महाराष्ट्र में बनेगा ‘हजार दिनों का प्रारंभिक बाल्यावस्था विकास मिशन’, मुख्यमंत्री फडणवीस ने दिए निर्देश
माता और बच्चे को केंद्र में रखकर स्वास्थ्य व महिला-बाल विकास विभाग तैयार करेंगे मिशन, निगरानी के लिए बनेगा अलग सचिवालय

मुंबई। बच्चों के सर्वांगीण विकास के लिए विभिन्न विभागों के अलग-अलग काम करने के बजाय माता और बच्चे को केंद्र में रखकर एकीकृत रूप से काम किया जाएगा। मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने स्वास्थ्य तथा महिला एवं बाल विकास विभाग को संयुक्त रूप से ‘हजार दिनों का प्रारंभिक बाल्यावस्था विकास मिशन’ तैयार करने और उसका प्रारूप मंत्रिमंडल के समक्ष रखने के निर्देश दिए हैं। मिशन के प्रभावी क्रियान्वयन और नियमित डेटा आधारित निगरानी के लिए अलग मिशन सचिवालय स्थापित करने को भी कहा गया है। गुरुवार को मुख्यमंत्री की अध्यक्षता में सामाजिक क्षेत्र की वॉर रूम बैठक में प्रारंभिक बाल्यावस्था के सर्वांगीण विकास पर विस्तृत चर्चा हुई। बैठक में विशेषज्ञों और विभागीय अधिकारियों ने विभिन्न अनुभवों एवं योजनाओं की जानकारी दी। मेघालय में लागू किए गए कार्यक्रमों, महाराष्ट्र के विभिन्न क्षेत्रों के सफल प्रयोगों, आदिवासी क्षेत्रों की चुनौतियों और शहरी क्षेत्रों में बच्चों के पोषण की स्थिति पर भी चर्चा की गई।
मुख्यमंत्री ने कहा कि शिक्षा और स्वास्थ्य क्षेत्र की कई समस्याओं की जड़ प्रारंभिक बाल्यावस्था के विकास से जुड़ी है। केंद्र और राज्य सरकार के विभिन्न विभाग वर्षों से इस क्षेत्र में काम कर रहे हैं, लेकिन अपेक्षित परिणामों के लिए अब परिणाम एवं प्रमाण आधारित कार्यप्रणाली अपनाने की आवश्यकता है। उन्होंने माताओं में एनीमिया, कुपोषित बच्चों के जन्म, स्तनपान, टीकाकरण और पोषण से जुड़े मामलों की लगातार निगरानी पर जोर दिया। विशेष रूप से आदिवासी क्षेत्रों में स्वास्थ्य, महिला एवं बाल विकास, आदिवासी विकास और ग्राम विकास विभागों के समन्वित हस्तक्षेप की आवश्यकता बताई। मुख्यमंत्री ने कहा कि बाल्यावस्था विकास से जुड़ी समस्याएं कई विभागों से संबंधित हैं, इसलिए केवल विभागवार लक्ष्य तय करके उनका समाधान संभव नहीं है। माता और बच्चे का समग्र विकास मिशन का अंतिम लक्ष्य होना चाहिए। महिला एवं बाल विकास तथा स्वास्थ्य विभाग प्रमुख भागीदार के रूप में आदिवासी विकास, ग्राम विकास और स्कूली शिक्षा सहित संबंधित विभागों की भूमिकाएं निर्धारित करें। उन्होंने शहरी क्षेत्रों के लिए भी अलग और सुव्यवस्थित व्यवस्था की जरूरत बताई। विशेष रूप से झुग्गी बस्तियों और घनी आबादी वाले क्षेत्रों में कुपोषण की समस्या को देखते हुए लगातार हस्तक्षेप जरूरी है। मुख्यमंत्री के अनुसार, महाराष्ट्र में शहरी आबादी 50 प्रतिशत से अधिक हो चुकी है, जबकि पुरानी व्यवस्थाएं लगभग 30 प्रतिशत शहरी आबादी को ध्यान में रखकर तैयार की गई थीं। उन्होंने स्वास्थ्य विभाग के नए ‘अर्बन वर्टिकल’ का प्रभावी उपयोग करने को कहा।
मिशन के क्रियान्वयन के लिए अलग सचिवालय स्थापित कर नियमित रूप से आंकड़ों के आधार पर निगरानी करने के निर्देश देते हुए मुख्यमंत्री ने कहा कि केवल कागजी समन्वय के बजाय प्रत्येक विभाग की वास्तविक जिम्मेदारी स्पष्ट होनी चाहिए। उन्होंने कहा कि वास्तविक स्थिति बताने वाले आंकड़ों को दबाने या उनमें बदलाव करने से समस्याएं समाप्त नहीं होतीं। सही डेटा के आधार पर काम करने से समस्याओं का तेजी से समाधान किया जा सकता है। मुख्यमंत्री ने नाशिक, जालना, पुणे और नंदुरबार में अधिकारियों द्वारा किए गए सफल प्रयोगों का उल्लेख करते हुए उनके उपयोगी पहलुओं को मिशन में शामिल करने को कहा। उन्होंने स्पष्ट किया कि कुपोषण और बाल विकास से जुड़ी समस्याओं के समाधान के लिए ‘वन साइज फिट्स ऑल’ नीति नहीं अपनाई जानी चाहिए। स्थानीय परिस्थितियों, उपलब्ध संसाधनों, खान-पान की आदतों, जीवनशैली और परंपराओं के अनुरूप उपाय तैयार किए जाने चाहिए। पारंपरिक स्थानीय पोषण पद्धतियों का अध्ययन कर उपयोगी तरीकों को दोबारा व्यवहार में लाने पर भी जोर दिया गया। मुख्यमंत्री फडणवीस ने कहा कि ‘विकसित महाराष्ट्र’ और ‘विकसित भारत’ का लक्ष्य केवल आर्थिक या भौतिक विकास तक सीमित नहीं है। सरकारी व्यवस्थाओं का वास्तविक लाभ नागरिकों के जीवन में दिखाई देना चाहिए। समाज की प्रगति के बिना विकसित महाराष्ट्र का सपना पूरा नहीं हो सकता और इस दृष्टि से प्रारंभिक बाल्यावस्था का सर्वांगीण विकास बेहद महत्वपूर्ण है। उन्होंने यह भी कहा कि कुछ विषय केंद्र सरकार के अधिकार क्षेत्र में होने के कारण निर्णय में समय लग रहा हो तो राज्य को केवल इंतजार नहीं करना चाहिए। मूलभूत विषयों पर राज्य सरकार को आवश्यक निर्णय लेकर संसाधनों की व्यवस्था करनी चाहिए, ताकि मिशन की गति प्रभावित न हो। मुख्यमंत्री ने विश्वास जताया कि महाराष्ट्र इस दिशा में मिशन मोड में काम करेगा तो माता एवं बच्चों के स्वास्थ्य, पोषण और समग्र विकास में परिवर्तन की गति को काफी बढ़ाया जा सकता है।
