
शिव शंकर सिंह ‘पारिजात’
पुरातन काल में सोलह महाजनपदों में से एक अंगभूमि की सांस्कृतिक पहचान केवल उसके प्राचीन इतिहास और गौरवशाली परंपराओं तक सीमित नहीं रही। इस भूमि की एक विशिष्ट विशेषता उसकी ‘अंग-बंग’ सांस्कृतिक विरासत भी रही है। गंगा के दोनों किनारों पर विकसित इस सांस्कृतिक भूगोल ने बिहार और बंगाल के बीच संवाद का ऐसा सेतु बनाया, जिसमें भाषा की सीमाएं अक्सर धुंधली पड़ जाती थीं। भागलपुर इस संवाद का एक महत्वपूर्ण केंद्र रहा। यहां रहकर अनेक बांग्लाभाषी विभूतियों ने साहित्य और संस्कृति को समृद्ध किया और अपनी रचनात्मक प्रतिभा से भागलपुर का नाम देश-देशांतर में रोशन किया। इनमें कथाशिल्पी शरतचंद्र चट्टोपाध्याय और मानवीय संवेदनाओं के विलक्षण चितेरे बनफूल के नाम विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं। बनफूल अर्थात डॉ. बलायचंद मुखोपाध्याय का साहित्यिक व्यक्तित्व अत्यंत विराट था। साठ से अधिक उपन्यासों, सैकड़ों लघुकथाओं, नाटकों, कविताओं और अन्य रचनाओं के सर्जक बनफूल मूलतः चिकित्सक थे, लेकिन उनकी संवेदनशील दृष्टि उन्हें अपने समय के आम आदमी तक ले जाती थी। उनकी रचनाओं में जीवन के छोटे-छोटे प्रसंग असाधारण अर्थ ग्रहण कर लेते हैं। मनुष्य की विडंबना, संघर्ष, प्रेम, अकेलापन और सामाजिक विषमता उनके साहित्य के केंद्रीय सरोकार रहे। सन् 1960 के आसपास तपन सिन्हा के निर्देशन में बनी बांग्ला फिल्म ‘हाटे बाजारे’ ने बनफूल की साहित्यिक लोकप्रियता को व्यापक जन-परिचय दिया। अशोक कुमार और वैजयंतीमाला अभिनीत इस फिल्म को वर्ष की सर्वश्रेष्ठ फिल्म के लिए राष्ट्रपति का स्वर्ण पदक मिला था। कम्बोडिया में आयोजित एशियन फिल्म महोत्सव में भी इसे सम्मानित किया गया। ‘हाटे बाजारे’ ही नहीं, बनफूल की अन्य रचनाओं पर भी फिल्में बनीं। उनके नाटक ‘मंत्रमुग्ध’ पर बिमल राय ने फिल्म बनाई, जबकि उनके चर्चित उपन्यास ‘अग्नीश्वर’ पर भी फिल्म का निर्माण हुआ,लेकिन बनफूल को केवल बांग्ला साहित्य के लेखक के रूप में देखना उनके व्यक्तित्व को सीमित कर देना होगा। उनका जीवन और रचना-संसार बिहार, विशेषकर भागलपुर की मिट्टी से गहरे जुड़े थे।
भारत सरकार ने उनके साहित्यिक योगदान के लिए उन्हें पद्मभूषण से सम्मानित किया। उनकी जन्मशती पर डाक टिकट भी जारी किया गया। उनकी कालजयी कृति ‘हाटे बाजारे’ की स्मृति आज भी रेल यात्रा के एक परिचित नाम में जीवित है। बरौनी से नवगछिया होते हुए सियालदह तक चलने वाली ‘हाटे बाजारे एक्सप्रेस’ उनके साहित्य की लोकप्रियता का प्रतीकात्मक स्मरण है। बनफूल का जन्म 19 जुलाई, 1899 को मनीहारी में हुआ था। उनके पिता सत्यचरण मुखोपाध्याय मूलतः बंगाल के हुगली जिले के निवासी थे और नौकरी के सिलसिले में साहेबगंज के गंगा पार मनीहारी में रहते थे। गंगा के इस भूगोल ने शायद अनजाने ही बालक बलायचंद के जीवन में बिहार और बंगाल के सांस्कृतिक संबंधों की पहली जमीन तैयार कर दी थी।
उनकी प्रारंभिक शिक्षा मनीहारी, साहेबगंज और हजारीबाग में हुई। इसके बाद उन्होंने पटना से चिकित्सा की पढ़ाई की और कोलकाता से पैथोलॉजी में विशेषज्ञता प्राप्त की। चिकित्सक के रूप में उन्होंने बंगाल के आजिमगंज में मेडिकल ऑफिसर के रूप में कार्य शुरू किया। पिता के दुर्घटनाग्रस्त होने के बाद उन्हें अवकाश लेकर भागलपुर आना पड़ा। उनके छोटे भाई भी भागलपुर सदर अस्पताल में कार्यरत थे। यही वह शहर था, जिसने आगे चलकर उनके जीवन और साहित्य को स्थायी आधार दिया। लगभग 1929 के आसपास भागलपुर आने के बाद बनफूल ने इस शहर को अपना कर्मक्षेत्र बना लिया। जीवन के लगभग चार दशक उन्होंने यहीं बिताए। भागलपुर में उन्होंने अपना पैथोलॉजिकल क्लीनिक खोला और चिकित्सा-कार्य शुरू किया। इस दौरान उन्होंने कई बार अपना घर और क्लीनिक बदला और अंत में आदमपुर मोहल्ले में अपना मकान खरीद लिया। चिकित्सा उनका पेशा था और साहित्य उनका जीवन। दिन में वे मरीजों की जांच करते और रात को जागकर लिखते। यह दोहरी दिनचर्या उनके व्यक्तित्व की सबसे उल्लेखनीय विशेषताओं में थी। कोलकाता से प्रकाशित साहित्यिक पत्रिका ‘शनिवारे चिट्ठी’ में उनकी व्यंग्य कविताएं और लेख नियमित रूप से प्रकाशित होने लगे। शीघ्र ही उनकी रचनात्मक पहचान स्थापित हो गई। ‘बनफूलेर गल्प’, ‘बनफूलेर कविता’ और उपन्यास ‘तृणखंड’ जैसी पुस्तकों के एक साथ प्रकाशित होने से बांग्ला साहित्य में उनकी उपस्थिति सशक्त हुई।
भागलपुर केवल उनके रहने का शहर नहीं था, यह उनकी रचनात्मक चेतना का हिस्सा बन गया था। शहर की गलियां, घाट, बाजार, अस्पताल, मजदूर बस्तियां, नदी और उसके किनारे का जीवन उनके भीतर लगातार कुछ लिखता रहता था। चिकित्सक होने के कारण समाज के विभिन्न वर्गों के लोगों से उनका प्रतिदिन संपर्क होता था। यही अनुभव बाद में उनकी कहानियों और उपन्यासों की जीवंत सामग्री बना। भागलपुर में रहते हुए उनका संपर्क हिंदी और बांग्ला साहित्य के अनेक महत्वपूर्ण रचनाकारों से रहा। राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर उन दिनों भागलपुर विश्वविद्यालय के कुलपति थे। बनफूल और दिनकर के बीच आत्मीय संबंध थे। दिनकर ने उन्हें विश्वविद्यालय की सीनेट का सदस्य भी बनाया। महादेवी वर्मा और निराला से भी उनके संबंध रहे। साहित्यकार-कलाकार हरिकुंज के चित्रशाला स्टूडियो में डॉ. विष्णु किशोर झा ‘बेचन’ सहित अनेक साहित्यकारों के साथ बनफूल की बैठकी होती थी।
बनफूल ने अपनी जीवनी में भागलपुर के लोगों के प्रति जिस आत्मीयता का उल्लेख किया है, वह उनके शहर से रिश्ते को समझने की महत्वपूर्ण कुंजी है। वे लिखते हैं कि भागलपुर में बिहारी और दूसरे गैर-बंगालियों से उन्हें जो आंतरिक प्यार मिला, वह बंगालियों से नहीं मिला। बंगालियों ने उनकी ख्याति के कारण उन्हें स्वीकार किया, लेकिन बिहारी लोगों ने उन्हें अधिक प्यार दिया। बनफूल के साहित्य का सबसे महत्वपूर्ण पक्ष भी यही मानवीय निकटता है। वे समाज के उन लोगों के जीवन में प्रवेश करते हैं, जिन्हें साहित्य प्रायः हाशिये पर छोड़ देता है। कुली, मोटिया मजदूर, मछुआरे, मछुआरिनें और छोटे-छोटे काम करने वाले साधारण लोग उनके लिए केवल पात्र नहीं थे। बनफूल स्वयं लिखते हैं कि कुली, मोटिया-मजदूर, मछुआ-मछुआरिन सभी उन्हें प्यार करते थे। इन्हीं लोगों की बातें उन्होंने ‘हाटे बाजारे’ में लिखीं। शरतचंद्र और बनफूल दोनों ने भागलपुर की मिट्टी से अपनी रचनात्मक ऊर्जा प्राप्त की, लेकिन दोनों की दृष्टि अलग थी। शरतचंद्र ने परिवेश को भावात्मक गहराई और मानवीय करुणा दी, जबकि बनफूल ने उसे अनुभव की विविधता, व्यंग्य और सूक्ष्म मानवीय निरीक्षण से विस्तार दिया। लगभग चालीस वर्षों तक भागलपुर में रहने के बाद निजी और पारिवारिक कारणों से बनफूल जून 1968 में कोलकाता जाकर बस गए। लेकिन शहर बदलने से उनके भीतर का भागलपुर नहीं बदला। अपनी जीवनी ‘उदय अस्त’ में उन्होंने लिखा है कि भागलपुर छोड़ते समय उन्हें मालूम हुआ कि यहां के लोगों ने उन्हें कितना प्यार किया था। विदाई के अवसर पर अनेक सभाएं हुईं और स्टेशन पर भीड़ उमड़ पड़ी थी। कोलकाता के महानगरीय जीवन में भी भागलपुर की स्मृतियां उन्हें घेरती रहीं। उन्होंने स्वीकार किया – “भागलपुर में मेरा जीवन सुख का जीवन था। आज भागलपुर की गलियों में बनफूल का घर भले उतनी स्पष्टता से दिखाई न दे, लेकिन उनकी स्मृतियां अब भी इस शहर की सांस्कृतिक चेतना में बिखरी हुई हैं। सन् 1979 में बनफूल ने अंतिम सांस ली, लेकिन उनकी रचनाओं में भागलपुर का एक ऐसा चेहरा सुरक्षित है, जिसमें गंगा की नमी, बाजार की चहल-पहल, मजदूरों का पसीना, आम आदमी की हंसी-पीड़ा और साहित्यकार की करुण दृष्टि एक साथ दिखाई देती है।

