जलाओ दिये …!

आपके पास
मुफ़्त का तेल
उधार की बाती है
हराम का पैसा हो
और
अक्ल बिल्कुल न हो
तो
जलाओ दिये
उसके नाम से
जिसने
न जाने कितनों के
तुम जैसे कितनों के
घर के दिये बुझा दिए
लोकतंत्र में
सभी मौलिक
अधिकारों के साथ
मूर्खता का भी
अधिकार है
जो कहीं दर्ज नहीं है
पर
भरपूर व्यवहार में है
जलाओ दिये !
यदि मर गया हो
आंख का पानी
और
विराट देश का अर्थ
एक बौने आदमी में
सिमट गया हो
जलाते समय
एक बार
उस कुम्हार को भी
याद करना
जिसने बड़ी शिद्दत से
गढ़े थे दिये
उस मज़दूर को भी
जिसने चुने थे कपास
बनाई थी रुई
और वह किसान भी
जिसके तिलहन का
पूरा मुआवज़ा
अब तक नहीं मिला
और उस आग के बारे में भी
ज़रूर सोचना
जो पूरे देश के
दिलों में सुलग रही है
फिर जलाना दिये
और सोचना
कुम्हार
किसान
मज़दूर
के मौजूदा हालात के लिए
यह महापुरुष
किस हद तक
ज़िम्मेदार है
और जलाना दिये
और यह याद रखना
कि दिया जलाना
अंधेरा मिटाना है
राह दिखाना है
समर्पित होना है
कृतज्ञ होना है
इसके बाद भी
दिया जला सको
तो ज़रूर जलाना
लेकिन
जलाने से पहले
ख़ुद से
एक सवाल
जरूर करना
कि आज से ठीक
दस दिन बाद
एक ऐसा सपूत
भारतमाता का
जन्मा था
जो सिर्फ़
तेईस साल की उम्र में
अपने साथियों के साथ
फांसी पर चढ़ गया था
पूछना अपने आप से
कि कितनी बार
उसके नाम पर
तुमने दिये जलाए थे
कितनी बार
उसके जन्मदिन
या शहादत पर
उसे याद किया था
यदि
उसका नाम भी
याद न आ रहा हो
तो अपने ही मुंह पर
थूक कर
पूरी बेशर्मी से
ज़रूर
दिये जलाओ
जयहिंद!
– हूबनाथ
