रहे प्रयासों की सराहना की है। इस अभियान का उद्देश्य ऐसे बच्चों की समय रहते पहचान करना है, जो आंखों की समस्या के कारण पढ़ाई में पिछड़ रहे हैं, ताकि उनकी परेशानी को लापरवाही समझने के बजाय उन्हें आवश्यक उपचार उपलब्ध कराया जा सके।
