कैसे हो महिला सशक्तिकरण

आर.सूर्य कुमारी
भारतीय महिलाओं के सामने सबसे विकट समस्या तभी खड़ी हो जाती है जब वे जन्म लेती हैं। अशिक्षित माता-पिता ही नहीं पढ़े-लिखे माता-पिता भी अधिकांश मामलों में बेटा और बेटी के बीच भेदभाव करते हैं। मातृत्व के नाम पर बालिकाओं के साथ भेदभाव होता है। यह मानवीय प्रकृति से ज्यादा हमारी परम्परागत और वैचारिक अशुद्धि है। यहां मत बैठो, यहां मत खड़ी हो,इस तरह की समस्याएं लगभग साठ प्रतिशत बालिकाओं के साथ होती हैं। जबकि आवश्यकता इस बात की होती है कि बढ़ती उम्र के साथ-साथ बालिकाओं को गिद्ध दृष्टि डाले खड़े कलियुग के बारे में ज्यादा से ज्यादा जागरूक करें, उनमें आत्मबल और आत्मविश्वास को प्रबल करें। महिलाओं से जुड़ी दूसरी बड़ी समस्या है, रीति-नीति खो चुके और बहुत नीचे गिर चुके एक पुरुष वर्ग की कुदृष्टि। एक दिन की बच्ची से लेकर सौ साल तक की महिला तक सुरक्षित नहीं है। उन्हें कुछ नीच लोगों द्वारा अपने कलुष का शिकार बनाया जाता है। किशोर वय और युवा महिलाओं का ब्रेनवॉश किया जाता है। कुछ झूठे सपने दिखाकर और कुछ लालच दिखाकर, मगर सबसे ज्यादा डरा-धमकाकर उनका शीलहरण किया जाता है। यही नहीं, ऐसी घटनाएं भी सामने आती रहती हैं कि कुछ महिलाओं को पति, आसान परम्पराओं का इस्तेमाल कर त्याग देते हैं और रिश्ता-नाता, उम्र,किसी चीज का ध्यान न रखते हुए बुजुर्ग तक का मन बहलाने के लिए छोड़ देते हैं। ऐसी महिलाएं अक्सर चुप रहती हैं या डिप्रेशन में चली जाती हैं। उन्हें न उगलते बनता है न निगलते। यह बहुत भयावह स्थिति है। महिलाओं से जुड़ी और एक भयानक समस्या! रास्तों-चौराहों और सार्वजनिक स्थलों में हमारी बेटियां सुरक्षित नहीं हैं। उन्हें हिट किया जाता है। उन्हें टक्कर मारी जाती है। उनकी जान पर बन आती है। अपराध करने वाले यह नहीं चाहते कि बेटियां आगे बढ़ें और उनके द्वारा पुरुष प्रधान क्षेत्र समझे जाने वाले व्यवसायों में आगे बढ़ें, वे चाहते हैं कि वे घर की चारदीवारी में बंद रहें। हिट एंड रन मामलों में कुछ प्रेम प्रसंग भी होते हैं। जब युवतियां उनके सामने नहीं झुकती हैं तो वे ऐसी घटनाओं को अंजाम देते हैं। आगे,महिलाओं की समस्याओं के सामने खुद कतिपय महिलाएं ही खड़ी रहती हैं। कामकाज में और सामाजिक व्यवहार में वे खुद को खुला छोड़ देती हैं। बॉस से लेकर सामान्य कार्यकर्ता तक सबको अपना लेती हैं। दोनों हाथों से पैसे कमाती हैं। कुछ शादीशुदा और बाल-बच्चेदार महिलाएं भी किसी न किसी हद तक इस धंधे में शामिल रहती हैं। कुछ पति के समर्थन से तो कुछ पति की आंखें चुराकर। कुछ घटनाएं ऐसी भी होती हैं जो प्रेमी के बच्चे को पति के सिर पर मढ़ देती हैं। बेचारा वह बच्चे को अपना बच्चा समझकर पालता है। ऐसी घटनाएं होती कम हैं, मगर होती जरूर हैं। यातायात-आवागमन में, भीड़-भाड़ वाले इलाकों में महिलाओं के साथ दरिंदे बहुत नीच कर्म करते हैं। ऐसी और भी न जाने कितनी बातें हैं। पूरे भारतवर्ष में एक जैसे मॉडल की जरूरत है। हर राज्य में एक जैसा कठोर कानून होना चाहिए। तब जाकर सम्मानजनक और सम्मानपूर्वक जीवन जीने की इच्छा रखने वाली महिलाएं सुरक्षित रहेंगी।
