शांतिपूर्ण विरोध का अधिकार, लेकिन दूसरों को परेशानी नहीं होनी चाहिए: बॉम्बे हाई कोर्ट

मुंबई में प्रदर्शन के दौरान कथित अवैध हिरासत पर महाराष्ट्र सरकार से जवाब तलब, अगली सुनवाई 19 नवंबर को

मुंबई। बॉम्बे हाई कोर्ट ने सोमवार को कहा कि नागरिकों को शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शन का अधिकार है, लेकिन इसके नाम पर कानून-व्यवस्था की समस्या पैदा नहीं की जा सकती और न ही दूसरों को परेशान किया जा सकता है। मुख्य न्यायाधीश महेश चंद्र त्रिपाठी और न्यायमूर्ति अद्वैत सेठना की पीठ मुंबई में मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ हुए प्रदर्शनों के दौरान कथित अवैध हिरासत और पुलिस कार्रवाई से जुड़ी जनहित याचिका पर सुनवाई कर रही थी। अदालत ने महाराष्ट्र सरकार को आरोपों पर जवाब दाखिल करने का निर्देश दिया है। याचिका में आरोप लगाया गया है कि 10 और 11 अक्टूबर को मुंबई में हुए प्रदर्शनों के दौरान बड़ी संख्या में लोगों को पुलिस ने अवैध रूप से हिरासत में लिया। याचिकाकर्ताओं की ओर से कहा गया कि कुछ लोगों को उनके घरों से उठाया गया, जबकि कुछ को पुलिस स्टेशन में घंटों रखा गया। अदालत के समक्ष कम से कम सात लोगों के हलफनामे भी रखे गए हैं, जिन्होंने दावा किया कि वे प्रदर्शन में शामिल नहीं थे, फिर भी उन्हें हिरासत में लिया गया। पीठ ने कहा कि प्रदर्शन में शामिल लोगों की पहचान और पृष्ठभूमि की जांच जरूरी है और बिना पूरी तस्वीर सामने आए पुलिस के खिलाफ एकतरफा आदेश नहीं दिया जा सकता। अदालत ने यह भी टिप्पणी की कि विरोध का अधिकार शांतिपूर्ण तरीके से ही प्रयोग किया जाना चाहिए। महाराष्ट्र सरकार की ओर से महाधिवक्ता मिलिंद साठे ने अदालत को बताया कि अगस्त क्रांति मैदान के पास किसी को अवैध रूप से हिरासत में नहीं लिया गया। उन्होंने कहा कि प्रदर्शन की अनुमति नहीं थी और कुछ प्रदर्शनकारियों द्वारा नाना चौक के पास सड़क अवरुद्ध किए जाने पर पुलिस ने भीड़ को हटाया था। सरकार ने पुलिस द्वारा अवैध हिरासत के आरोपों से इनकार किया। दूसरी ओर, हिरासत में लिए जाने का दावा करने वाले लोगों की ओर से पेश वकीलों ने आरोप लगाया कि कुछ लोगों को पूरे दिन पुलिस स्टेशन में रखा गया और बाद में घर से बाहर निकलने से रोका गया। स्थानीय निवासियों की ओर से भी हस्तक्षेप आवेदन दाखिल कर कहा गया कि प्रदर्शनों के कारण क्षेत्र में रहने वाले लोगों को परेशानी हुई। याचिका में दावा किया गया है कि दो दिनों के दौरान करीब 630 लोगों को हिरासत में लिया गया था। ये सभी आरोप फिलहाल अदालत के समक्ष विचाराधीन हैं और हाई कोर्ट ने अभी इनकी सत्यता पर कोई अंतिम निष्कर्ष नहीं दिया है। पीठ ने राज्य सरकार और मूल याचिकाकर्ताओं को दो सप्ताह के भीतर जवाब दाखिल करने तथा उसके बाद एक सप्ताह में प्रत्युत्तर देने का निर्देश दिया है। मामले की अगली सुनवाई 19 नवंबर को होगी।

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