
प्रयागराज, उत्तर प्रदेश। यूजीसी (विश्वविद्यालय अनुदान आयोग) के नए नियमों को लेकर जारी विवाद थमने का नाम नहीं ले रहा है। राजनीतिक दलों के बाद अब साधु-संत समाज भी खुलकर इसके विरोध में उतर आया है। उत्तर प्रदेश के कई जिलों में साधु-संतों ने इन नियमों को हिंदू समाज को बांटने वाला बताते हुए इन्हें तत्काल वापस लेने की मांग की है। ज्योतिष पीठ के शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद ने कहा कि कोई भी जाति जन्म से न तो अन्यायपूर्ण होती है और न ही पूरी तरह न्यायप्रिय। हर जाति में अच्छे और बुरे दोनों प्रकार के लोग होते हैं। उन्होंने कहा कि किसी एक जाति को दूसरी जाति के खिलाफ खड़ा करना सामाजिक ताने-बाने को तोड़ने जैसा है। स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद ने यूजीसी पर सीधा निशाना साधते हुए कहा कि नए नियमों के जरिए एक जाति को दूसरी जाति से लड़ाने की कोशिश की जा रही है, जिससे हिंदू समाज को भारी नुकसान हो सकता है। उन्होंने कहा कि यह कानून हिंदू समाज को कमजोर करने की साजिश जैसा प्रतीत होता है और इसे तुरंत रद्द किया जाना चाहिए। उन्होंने सवाल उठाया कि आखिर ऐसा कानून क्यों लाया गया, जिसका परिणाम समाज में टकराव और विभाजन हो सकता है। बरेली के सिटी मजिस्ट्रेट अलंकार अग्निहोत्री के इस्तीफे पर प्रतिक्रिया देते हुए शंकराचार्य ने कहा कि किसी अधिकारी का इतनी बड़ी पोस्ट छोड़ना इस बात का प्रमाण है कि उसके मन में पीड़ा कितनी गहरी रही होगी। उन्होंने कहा कि यह इस्तीफा इतिहास में दर्ज होगा और यह दिखाएगा कि किस प्रकार सनातन धर्म को मानने वालों की भावनाओं को आहत किया गया है। इधर, यूजीसी उच्च शिक्षा विनियम विवाद पर जगद्गुरु परमहंस आचार्य ने भी कड़ा रुख अपनाया है। उन्होंने आईएएनएस से बातचीत में बताया कि इस संबंध में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को पत्र भेजकर नए यूजीसी नियमों को वापस लेने का आग्रह किया गया है। उन्होंने कहा कि यदि ऐसा नहीं किया गया तो वे इच्छामृत्यु की अनुमति की मांग करेंगे। परमहंस आचार्य का आरोप है कि नए यूजीसी नियमों के चलते जनरल कैटेगरी की लगभग 35 प्रतिशत छात्राएं शोषण जैसी परिस्थितियों में फंस सकती हैं। उन्होंने आशंका जताई कि इन नियमों के कारण अपराध बढ़ सकते हैं और लोग इसका गलत फायदा उठा सकते हैं। उन्होंने सरकार से अपील की कि इन नियमों को जल्द वापस लिया जाए, ताकि सामान्य वर्ग के बच्चों को निष्पक्ष और सुरक्षित शिक्षा का अवसर मिल सके। यूजीसी के नए नियमों को लेकर संत समाज के इस तीखे विरोध से विवाद और गहराता जा रहा है। अब निगाहें सरकार के अगले कदम पर टिकी हैं कि वह इस बढ़ते असंतोष को कैसे संभालती है।




