
इंद्र यादव/मुजफ्फरनगर, उत्तर प्रदेश। कलयुग का चरम देखो! जिस जगह पर सरस्वती का वास होना चाहिए, जहाँ नौनिहालों को संस्कार और शिक्षा का पाठ पढ़ाया जाना चाहिए, वहाँ खुद को ‘मानव संस्कार’ और शिक्षा का मसीहा बताने वाले ठेकेदार साहब अपनी घटिया मानसिकता का नंगा नाच खेल रहे हैं। मुजफ्फरनगर के नई मंडी थानाक्षेत्र स्थित वैदिक पुत्री पाठशाला के प्रबंधक अरविंद गर्ग की करतूत ने एक बार फिर यह साबित कर दिया है कि समाज के इन तथाकथित ठेकेदारों के सीने में दिल नहीं, बल्कि हवस की कोई गंदी भट्टी सुलग रही है।
डिग्री नहीं, जिस्म का सौदा!
आज के इस आधुनिक दौर में भी कड़वा सच यह है कि एक पढ़ी-लिखी, काबिल महिला के लिए अपनी योग्यता के दम पर नौकरी पाना लोहे के चने चबाने जैसा है। और जब बात शिक्षा के मंदिरों की आती है, तो वहाँ बैठे ये सफेदपोश दरिंदे अपनी हवस की भूख मिटाने के लिए मजबूर महिलाओं की लाचारी का फायदा उठाते हैं।
जॉइनिंग लेटर के नाम पर जिस्म की भीख: क्या एक औरत का टैलेंट और उसकी डिग्री सिर्फ इसलिए बेकार है क्योंकि वह इन दरिंदों के सामने झुकने से इनकार कर देती है?
मंदिर बना अय्याशी का अड्डा: जिस कॉलेज के नाम में ‘वैदिक’ और ‘संस्कार’ जुड़ा हो, वहाँ की आड़ में ऐसा घिनौना खेल खेला जा रहा है, जो इंसानियत को शर्मसार कर दे।
मानव संस्कार का षड्यंत्र!
ये सारे लोग समाज में बड़े-बड़े भाषण देते हैं, बेटियों को बचाने और पढ़ाने के ठेके लेते हैं। लेकिन अंदरखाने इनका असली चेहरा क्या है? मानव संस्कार का यह पूरा षड्यंत्र सिर्फ एक दिखावा है! इनका मकसद शिक्षा फैलाना नहीं, बल्कि अपनी गंदी मानसिकता और हवस की भूख को पूरा करने के लिए मजबूर चेहरों की तलाश करना है। जब तक ये समाज इन भेड़ियों को भगवान का दर्जा देता रहेगा, तब तक ऐसी बेटियाँ शोषण का शिकार बनती रहेंगी। इनका ‘संस्कार’ वाला चोला उतरते ही अंदर से सिर्फ गंदगी निकलती है।
तीखा तंज और पुलिसिया शिकंजा!
शुक्र है उस जांबाज पीड़िता का, जिसने डरने के बजाय इस दरिंदे का ऑडियो और वीडियो सबूत अपने मोबाइल में कैद कर लिया! वरना ये खादी और खाकी के बीच पलने वाले लोग तो अपनी रसूख के दम पर इस मामले को दबाकर किसी और बेटी की जिंदगी बर्बाद कर रहे होते।
पुलिस ने तहरीर पर मुकदमा दर्ज कर प्रबंधक अरविंद गर्ग को गिरफ्तार तो कर लिया है, लेकिन सवाल यह है कि क्या सिर्फ एक गिरफ्तारी से इन दरिंदों की अकड़ टूटेगी!
जो खुद को समाज का ‘संस्कारी निर्माता’ समझते थे, आज वही सलाखों के पीछे बैठकर अपने किए पर रो रहे हैं। डिग्री और नौकरी के नाम पर अपनी गंदी हवस का जाल बुनने वाले इन भेड़ियों को जेल की चक्की पीसते देखना ही इस समाज का सबसे बड़ा न्याय है!

