
बॉम्बे हाईकोर्ट की कड़ी नाराजगी, एसआरए पर 50 हजार रुपये का खर्च, 15 साल से स्थायी घर का इंतजार कर रहे रहिवासी
मुंबई। झोपड़पट्टी पुनर्वसन प्राधिकरण (एसआरए) के अधिकारियों को रहिवासियों की शिकायतों पर कार्रवाई करने का बॉम्बे हाईकोर्ट के सामने बार-बार आश्वासन देना और फिर कथित तौर पर उस पर अमल नहीं करना भारी पड़ गया है। बॉम्बे हाईकोर्ट ने एसआरए के मुख्य कार्यकारी अधिकारी (सीईओ) महेंद्र कल्याणकर, सहायक रजिस्ट्रार संध्या बावनकुळे और उपजिलाधिकारी वंदना गेवराईकर को अवमानना नोटिस जारी किया है। न्यायमूर्ति जी.एस.कुलकर्णी और न्यायमूर्ति नीला गोखले की खंडपीठ ने मामले में एसआरए के रवैये पर कड़ी नाराजगी जताते हुए 50 हजार रुपये का खर्च भी लगाया है, जिसे याचिकाकर्ताओं को मुआवजे के रूप में देने का निर्देश दिया गया है। अदालत ने प्रथम दृष्टया कोर्ट के आदेशों और दिए गए आश्वासनों के “जानबूझकर अथवा इच्छापूर्वक उल्लंघन” पर गंभीर सवाल उठाए। खंडपीठ ने यहां तक कहा कि एसआरए की ओर से अदालत को दिए गए आश्वासन “पूरी तरह झूठे” साबित हुए और इनके कारण अदालत को गुमराह किया गया। कोर्ट ने टिप्पणी की कि इस तरह के रवैये से न्याय प्रशासन प्रभावित हुआ है। मामला 75 वर्षीय केसर गुप्ता और अन्य याचिकाकर्ताओं से जुड़ा है, जिन्होंने झोपड़पट्टी पुनर्वसन परियोजना के लिए करीब 15 साल पहले अपना घर खाली कर दिया था, लेकिन उन्हें आज तक स्थायी वैकल्पिक आवास (PAA) नहीं मिल सका है। केसर गुप्ता ने मार्च 2011 में सायन-कोलीवाड़ा के इंदिरानगर स्थित अपना झोपड़ा पुनर्वसन परियोजना के लिए खाली किया था। इसके बदले उन्हें ट्रांजिट आवास में करीब 125 वर्ग फुट का कमरा दिया गया। समय बीतने के साथ ट्रांजिट इमारत की हालत खराब होती चली गई और उसके जर्जर होने से वहां रहने वाले लोगों की सुरक्षा को लेकर भी चिंता पैदा हुई। इसके बावजूद गुप्ता स्थायी घर मिलने का इंतजार करते रहे। याचिकाकर्ताओं के मुताबिक, 2014 से 2025 के बीच उन्होंने एसआरए और संबंधित अधिकारियों के सामने लगातार शिकायतें कीं। उनकी प्रमुख मांग थी कि स्थायी आवास के आवंटन की प्रक्रिया एसआरए अधिकारियों की सीधी निगरानी में कराई जाए, ताकि पात्र रहिवासियों के साथ अन्याय न हो और पूरी प्रक्रिया नियमों के अनुसार पूरी हो। शिकायतों के बाद एसआरए की ओर से भी समय-समय पर डेवलपर को नोटिस जारी किए गए और सात से आठ दिनों के भीतर बिंदुवार जवाब देने के निर्देश दिए गए। आरोप है कि इसके बावजूद अपेक्षित सुधारात्मक कार्रवाई नहीं हुई और वर्षों तक रहिवासियों की समस्या जस की तस बनी रही। करीब एक दशक तक प्रशासनिक स्तर पर कोशिशों के बावजूद समाधान नहीं निकलने पर अक्टूबर 2025 में केसर गुप्ता ने बॉम्बे हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया। मामले की सुनवाई के दौरान अदालत ने एसआरए द्वारा शिकायतों के निवारण के लिए गठित विशेष सेल अथवा समिति के माध्यम से याचिकाकर्ताओं की शिकायतों पर विचार करने को कहा था। जुलाई और अगस्त 2026 की सुनवाई के दौरान एसआरए की ओर से अदालत को बार-बार आश्वासन दिया गया कि विशेष सेल याचिकाकर्ताओं की शिकायतों को सुनेगा और उन पर उचित निर्णय पारित करेगा। लेकिन जब मामला दोबारा अदालत के सामने आया तो याचिकाकर्ताओं की ओर से एडवोकेट शकील अहमद ने बताया कि शिकायतों पर अब तक कोई ठोस समाधान नहीं हुआ है। इस पर खंडपीठ ने नाराजगी जताते हुए कहा कि वरिष्ठ नागरिक अपने सिर पर स्थायी छत पाने के लिए जगह-जगह चक्कर लगाने को मजबूर हैं। कोर्ट ने एसआरए की ओर से दिए गए आश्वासनों को महज “दिखावा” बताते हुए सवाल उठाया कि जब अदालत के सामने कार्रवाई का भरोसा दिया गया था तो उसका पालन क्यों नहीं किया गया। मामले की गंभीरता को देखते हुए हाईकोर्ट ने एसआरए सीईओ महेंद्र कल्याणकर, सहायक रजिस्ट्रार संध्या बावनकुळे और उपजिलाधिकारी वंदना गेवराईकर को अवमानना नोटिस जारी किया। तीनों अधिकारी एसआरए के शिकायत निवारण तंत्र से जुड़े बताए गए हैं। इसके साथ ही अदालत ने एसआरए पर 50 हजार रुपये का खर्च लगाते हुए यह राशि केसर गुप्ता और अन्य याचिकाकर्ताओं को देने का निर्देश दिया। कोर्ट ने मामले में न्याय की प्रक्रिया के “पूरी तरह पटरी से उतरने” जैसी स्थिति पर भी गंभीर टिप्पणी की। पुनर्वसन के नाम पर अपना मूल घर छोड़ने के बाद वर्षों तक ट्रांजिट कैंप में जिंदगी गुजारने को मजबूर रहिवासियों के लिए बॉम्बे हाईकोर्ट का यह रुख महत्वपूर्ण माना जा रहा है। साथ ही यह आदेश एसआरए प्रशासन के लिए भी स्पष्ट संदेश है कि अदालत में दिया गया आश्वासन केवल कागजी औपचारिकता नहीं है और उसका समयबद्ध पालन करना संबंधित अधिकारियों की जिम्मेदारी है।

