गावठाण और आदिवासी पाडों के पुश्तैनी घरों का मुद्दा सुलझाने मैदान में उतरे आला अधिकारी, जरूरत पड़ी तो नियम-कानून में बदलाव पर भी होगा विचार

इंद्र यादव/मुंबई। मीरा-भाईंदर के सैकड़ों साल पुराने गावठाणों और आदिवासी पाडों में रहने वाले भूमिपुत्रों के पुश्तैनी घरों तथा परिवार बढ़ने के कारण किए गए अतिरिक्त निर्माण को लेकर लंबे समय से चली आ रही समस्या के समाधान की दिशा में सरकार ने कदम बढ़ाया है। ऐसे निर्माणों को अवैध बताकर की जाने वाली कार्रवाई से स्थानीय आगरी, कोळी और आदिवासी समाज के लोगों में लंबे समय से चिंता बनी हुई है। अब इस मुद्दे का स्थायी और व्यावहारिक समाधान निकालने के लिए उच्चस्तरीय अधिकारियों की टीम ने प्रभावित क्षेत्रों का प्रत्यक्ष दौरा कर स्थिति का जायजा लिया।समस्या की जमीनी हकीकत समझने के लिए नगर विकास विभाग के अपर मुख्य सचिव असीम कुमार गुप्ता, मीरा-भाईंदर महानगरपालिका आयुक्त राधाबिनोद शर्मा और अपर तहसीलदार निलेश गौंड सहित वरिष्ठ अधिकारी सीधे प्रभावित क्षेत्रों में पहुंचे। दौरे की शुरुआत उत्तन के तटीय इलाके से की गई। इसके बाद अधिकारियों ने राई, मुर्धा, घोडबंदर, नवघर, गोडदेव और काजूपाडा के आदिवासी पाडों सहित विभिन्न इलाकों का निरीक्षण किया।इस दौरान अधिकारियों ने आगरी, कोळी और आदिवासी बस्तियों में जाकर स्थानीय भूमिपुत्रों से संवाद किया और पुश्तैनी मकानों, परिवारों के विस्तार के कारण बढ़ाए गए निर्माण तथा उन पर होने वाली प्रशासनिक कार्रवाई से जुड़ी समस्याओं को समझा।स्थानीय स्तर पर लंबे समय से यह मांग उठती रही है कि गावठाणों और आदिवासी पाडों में पीढ़ियों से रह रहे परिवारों के घरों को सामान्य अवैध निर्माण की श्रेणी में रखकर नहीं देखा जाना चाहिए। कई परिवारों का कहना है कि आबादी और परिवार बढ़ने के साथ उन्होंने अपने पुराने मकानों में कमरे या अन्य हिस्से जोड़े, लेकिन मौजूदा नियमों के कारण इन निर्माणों पर कार्रवाई का खतरा बना रहता है।दौरे के दौरान भूमिपुत्रों की समस्या का स्थायी समाधान निकालने की दिशा में आवश्यक कानूनी और प्रशासनिक विकल्पों पर विचार किए जाने की बात सामने आई। जरूरत पड़ने पर मौजूदा नियमों अथवा कानूनी प्रावधानों में आवश्यक बदलाव के विकल्प पर भी विचार किया जा सकता है। हालांकि इस पूरी प्रक्रिया में समय लगने की संभावना है।स्थानीय भूमिपुत्रों को अब उम्मीद है कि उच्चस्तरीय अधिकारियों के प्रत्यक्ष निरीक्षण के बाद वर्षों से लंबित गावठाण और आदिवासी पाडों के पुश्तैनी घरों का मुद्दा केवल फाइलों तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि इसके स्थायी समाधान की दिशा में ठोस निर्णय लिया जाएगा।

