कांग्रेस में परिवारवाद: बरगद की छाया में नए पौधे कब उगेंगे?

अंजनी सक्सेना
भारतीय संस्कृति में बरगद को पूज्य माना गया है। उसकी जड़ें गहरी हैं, छाया शीतल है पर बरगद के नीचे एक समस्या भी है, उसकी घनी छाया में कोई नया पौधा नहीं पनपता। कांग्रेस पार्टी आज उसी बरगद जैसी हो गई है। उत्तर प्रदेश में कांग्रेस ने नया प्रयोग किया है। अजय राय की जगह आराधना मिश्रा ‘मोना’ को प्रदेश की कमान दी गई है। मोना तीन बार की विधायक हैं, रामपुर खास की धरती से आती हैं, ओजस्वी वक्ता हैं। उनके साथ इमरान मसूद और वीरेंद्र चौधरी को भी जिम्मेदारी दी गई है। देखने में यह समीकरण बड़ा ही सुंदर लगता है। नारी शक्ति, अल्पसंख्यक और पिछड़े का संगम पर इस सुंदर चित्र के पीछे वास्तविकता क्या है? क्या नए पौधे को अपनी जमीन मिली है, या वह आज भी उसी पुराने बरगद की छाया में है? हमारे शास्त्रों में कहा गया है, पुत्र पिता का अनुगामी होना चाहिए लेकिन पिता के संस्कार पुत्री में आना भी गर्व की बात है। आराधना मिश्रा के पिता प्रमोद तिवारी नौ बार विधायक रहे, उनका नाम सम्मान से लिया जाता है। पुत्री में पिता के गुण आए, यह स्वाभाविक है पर राजनीति परिवार नहीं, व्यवस्था है। व्यवस्था में अपने पुत्र को नहीं, योग्य व्यक्ति को आगे बढ़ाया जाता है। आचार्य चाणक्य ने चंद्रगुप्त को राजा बनाया, अपने पुत्र को नहीं। यही तो भारतीय लोकतंत्र की आत्मा है। कांग्रेस के शीर्ष पर भी यही कथा है। मोतीलाल नेहरू से जवाहरलाल, इंदिरा, राजीव और अब राहुल-प्रियंका तक एक ही परिवार ने दीपक जलाए रखा। दीपक पवित्र है, पर क्या एक ही घर में दीपक जलने से पूरा गांव रोशन होता है? राहुल गांधी ने स्वयं एक बार कहा था, हमें परिवारवाद से बचना चाहिए लेकिन उत्तर प्रदेश में कांग्रेस कभी भी परिवारवाद से मुक्त दिखाई ही नहीं दी। उत्तर प्रदेश में कांग्रेस का इतिहास राष्ट्रीय और प्रादेशिक, दोनों स्तरों पर कई प्रमुख राजनीतिक परिवारों की विरासत से जुड़ा रहा है। इस विरासत ने पार्टी को लंबे समय तक मजबूती दी, पर बाद के वर्षों में यही संगठनात्मक विस्तार की चुनौती भी बनी। केंद्रीय स्तर पर नेहरू-गांधी परिवार का प्रभाव सबसे गहरा रहा है। उत्तर प्रदेश इस परिवार की मुख्य राजनीतिक कर्मभूमि रहा है। पंडित जवाहरलाल नेहरू ने प्रयागराज की फूलपुर सीट से तीन बार लोकसभा चुनाव जीता। इंदिरा गांधी ने रायबरेली संसदीय क्षेत्र का प्रतिनिधित्व करते हुए देश की प्रधानमंत्री का पद संभाला। संजय गांधी ने अमेठी से राजनीतिक शुरुआत की और उनके बाद राजीव गांधी ने 1981 से 1991 तक अमेठी का प्रतिनिधित्व किया और प्रधानमंत्री रहे। सोनिया गांधी ने लंबे समय तक रायबरेली और राहुल गांधी ने अमेठी सीट का प्रतिनिधित्व किया। प्रियंका गांधी वाड्रा ने उत्तर प्रदेश कांग्रेस की प्रभारी महासचिव के रूप में संगठन और चुनाव रणनीतियों की कमान संभाली। वर्तमान में वे गांधी परिवार की परंपरागत सीट रायबरेली से सांसद हैं राष्ट्रीय नेतृत्व के अलावा प्रदेश स्तर पर भी कई परिवारों ने कांग्रेस संगठन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। प्रतापगढ़ की रामपुर खास सीट से प्रमोद तिवारी लगातार नौ बार विधायक रहे। उनके बाद उनकी पुत्री आराधना मिश्रा ‘मोना’ उसी सीट से चुनाव जीतती आ रही हैं। वे तीन बार की विधायक, पूर्व सीएलपी नेता हैं और अब उन्हें उत्तर प्रदेश कांग्रेस का अध्यक्ष नियुक्त किया गया है। पूर्व मुख्यमंत्री हेमवती नंदन बहुगुणा के बाद उनकी पुत्री रीता बहुगुणा जोशी लंबे समय तक कांग्रेस में रहीं और उत्तर प्रदेश कांग्रेस कमेटी की अध्यक्ष भी रहीं। वरिष्ठ कांग्रेस नेता जितेंद्र प्रसाद के पुत्र जितिन प्रसाद लंबे समय तक यूपी में कांग्रेस के प्रमुख ब्राह्मण चेहरे और केंद्रीय मंत्री रहे, बाद में वे भाजपा में शामिल हो गए। पूर्व राज्यपाल खुर्शीद आलम खान के पुत्र और पूर्व राष्ट्रपति डॉ. जाकिर हुसैन के नाती सलमान खुर्शीद उत्तर प्रदेश कांग्रेस के अध्यक्ष और केंद्रीय मंत्री रहे। पूर्व केंद्रीय मंत्री मोहसिना किदवई और उनका परिवार बाराबंकी और अवध क्षेत्र में कांग्रेस का प्रमुख चेहरा रहा है। 1947 से 1980 के दशक तक इस पारिवारिक जनाधार ने कांग्रेस को उत्तर प्रदेश में एक मजबूत और एकमुश्त वोट बैंक प्रदान किया। नेहरू-गांधी परिवार के नाम पर पार्टी को व्यापक जनसमर्थन मिलता रहा। हालांकि 1990 के बाद मंडल-कमंडल की राजनीति के दौर में जब सपा, बसपा और भाजपा ने नए सामाजिक समीकरणों और जमीनी कैडर को आगे बढ़ाया, तब केवल पारिवारिक विरासत पर निर्भरता कांग्रेस के लिए चुनौती बन गई। नए कार्यकर्ताओं को आगे बढ़ने के सीमित अवसर मिले, जिसका असर संगठनात्मक कमजोरी के रूप में दिखा और धीरे-धीरे पार्टी का जनाधार सिकुड़ता चला गया। आज रामपुर खास की ही बात करें तो यहां की धरती बड़ी उर्वर है। वहां प्रमोद तिवारी ने वर्षों संघर्ष किया है। 2022 में जब कांग्रेस 70 सीटों पर लड़ी और केवल 2 पर जीत मिली, उनमें से एक रामपुर खास थी। यह जीत कार्यकर्ता की जीत मानी जाती है, पर सियासी गलियारों में चर्चा यह भी है कि वहां सपा ने अपना प्रत्याशी ही नहीं उतारा था। आराधना में क्षमता है। वे प्रियंका गांधी के लड़की हूं, लड़ सकती हूं अभियान की सशक्त आवाज रही हैं। आज जब नारी शक्ति वंदन अधिनियम आया है, तो महिला नेतृत्व का आगे आना शुभ संकेत है। वैसे इस समय कांग्रेस के पास अवसर था कि वह किसी ऐसे चेहरे को पूर्ण अध्यक्ष बनाती जिसका अपना पसीना संगठन में बहा हो। इमरान मसूद को कार्यकारी अध्यक्ष बनाया गया, पूर्ण नहीं। यह ऐसा है जैसे किसी को घर बुलाकर दरवाजे पर ही बिठा दिया जाए, अंदर न ले जाया जाए। कहा जाता है कि बरगद को काटना नहीं चाहिए, उसकी छाया भी चाहिए। पर उसके आसपास थोड़ी जगह तो बनानी चाहिए ताकि नए पेड़पौधे पनप सकें। इसी तरह राजनीतिक गलियारों में आराधना से अपेक्षा है कि वे पिता की विरासत को संभालते हुए अपनी नई पहचान बनाएंगी। वे 75 जिलों में ऐसे कम से कम 10-10 कार्यकर्ताओं को ढूंढेंगी जो पहली पीढ़ी के नेता हैं, जिनके पिता विधायक नहीं, किसान या शिक्षक हैं। उन्हें मंच देंगी और कांग्रेस हाईकमान को भी सोचना होगा कि उत्तर प्रदेश में उसने जो खोया है, वह परिवारवाद से नहीं, कार्यकर्ता के सम्मान से वापस आएगा। आशा है, इस बार बरगद के नीचे भी नए पौधे उगेंगे और लोकतंत्र का बगीचा फिर हरा-भरा होगा।
