Sunday, April 26, 2026
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संपादकीय: राजनीति में नैतिकता का पतन!:

प्रचलित कहावत है—“गिरगिट की तरह रंग बदलना। आजकल के नेताओं पर यह कहावत इतनी सटीक बैठती है कि इसे देखकर गिरगिट भी शर्मिंदा हो जाए। दूसरी कहावत है—“घड़ियाली आँसू बहाना।” यह कोई प्राकृतिक गुण नहीं, बल्कि राजनीति में आने के बाद विकसित होने वाला विशेष कौशल है, जिसके तहत नेता जनता के बीच बिना कारण दुखी होने का अभिनय करते हैं। संविधान कहता है कि जनता अपने मताधिकार से प्रतिनिधि चुनेगी और वे प्रतिनिधि सदन में नेता का चयन करेंगे, लेकिन आज स्थिति उलटती दिख रही है—अब नेता ही मतदाताओं को चुनने लगे हैं, और यह काम भी विभिन्न व्यवस्थाओं के जरिए संस्थागत रूप लेता दिखाई देता है। चुनावों के दौरान आचार संहिता के उल्लंघन के अनेक मामले सामने आते हैं, लेकिन कार्रवाई अक्सर एकतरफा नजर आती है। सवाल यहाँ केवल प्रक्रिया का नहीं, बल्कि नैतिकता का है। जनता यह मानकर वोट देती है कि उसका प्रतिनिधि उसके हितों के लिए काम करेगा, लेकिन वास्तविकता में वह प्रतिनिधि अपने दल के प्रति अधिक जवाबदेह हो जाता है। स्थिति यहाँ तक पहुँच गई है कि नेता सुबह एक पार्टी में होता है और शाम तक दूसरी पार्टी का समर्थक बन जाता है। ऐसे में नैतिकता की अपेक्षा करना स्वयं में प्रश्न बन जाता है। हाल के वर्षों में भारतीय राजनीति में ऐसे कई उदाहरण देखने को मिले हैं, जहाँ वैचारिक विरोध के बावजूद नेता अवसर के अनुसार पाला बदलते रहे हैं। कभी किसी पार्टी की नीतियों की आलोचना करने वाले नेता, कुछ समय बाद उसी पार्टी में शामिल होकर पद और लाभ प्राप्त करते हैं। यह प्रवृत्ति केवल व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा ही नहीं, बल्कि राजनीतिक संस्कृति के गिरते स्तर को भी दर्शाती है। इस संदर्भ में अरविंद केजरीवाल और राघव चड्ढा जैसे नेताओं के उदाहरण अक्सर चर्चा में आते हैं। आंदोलन से निकली राजनीति, जिसने कभी व्यवस्था परिवर्तन का दावा किया था, वह भी समय के साथ आंतरिक मतभेदों और सत्ता संघर्ष से अछूती नहीं रही। इसी तरह वरुण गांधी और मेनका गांधी जैसे कुछ नेताओं को आज भी अपेक्षाकृत नैतिकता बनाए रखने के उदाहरण के रूप में देखा जाता है, भले ही वे सत्ता के केंद्र में न हों। राजनीति का यह बदलता स्वरूप यह स्पष्ट करता है कि अब प्रतिनिधित्व की अवधारणा कमजोर होती जा रही है और अवसरवादिता मजबूत हो रही है। दल बदलना, विचार बदलना और सिद्धांतों से समझौता करना सामान्य बात बनती जा रही है। ऐसे में जनता के सामने सबसे बड़ा प्रश्न यही है कि वह किस आधार पर अपने प्रतिनिधियों का चयन करे। कुल मिलाकर, आज की राजनीति में नैतिकता की खोज वास्तव में “रेगिस्तान में सुई ढूँढने” जैसी कठिन हो गई है। फिर भी, लोकतंत्र की मजबूती के लिए यह आवश्यक है कि जनता जागरूक होकर केवल वादों और नारों के आधार पर नहीं, बल्कि नेताओं के चरित्र, निरंतरता और जवाबदेही के आधार पर निर्णय ले।

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