Wednesday, March 4, 2026
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संपादकीय: वैश्विक राजनीति के दोहरे मानदंड!

यह ऐतिहासिक सत्य है कि ईरान इस्लामिक गणराज्य बनने से पहले पर्शिया या फारस के नाम से जाना जाता था। प्राचीन विश्व की महान सभ्यताओं- यूनान, मिस्र और रोमन साम्राज्य के साथ जिस शक्ति का नाम सम्मान से लिया जाता था, वह पर्शिया ही था। सांस्कृतिक रूप से उसका भारत से गहरा संबंध रहा है। भाषा, स्थापत्य, सूफी परंपरा और व्यापार—इन सबमें भारत-ईरान की साझी विरासत स्पष्ट दिखती है। भारत में पारसी समुदाय ने उद्योग, शिक्षा और परोपकार की जो परंपरा स्थापित की, वह मिसाल मानी जाती है। जमशेदजी टाटा ने जिस दूरदृष्टि से जमशेदपुर बसाया, उसने भारतीय औद्योगिक विकास की नींव मजबूत की। आगे बढ़ती रतन टाटा ने उद्योग के साथ मानवता का संतुलन बनाए रखा। कैंसर उपचार के क्षेत्र में टाटा मेमोरियल सेंटर जैसी संस्थाएं उनकी सामाजिक उन्नति का उदाहरण हैं। यह तर्क अक्सर दिया जाता है कि उद्योगपति और व्यापारी में फर्क होता है- उद्योगपति राष्ट्र निर्माण की सोच रखता है, जबकि व्यापारी लाभ केंद्रित होता है। हालांकि यह विभाजन पूर्णतः सही नहीं कहा जा सकता, लेकिन सामाजिक उत्तरदायित्व के प्रश्न पर बहस हमेशा प्रासंगिक रहती है। भारत के बड़े कॉरपोरेट घरानों- जैसे मुकेश अंबानी या अनिल अंबानी को लेकर भी समय-समय पर यह चर्चा होती रही है कि निजी संपत्ति और सार्वजनिक दायित्व के बीच संतुलन कैसा हो। इसी संदर्भ में महामारी के समय अभिनेता सोनू सूद द्वारा किए गए राहत कार्यों को लोगों ने मानवीय संवेदना के प्रतीक के रूप में देखा। यह बताता है कि किसी व्यक्ति का मूल्यांकन केवल उसके पेशे या छवि से नहीं, बल्कि उसके कर्मों से होना चाहिए। ईरान की राजनीति में धर्मगुरुओं की भूमिका विशिष्ट रही है। अयातुल्ला खुमैनी विश्व राजनीति में एक प्रभावशाली और विवादास्पद व्यक्तित्व रहे। समर्थकों के लिए वे पश्चिमी हस्तक्षेप के विरुद्ध प्रतिरोध के प्रतीक थे, जबकि आलोचक उन्हें कठोर धार्मिक शासन का प्रतिनिधि मानते हैं। महिलाओं के पहनावे से लेकर राजनीतिक असहमति तक- ईरान की नीतियों पर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बहस होती रही है। लेकिन वैश्विक राजनीति का एक पक्ष यह भी है कि जब महाशक्तियाँ हस्तक्षेप करती हैं, तो वह अक्सर लोकतंत्र या मानवाधिकार के नाम पर होता है, जबकि उसके पीछे रणनीतिक या आर्थिक हित भी होते हैं। तेल-समृद्ध क्षेत्रों में बाहरी दखल का इतिहास लंबा रहा है—इराक, अफगानिस्तान और पश्चिम एशिया के अन्य हिस्से इसके उदाहरण हैं। अमेरिका की विदेश नीति पर साम्राज्यवादी होने के आरोप नए नहीं हैं। चाहे वह डोनाल्ड ट्रम्प का कार्यकाल हो या उससे पहले की सरकारें—ईरान के परमाणु कार्यक्रम को लेकर कठोर रुख अपनाया गया। इज़राइल भी ईरान को अपनी सुरक्षा के लिए खतरा मानता रहा है। रूस और चीन जैसे देश कई बार अमेरिकी नीतियों की आलोचना करते रहे हैं। व्लादिमीर पुतिन और चीनी नेतृत्व ने पश्चिमी हस्तक्षेपवाद पर सवाल उठाए हैं। हालांकि अंतरराष्ट्रीय कूटनीति में नैतिकता से अधिक रणनीति काम करती है—यह भी उतना ही सत्य है। भारत ऐतिहासिक रूप से गुटनिरपेक्ष आंदोलन का अग्रणी रहा है। इंदिरा गांधी के समय 1971 के युद्ध में अमेरिका द्वारा सातवां बेड़ा भेजे जाने और तत्कालीन राष्ट्रपति रिचर्ड निक्सन की भूमिका को अक्सर उदाहरण के रूप में याद किया जाता है, जब सोवियत संघ भारत के साथ खड़ा हुआ था। आज के दौर में भारत-अमेरिका संबंध प्रगाढ़ हुए हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार ने रणनीतिक साझेदारी को प्राथमिकता दी है। दूसरी ओर, पूर्व प्रधानमंत्रीअटल बिहारी वाजपेयी के समय भी इज़रायल से संबंध मजबूत हुए थे, लेकिन फिलिस्तीन मुद्दे पर संतुलित रुख बनाए रखा गया। ईरान के साथ भारत के संबंध केवल ऊर्जा तक सीमित नहीं रहे। चाबहार बंदरगाह परियोजना इसका उदाहरण है, जो भारत को मध्य एशिया और यूरोप से जोड़ने की रणनीतिक कड़ी मानी जाती है। महामारी के दौरान रियायती दरों पर तेल आपूर्ति का मुद्दा भी द्विपक्षीय संबंधों में उल्लेखित किया जाता है, हालांकि इन दावों पर अलग-अलग आकलन मौजूद हैं। किसी भी वैश्विक घटना पर प्रतिक्रिया देते समय हमें भावनाओं, धार्मिक पहचान या वैचारिक आग्रह से ऊपर उठकर व्यापक राष्ट्रीय हित को देखना चाहिए। ईरान, अमेरिका, इज़रायल या किसी भी देश के साथ संबंध केवल मित्र-शत्रु की सरल रेखा से तय नहीं होते। वे रणनीतिक, आर्थिक और भू-राजनीतिक गणनाओं से संचालित होते हैं। यह भी उतना ही आवश्यक है कि किसी नेता या राष्ट्र का मूल्यांकन एकांगी दृष्टिकोण से न किया जाए। न तो अंध समर्थन उचित है, न अंध विरोध। लोकतंत्र में सवाल पूछना देशद्रोह नहीं, बल्कि नागरिक चेतना का प्रतीक है। परंतु वैश्विक जटिलताओं को समझे बिना निष्कर्ष निकालना भी उचित नहीं। आज आवश्यकता है संतुलित दृष्टि, ऐतिहासिक स्मृति और राष्ट्रीय स्वाभिमान के समन्वय की—ताकि भारत अपनी विदेश नीति को स्वतंत्र, व्यावहारिक और दीर्घकालिक हितों के अनुरूप आगे बढ़ा सके।

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