
डॉ.सुधाकर आशावादी
देश का दुर्भाग्य है, कि अपराधों में भी धर्म और जाति जैसा संकीर्ण दृष्टिकोण अपनाने से परहेज नहीं किया जाता। कुछ राजनीतिक दल सनातन धर्म से जुड़े आस्था केंद्रों को सदैव अपना राजनीतिक मुद्दा बनाने में लगे रहते हैं। उनके निशाने पर गैर सनातनी धर्म कभी नहीं आते। यूँ तो धर्म के नाम पर लूट, पाखंड और चोरी नई बात नहीं है। मंदिरों में विशेष दर्शन की व्यवस्था भी इसी प्रकार की लूट का एक हिस्सा है। अधिकांश बड़े मंदिरों में वी.आई.पी. दर्शन धार्मिक पाखंड और भक्तों के प्रति भेदभाव एहसास कराते हैं। बहरहाल भव्य श्रीराम मंदिर में कैमरों की निगरानी को धता बताकर की गई चोरी व्यवस्था में कमी का बोध कराती है, जिसके लिए कानून अपना कार्य करेगा ही। विचारणीय बिंदु यह है कि यह चोरी तो पकड़ में आ गई तथा आरोपियों पर शिकंजा कसा भी जा रहा है, लेकिन धार्मिक आडंबरों के नाम पर देश के अन्य सभी मंदिरों में क्या चढ़ावे की राशि में पारदर्शिता बनी हुई है। दक्षिण के विख्यात मंदिरों तथा अन्य धर्मस्थलों के निगरानी तंत्र क्या धन की बंदरबांट रोकने में समर्थ है। केवल सनातन मंदिरों ही नहीं, अन्य धार्मिक संस्थानों में धन की पारदर्शिता के प्रति सम्बंधित सरकारें और राजनीतिक दल इतने चिंतित हैं, जितना कि राम मंदिर के मामले में हैं ? क्या देश भर में वक्फ संपत्तियों और विदेशों से मिलने वाले चंदे के उपयोग की पारदर्शिता से किसी राजनीतिक दल को कोई सरोकार नहीं है? बहरहाल किसी भी धर्म स्थल पर चोरी का समर्थन नहीं किया जा सकता, किन्तु चोरी को राजनीतिक मुद्दा बनाने के औचित्य पर सवाल तो खड़े किये ही जा सकते हैं। तेरी चोरी अपराध और मेरी राजनीति को हवा पानी देने वाले तत्वों की चोरी क्षमा योग्य एवं ध्यान देने योग्य नहीं जैसी अवधारणा का सम्मान नहीं किया जा सकता। भव्य राम मंदिर की चढ़ावा चोरी ने इस बहस को जन्म दे दिया है, कि आस्था के प्रतीक भव्य मंदिरों, मस्जिदों, गिरजाघरों में दान राशि का सदुपयोग पारदर्शिता से हो या नहीं? राजनीतिक दलों के लिए विशेष धर्म स्थल के चढ़ावे में होने वाली चोरी तथा अन्य धर्म स्थलों के चढ़ावे व चंदे की चोरी पर गहन निगरानी करके सभी चोरों के लिए समान दंडनीय प्रावधान लागू हों या नहीं?



