मुंबई में प्रवेश हुआ महंगा, कमर्शियल वाहनों पर टोल का नया बोझ
पांच एंट्री पॉइंट पर ₹15 से ₹35 तक बढ़ा टोल, ट्रांसपोर्टरों ने जताई नाराजगी, आवश्यक वस्तुओं की कीमतों पर असर की आशंका

इंद्र यादव/मुंबई। मुंबई में कमर्शियल वाहनों का प्रवेश अब और महंगा हो गया है। महाराष्ट्र राज्य सड़क विकास निगम (MSRDC) की संशोधित दरें आज यानी 1 अक्टूबर 2026 से लागू हो गई हैं। शहर के पांच प्रमुख प्रवेश बिंदुओं—वाशी, ऐरोली, मुलुंड एलबीएस रोड, मुलुंड ईस्टर्न एक्सप्रेस हाईवे और दहिसर—पर मिनी बस, हल्के कमर्शियल वाहन, ट्रक, बस और भारी वाहनों के टोल में ₹15 से ₹35 प्रति ट्रिप तक की वृद्धि हुई है। नई दरों के मुताबिक मिनी बस और लाइट कमर्शियल व्हीकल (LCV) का टोल ₹75 से बढ़ाकर ₹90, ट्रक और बस का ₹150 से बढ़ाकर ₹180, जबकि भारी मोटर वाहनों का टोल ₹190 से बढ़ाकर ₹225 प्रति ट्रिप कर दिया गया है। इससे पहले इन दरों में अक्टूबर 2023 में संशोधन किया गया था। हालांकि निजी कार और एसयूवी पर इन पांच प्रवेश बिंदुओं पर टोल नहीं लगाया जा रहा है। सार्वजनिक परिवहन की बसें, ऑटो-रिक्शा और टैक्सियां भी छूट के दायरे में हैं। लेकिन सवाल यह है कि क्या इस छूट से आम मुंबईकर वास्तव में बढ़े हुए टोल के असर से बच पाएगा? मुंबई में रोजाना बड़ी मात्रा में फल, सब्जियां, अनाज और अन्य आवश्यक वस्तुएं ट्रक, टेम्पो तथा दूसरे मालवाहक वाहनों से आती हैं। ट्रांसपोर्टरों और व्यापारियों का कहना है कि टोल बढ़ने से माल ढुलाई की लागत बढ़ सकती है और इसका बोझ आखिरकार उपभोक्ताओं तक पहुंच सकता है। ऑल इंडिया मोटर ट्रांसपोर्ट कांग्रेस (AIMTC) ने भी बढ़ी हुई दरों का विरोध किया है और मुंबई के प्रवेश बिंदुओं पर भारी कमर्शियल वाहनों को टोल से पूरी तरह छूट देने की मांग की है। संगठन का कहना है कि बढ़ते परिचालन खर्च के बीच अतिरिक्त टोल ट्रांसपोर्ट व्यवसाय पर नया आर्थिक बोझ डालेगा। ऐसे में निजी कार चालकों को टोल से राहत मिलने के बावजूद कमर्शियल वाहनों पर बढ़ा शुल्क आम आदमी के घरेलू बजट को अप्रत्यक्ष रूप से प्रभावित कर सकता है। यदि माल ढुलाई की बढ़ी लागत वस्तुओं की कीमतों में जोड़ी जाती है तो इसका असर मुंबई की मंडियों से लेकर खुदरा बाजार तक दिखाई दे सकता है। हालांकि कीमतों में वास्तव में कितनी वृद्धि होगी, यह माल की श्रेणी, दूरी और ट्रांसपोर्ट लागत सहित कई कारकों पर निर्भर करेगा। टोल दरों में इस बढ़ोतरी ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि मुंबई में प्रवेश करने वाले कमर्शियल वाहनों पर लगातार बढ़ते आर्थिक बोझ का अंतिम भार आखिर किसकी जेब पर पड़ेगा—ट्रांसपोर्टर की या आम मुंबईकर की?
