Tuesday, January 13, 2026
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सावित्रीबाई फुले: सामाजिक एकता, शिक्षा और महिला सशक्तिकरण की अग्रदूत

हेमंत खुटे
ज्ञान ज्योति सावित्रीबाई फुले ने अपने अदम्य साहस और दूरद‌र्शिता से समाज में शिक्षा, समानता व देश में नारी शिक्षा की अलख जगाई। उनका सम्पूर्ण जीवन सामाजिक परिवर्तन एवं मानवता की अनुपम मिसाल है। सावित्रीबाई फुले एक महान समाज सेविका, शिक्षाविद और कवयित्री थीं। वह भारत की पहली महिला शिक्षिका तथा नारी अस्मिता को प्रतिष्ठित करने वाली जन नायिका थीं। सावित्रीबाई फुले ने अपने पति महात्मा ज्योतिबा फुले के साथ मिलकर सन 1848 में पुणे में भारत का पहला बालिका विद्यालय खोला। उस समय महिलाओं की शिक्षा को पाप माना जाता था लेकिन उन्होंने समाज के विरोध, अपमान और यहाँ तक कि लोगों द्वारा पत्थर-गोबर फेंके जाने के बावजूद हार नहीं मानी। उन्होंने न केवल लड़‌कियों को पढ़ाया बल्कि विधवाओं के अधिकार, छुआछूत के खिलाफ ,बाल विवाह और सती प्रथा के विरुद्ध भी संघर्ष किया। वे भारतीय नारी शिक्षा और महिला सशक्तिकरण की सच्ची प्रतीक है। सावित्रीबाई फुले ने शिक्षा को सामाजिक मुक्ति का सबसे प्रभावी हथियार माना। उनका मानना था कि शिक्षित व्यक्ति ही सामाजिक बेड़ि‌यों को तोड़ सकता है। शिक्षा मनुष्य को सोचने-समझने की शक्ति देती है। अज्ञानता व्यक्ति को अंधविश्वास, रूढ़ियों और अन्यायपूर्ण परंपराओं का गुलाम बना देती है। जब तक व्यक्ति शिक्षित नहीं होता तब तक सही- गलत का भेद नही कर पाता और शोषण को ही अपना भाग्य मान लेता है। शिक्षा उसे प्रश्न करने, तर्क करने और अन्याय के विरुद्ध आवाज उठाने का साहस देती है। सावित्रीबाई फुले सामाजिक एकता, शिक्षा और महिला सशक्तिकरण की अग्रदूत थीं। वे भारत की प्रथम महिला शिक्षिका, कवयित्री और समाज सेविका रहीं। उन्होंने बालिकाओं, विधवाओं और उपेक्षित लोगों की शिक्षा के लिए स्कूल खोलकर ऐतिहासिक पहल की। छुआछूत, बाल विवाह और सामाजिक कुरीतियों के विरुद्ध संघर्ष करते हुए उन्होंने अपना जीवन समाज सुधार को समर्पित किया। उनके प्रयासों से नारी शिक्षा और आत्म- सम्मान को नई दिशा मिली। सावित्रीबाई फुले का मानना था कि इंसान का सबसे बड़ा शत्रु उनकी अज्ञानता है। इसलिए उन्होंने कहा है कि अज्ञानता को तुम पकड़ो, धर दबोचो , मजबूती से पकड़कर उसे पीटो और उसे अपने जीवन से भगा दो। सावित्रीबाई फुले भारत की प्रथम महिला शिक्षिका ही नहीं बल्कि लैंगिक असमानता के विरुद्ध संघर्ष की अग्रदूत थी। उन्नीसवीं शताब्दी के दौर में स्त्रियों को शिक्षा, स्वतंत्रता और सम्मान से वंचित रखा जाता था। उन्हें केवल घर गृहस्थी तक सीमित मान लिया जाता था। ऐसे समय में सावित्रीबाई फूले ने इस अन्यायपूर्ण व्यवथा को खुली चुनौती। उन्होंने यह स्पष्ट रूप से कहा कि ‘स्त्रियां केवल घर और खेत तक सीमित रहने के लिए नहीं बनी हैं, बल्कि वे पुरुषों के समान और कई क्षेत्रों में उनसे बेहतर कार्य करने में सक्षम है। यह विचार उस दौर की सामाजिक मान्यताओं के विरुद्ध था जहाँ स्त्री को कमजोर और पुरुषों पर आश्रित समझा जाता था। उन्होंने बाल विवाह और सती प्रथा जैसी कुरीतियों का भी पुरजोर विरोध किया। विधवा महिलाओं को आश्रय देना तथा बालिकाओं के लिए पहला विद्यालय खोलना लैंगिक न्याय की दिशा में उनके क्रांतिकारी कदम थे। 1 जनवरी 1848 भारतीय इतिहास का वह स्वर्णिम दिन था, जब सदियों से स्त्री जीवन पर छाया अंधकार छंट गया और ज्ञान की रोशनी उन तक पहुंची। 1 जनवरी 1848 को पुणे में स्थित भींडेवाड़ा में ज्योतिबा फुले ने लड़‌कियों के लिए पहला स्कूल खोला। इसी स्कूल में प्रथम महिला अध्यापिका बनीं सावित्रीबाई फुले। ज्ञान की ज्योति जलाने वाली भारत की प्रथम महिला शिक्षिका, समाज सेवी और नारी सशक्तिकरण की प्रतीक सावित्रीबाई फुले व महान समाज सुधारक ज्योतिबा फुले केवल पहला स्कूल स्थापित कर नहीं रुके बल्कि फुले दम्पति ने 1848 से 1852 तक महज चार सालों में 18 स्कूल खोले। सावित्रीबाई फुले जब विद्यालय पढ़‌ने जाती थी तब असामाजिक तत्वों द्वारा उन पर पत्थर, गोबर, कीचड़ फेंके जाते थे। सार्वजनिक तौर पर अपमानित किया जाता था फिर भी वे सावित्रीबाई फुले के इरादों को डिगा नहीं पाए। सावित्रीबाई फुले ने इतना अपमानित होने के बाद भी बालिकाओं को प‌ढ़ाया, उन्हें शिक्षित किया। राष्ट्रनायिका, क्रांतिज्योति सावित्रीबाई फुले ने नारी शिक्षा, समानता और सामाजिक न्याय के लिये ताउम्र संघर्ष किया। उन्होंने बाल विवाह का विरोध किया। विधवा विवाह का समर्थन किया। कविताओं में शिक्षा और जाति भेद‌भाव के खिलाफ संदेश दिया। काव्यफुले (1854) और बावनकशी सुबोध रत्नाकर (1892) उनके प्रमुख काव्य संग्रह है। सावित्रीबाई फुले के अनुसार जब व्यक्ति शिक्षित होता है तो को वह मानवता, करुणा और न्याय के मार्ग पर चलता है – यही सच्ची पूजा है। ज्ञान, मनुष्य को अन्याय, भेदभाव और शोषण के विरुद्ध खड़ा होने की शक्ति देता है। बिना ज्ञान के धर्म अंधविश्वास बन सकता है लेकिन ज्ञान से जुड़ा धर्म मानव कल्याण का मार्ग दिखाता है। सावित्रीबाई फुले का मानना था कि आभूषण स्त्री के शरीर को सजा सकते हैं किन्तु शिक्षा उसके विचार आत्म- सम्मान और आत्मनिर्भरता को सजाती है। आज भी उनका यह कथन प्रासंगिक है। वास्तव में आभूषण समय के साथ टूट सकते है लेकिन शिक्षा रूपी गहना जीवन भर चमकता रहता है। इसलिए प्रत्येक समाज का दायित्व है कि वह हर बेटी को शिक्षा का यह अमूल्य गहना अवश्य पहनाएँ। वर्ष 1897 में पुणे में भयंकर प्लेग महामारी फैली हुई थी। चारों ओर भय, मृत्यु और असहायता का वातावरण व्याप्त था। लोग मरीजों के पास जाने से डरते थे क्योंकि संक्रमण का खतरा जानलेवा स्तर तक पहुंच चुका था। ऐसे संकट के समय भी सावित्रीबाई फुले अपने कर्तव्य से विमुख नहीं हुई और स्वयं के जीवन को जोखिम में डालकर पीड़ितों की सेवा की। इसी सेवा कार्य के चलते वे प्लेग की चपेट में आ गई और अंततः उनको जान गवानी पड़ी। उनका यह बलिदान मृत्यु नहीं बल्कि मानवता को समर्पित जीवन की शाश्वत गाथा है। (लेखक डॉ पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी स्मृति पुरस्कार से सम्मानित हैं)

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