भारत को विश्वगुरु बनाने का कोई शॉर्टकट नहीं, हर नागरिक को निभानी होगी भूमिका: मोहन भागवत

विजयादशमी उत्सव में सामाजिक एकता, स्वदेशी, नशामुक्ति और सोशल मीडिया के जिम्मेदार इस्तेमाल पर दिया जोर

नागपुर। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के सरसंघचालक मोहन भागवत ने मंगलवार को कहा कि भारत अपनी सर्वोच्च प्रतिष्ठा प्राप्त कर विश्वगुरु बन सकता है, लेकिन इसके लिए कोई शॉर्टकट नहीं है। प्रत्येक नागरिक को व्यक्तिगत, पारिवारिक, सामाजिक और व्यावसायिक जीवन में जिम्मेदारी निभाते हुए छोटे-छोटे सकारात्मक बदलाव लाने होंगे। भागवत 20 अक्टूबर को नागपुर में आयोजित RSS के विजयादशमी उत्सव को संबोधित कर रहे थे। यह आयोजन संघ के शताब्दी वर्ष के कार्यक्रमों के समापन के अवसर पर हुआ। भागवत ने कहा कि भारत के आगे बढ़ने के साथ कुछ वैश्विक शक्तियां उसे एक मजबूत प्रतिस्पर्धी और महत्वपूर्ण लक्ष्य के रूप में देखती हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि ऐसी ताकतें भारत, हिंदू समाज और संघ को कमजोर करने के लिए योजनाएं बनाती हैं और देश के भीतर भी कुछ लोग जाने-अनजाने उनकी मदद करते हैं। उन्होंने कहा कि समाज और प्रशासन में समस्याएं हो सकती हैं तथा विरोध भी जायज हो सकता है, लेकिन किसी भी आंदोलन का उद्देश्य समाधान होना चाहिए, न कि समाज में वैमनस्य और विभाजन बढ़ाना। उन्होंने कहा कि भावनाएं कितनी भी तीव्र क्यों न हों, सभी गतिविधियां संविधान और कानून की सीमा में रहनी चाहिए। सामाजिक आंदोलनों में संवाद की गरिमा और मर्यादा बनाए रखने की जरूरत है। उनके अनुसार, अलग-अलग विचारों को दुश्मनी में बदलने, संस्थाओं के प्रति अविश्वास पैदा करने और अलगाव की भावना बढ़ाने वाली प्रवृत्तियों से सावधान रहना होगा। भागवत ने कहा कि केवल सरकार या केवल आंदोलन सभी सामाजिक समस्याओं का समाधान नहीं कर सकते। इसके लिए समाज की सक्रिय भागीदारी, संवाद और सामूहिक प्रयास जरूरी हैं। उन्होंने RSS के संस्थापक डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार के दृष्टिकोण का उल्लेख करते हुए कहा कि राष्ट्रीय लक्ष्य की प्राप्ति के लिए जीवन को समर्पित भाव से आगे बढ़ाना होगा। RSS की भूमिका पर उठने वाले सवालों का उल्लेख करते हुए भागवत ने कहा कि संगठन का कार्य निस्वार्थ सेवा, समर्पण और समाज के प्रति प्रेम पर आधारित है। उन्होंने विविधता के सम्मान को भारतीय दृष्टिकोण की विशेषता बताते हुए कहा कि धर्म, पंथ, भाषा, जाति, क्षेत्र, खान-पान और परंपराओं में भिन्नता के बावजूद राष्ट्रीय एकता तभी मजबूत होगी, जब सभी के प्रति अपनापन और सम्मान की भावना रहे। उन्होंने संघ के शताब्दी वर्ष में शुरू की गई पहलों का जिक्र करते हुए कहा कि स्वयंसेवकों ने विदेशों में भी भारत, हिंदुत्व और संघ के कार्यों के बारे में संवाद किया। उन्होंने स्वदेशी और राष्ट्रीय पहचान के प्रति जागरूकता बढ़ाने को भी महत्वपूर्ण बताया। भागवत ने ‘वंदे मातरम्’ को पूर्ण रूप से और गर्व के साथ गाने का आह्वान किया। उन्होंने कहा कि यह गीत बंगाल विभाजन विरोधी आंदोलन के दौरान प्रेरणा का स्रोत रहा और आज भी राष्ट्रीय एकता का प्रतीक है। सोशल मीडिया और तकनीक पर बोलते हुए भागवत ने कहा कि विज्ञान और तकनीक ने सूचनाओं तक पहुंच आसान बनाई है, लेकिन इनके दुष्प्रभावों पर भी गंभीरता से विचार करने की जरूरत है। उन्होंने कहा कि कुछ देशों ने सोशल मीडिया और डिजिटल प्लेटफॉर्म पर नियम और प्रतिबंध लागू किए हैं तथा भारत में भी सरकार को इस दिशा में विचार करना चाहिए। युवाओं को उचित और अनुचित सामग्री के बीच अंतर पहचानने का विवेक देना भी जरूरी है। नशीले पदार्थों की लत को उन्होंने गंभीर राष्ट्रीय समस्या बताया। भागवत ने कहा कि सरकार, प्रशासन और समाज को मिलकर समय रहते कदम उठाने चाहिए। उन्होंने घोषणा की कि स्वयंसेवक नशे के खिलाफ काम करने वाले संगठनों और लोगों को साथ लाकर देशव्यापी जनजागरण का प्रयास करेंगे। भागवत ने कहा कि विज्ञान और तकनीक मानव जीवन को बेहतर बनाने के महत्वपूर्ण साधन हैं, लेकिन उनका उपयोग संतुलित और व्यापक दृष्टिकोण से होना चाहिए। उन्होंने भारत की सनातन परंपरा को एकता, सामंजस्य, संयम और सार्वभौमिक भाईचारे पर आधारित बताते हुए कहा कि यही दृष्टिकोण दुनिया के सामने समग्र विकास का एक रास्ता प्रस्तुत कर सकता है।

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