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गौमाता को राष्ट्रीय पशु घोषित करने की मांग फिर तेज, मुस्लिम समाज के समर्थन से अभियान को मिली नई धार

मुंबई। देशभर में गौमाता को राष्ट्रीय पशु घोषित करने की मांग एक बार फिर जोर पकड़ती दिखाई दे रही है। वर्षों से गौरक्षा और गौमाता को राष्ट्रीय पशु घोषित करने के लिए संघर्ष कर रहे गौरक्षक अशोक लूनिया द्वारा शुरू किए गए अभियान को अब मुस्लिम समाज के समर्थन से नई दिशा मिलती नजर आ रही है। गौरतलब है कि वर्ष 2010 में गौहत्या के विरोध और गौसंरक्षण का संदेश जन-जन तक पहुंचाने के उद्देश्य से “जियो और जीने दो” नामक फिल्म का निर्माण किया गया था। इस फिल्म के माध्यम से गौमाता को राष्ट्रीय पशु घोषित करने की मांग को प्रभावशाली तरीके से उठाया गया था। फिल्म में एक विशेष गीत भी शामिल किया गया था, जिसके बोल थे- “गीता, बाइबल, कुरान यही कहे पुराण, अल्लाह, ईशु, नानक के संग गौमाता में बसे भगवान। करीब 16 वर्ष बाद अब उसी संदेश को सामाजिक समर्थन मिलता दिखाई दे रहा है। मुस्लिम समाज के कई लोगों ने सार्वजनिक रूप से यह संकल्प लिया है कि वे गौहत्या का समर्थन नहीं करेंगे तथा बकरीद पर गाय की कुर्बानी नहीं देंगे। इस पहल का गौसेवा और गौरक्षा से जुड़े संगठनों ने स्वागत किया है। गौरक्षक स्वर्गीय अशोक लूनिया वर्ष 1970 से लगातार गौरक्षा के लिए आंदोलन और अभियान चलाते रहे। उनके निधन के बाद उनके पुत्र विनायक अशोक लूनिया ने इस अभियान की जिम्मेदारी संभाली। उन्होंने देशभर के सांसदों और विधायकों को पत्र लिखकर समर्थन मांगा तथा वर्ष 2018 से “अहिंसा यात्रा” के माध्यम से गौमाता को राष्ट्रीय पशु घोषित करने की मांग राष्ट्रीय स्तर पर उठाई। विनायक लूनिया का कहना है कि आज देश में ऐसा वातावरण बन रहा है, जहां हिंदू, मुस्लिम, सिख और ईसाई समाज के लोग गौसंरक्षण के समर्थन में सामने आ रहे हैं। उन्होंने कहा कि सरकार को राजनीतिक कारणों से इस विषय को लंबित नहीं रखना चाहिए। उन्होंने असम, नागालैंड और पश्चिम बंगाल जैसे राज्यों में गौहत्या को लेकर दिए जा रहे विवादित बयानों पर भी चिंता जताई और कहा कि इससे समाज में भ्रम की स्थिति उत्पन्न होती है। उन्होंने हाल ही में पश्चिम बंगाल में अधिक उम्र की गायों को काटने संबंधी बयान पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा, “क्या मां बूढ़ी हो जाए तो उसे त्याग देना चाहिए?” उन्होंने मांग की कि देश का सर्वोच्च न्यायालय स्वतः संज्ञान लेकर केंद्र सरकार को निश्चित समयसीमा में गौमाता को राष्ट्रीय पशु घोषित करने का निर्देश दे। विनायक लूनिया ने बताया कि इस विषय को लेकर सर्वोच्च न्यायालय और विभिन्न उच्च न्यायालयों को भी ज्ञापन भेजे जाएंगे। उन्होंने आरोप लगाया कि कई लोग गौमाता के नाम पर केवल राजनीति और प्रचार करते रहे, लेकिन जब वास्तविक जनआंदोलन खड़ा हुआ तो कई तथाकथित गौसेवक पीछे हटते दिखाई दिए। इसके बावजूद “गौमाता को राष्ट्रीय पशु घोषित करो” अभियान लगातार मजबूत होता जा रहा है।

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