सपनों की मुंबई में 39 हजार आशियानों पर बुलडोजर का साया, गरीबों की बस्तियों में बढ़ी बेचैनी

1 अक्टूबर से बीएमसी का तीन महीने का विशेष अभियान; 14 फीट या उससे ऊंची 39,111 झोपड़ी संरचनाएं चिन्हित, सबसे ज्यादा 31,227 पूर्वी उपनगरों में

इंद्र यादव/मुंबई। मायानगरी और सपनों का शहर कही जाने वाली मुंबई में एक तरफ गगनचुंबी इमारतें लगातार आसमान छू रही हैं, तो दूसरी तरफ झोपड़पट्टियों में रहने वाले हजारों परिवारों के सिर पर कार्रवाई की तलवार लटक गई है। बृहन्मुंबई महानगरपालिका (बीएमसी) ने 1 अक्टूबर से 31 दिसंबर 2026 तक झोपड़पट्टी क्षेत्रों में अनधिकृत निर्माण के खिलाफ तीन महीने का विशेष अभियान चलाने की घोषणा की है। बीएमसी के आंकड़ों के मुताबिक मुंबई में 14 फीट या उससे अधिक ऊंचाई वाली 39,111 झोपड़ी संरचनाओं को कार्रवाई के लिए चिन्हित किया गया है। बीएमसी का कहना है कि यह अभियान अनधिकृत निर्माण और झोपड़ियों में किए गए अवैध अतिरिक्त निर्माण के खिलाफ है। प्रशासन ने संबंधित लोगों से अनधिकृत हिस्सों को स्वयं हटाने की अपील की है और ऐसा नहीं करने पर नियमानुसार कार्रवाई की चेतावनी दी है। लेकिन करीब 39 हजार संरचनाओं का आंकड़ा अपने आप में बताता है कि इस अभियान का असर कितना व्यापक हो सकता है। इसके दायरे में आने वाली बस्तियों में रहने वाले परिवारों के सामने सबसे बड़ा सवाल यही है कि अगर कार्रवाई में उनके रहने की जगह प्रभावित होती है तो उनका आगे क्या होगा? बीएमसी के आंकड़ों के अनुसार मुंबई शहर और उपनगरों में कुल 2,23,150 झोपड़ी संरचनाएं हैं। इनमें 39,111 ऐसी हैं, जिनकी ऊंचाई 14 फीट या उससे अधिक पाई गई है। सबसे ज्यादा 31,227 संरचनाएं पूर्वी उपनगरों में हैं। पश्चिमी उपनगरों में 4,536 और मुंबई शहर में 3,348 ऐसी संरचनाएं चिन्हित की गई हैं। यानी इस पूरे अभियान का सबसे बड़ा असर पूर्वी उपनगरों पर पड़ने वाला है। गोवंडी, मानखुर्द, कुर्ला जैसे घनी आबादी वाले इलाकों में बड़ी संख्या में मेहनतकश परिवार रहते हैं। पश्चिमी उपनगरों में भी जोगेश्वरी, मालाड और आसपास के झोपड़पट्टी बहुल क्षेत्रों में कार्रवाई को लेकर चिंता बढ़ना स्वाभाविक है। बीएमसी के आंकड़ों के मुताबिक 4,584 संरचनाओं के खिलाफ पहले ही कार्रवाई की जा चुकी है, जबकि 611 को नोटिस जारी किए गए हैं। इसके अलावा 24 अगस्त से 15 सितंबर के बीच विभिन्न वार्डों में 128 अनधिकृत निर्माणों के खिलाफ कार्रवाई की गई और 140 अन्य निर्माणों पर कार्रवाई की योजना बनाई गई है। इस तस्वीर का दूसरा पहलू सुरक्षा का भी है। बीएमसी का अभियान ऐसे समय घोषित किया गया है जब बारिश के दौरान कुर्ला में भूस्खलन और मानखुर्द में मकान गिरने जैसी जानलेवा घटनाएं सामने आ चुकी हैं। प्रशासन का तर्क है कि अनधिकृत और असुरक्षित निर्माण लोगों की जान के लिए खतरा बन सकते हैं और इन्हें नियंत्रित करना जरूरी है। लेकिन यहीं एक बड़ा मानवीय सवाल भी खड़ा होता है। मुंबई की झोपड़पट्टियों में रहने वाला बड़ा वर्ग दिहाड़ी मजदूरी, घरेलू काम, छोटे कारोबार, ऑटो-टैक्सी चलाने और दूसरे असंगठित क्षेत्रों में काम करके अपना परिवार पालता है। सीमित जगह में बढ़ते परिवारों के कारण कई बस्तियों में लोगों ने उपलब्ध छोटी सी जगह का इस्तेमाल करते हुए ऊपर अतिरिक्त निर्माण कर लिया है। इनमें कौन-सा निर्माण कानूनी है, कौन अनधिकृत है और किस परिवार को पुनर्वास या किसी अन्य कानूनी संरक्षण का अधिकार मिलता है—इसका फैसला प्रत्येक मामले के दस्तावेज और लागू नियमों के आधार पर होना चाहिए।
ऐसे में बीएमसी के सामने चुनौती केवल अनधिकृत निर्माण हटाने की नहीं, बल्कि यह सुनिश्चित करने की भी है कि पूरी प्रक्रिया कानून, निर्धारित एसओपी और संबंधित लोगों के अधिकारों का पालन करते हुए हो। प्रकाशित जानकारी के अनुसार मानसून के दौरान बेदखली पर अदालती प्रतिबंध और अतिक्रमण हटाने के लिए निर्धारित प्रक्रिया के कारण प्रशासन पहले नोटिस देकर स्वैच्छिक रूप से अनधिकृत हिस्सा हटाने का अवसर दे रहा है। झोपड़पट्टी में खड़ी 14 फीट ऊंची हर संरचना के पीछे सिर्फ ईंट, टीन और लकड़ी नहीं, बल्कि किसी परिवार की पूरी गृहस्थी भी हो सकती है। किसी बच्चे की किताबें, किसी बुजुर्ग की जिंदगीभर की जमा-पूंजी और किसी मजदूर की वर्षों की कमाई उसी छोटी सी जगह से जुड़ी हो सकती है। इसलिए सुरक्षा और कानून लागू करने के साथ कार्रवाई का मानवीय पहलू भी उतना ही महत्वपूर्ण है। अब सवाल यह है कि 1 अक्टूबर से शुरू होने वाला यह तीन महीने का अभियान जमीन पर किस तरह लागू किया जाता है। क्या केवल अनधिकृत बढ़ाए गए हिस्से हटाए जाएंगे, किन मामलों में पूरी संरचना प्रभावित होगी, पात्र परिवारों के पुनर्वास की क्या व्यवस्था होगी और कार्रवाई से पहले प्रत्येक परिवार के दस्तावेजों की जांच किस तरह होगी—इन सवालों के स्पष्ट जवाब प्रभावित लोगों के लिए बेहद महत्वपूर्ण हैं। मुंबई को सुरक्षित रखना प्रशासन की जिम्मेदारी है, लेकिन इस शहर को अपने पसीने से चलाने वाले गरीब और मेहनतकश परिवारों के अधिकारों की रक्षा भी उतनी ही जरूरी है। 39,111 संरचनाओं पर होने वाली कार्रवाई केवल एक प्रशासनिक अभियान नहीं रहेगी; इसके पीछे हजारों परिवारों की जिंदगी और उनके सिर पर छत का सवाल भी जुड़ा है।

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