प्राचीन भारतीय शिक्षा परंपरा का संरक्षण नई पीढ़ी की जिम्मेदारी: सीएम फडणवीस

एआई के दौर में सूचना को ज्ञान में बदलना और मातृभाषा से जुड़ाव जरूरी; 9वें अंतरराष्ट्रीय प्राचार्य शैक्षणिक सम्मेलन का समापन


नागपुर। मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने कहा कि भारत की प्राचीन शिक्षा व्यवस्था अत्यंत समृद्ध रही है। तक्षशिला, नालंदा और विक्रमशिला जैसे विश्वविद्यालयों में दुनिया के विभिन्न हिस्सों से विद्यार्थी ज्ञान प्राप्त करने आते थे। इस गौरवशाली शैक्षणिक विरासत को संरक्षित करना और उसे नई पीढ़ी तक पहुंचाना आज की जरूरत है। उन्होंने कहा कि कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) के युग में मानवीय मूल्यों, नैतिकता और चरित्र को बनाए रखना भी उतना ही महत्वपूर्ण है। शनिवार को मुख्यमंत्री फडणवीस नागपुर के मिहान स्थित इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ मैनेजमेंट (आईआईएम) में आयोजित 9वें अंतरराष्ट्रीय प्राचार्य शैक्षणिक सम्मेलन के समापन समारोह में बोल रहे थे। कार्यक्रम में स्कूली शिक्षा राज्यमंत्री डॉ. पंकज भोयर और पूर्व सांसद डॉ. नितीश भारद्वाज विशेष रूप से उपस्थित थे। इसके अलावा आईआईएम नागपुर के निदेशक डॉ. भीमराया मैत्री, द साउथ पब्लिक स्कूल की प्राचार्य डॉ. मृणालिनी दस्तुरे, शिक्षण और प्रकाशन क्षेत्र से जुड़े कई प्रतिनिधि भी मौजूद रहे। फडणवीस ने कहा कि आचार्य चाणक्य और पाणिनी जैसे विद्वानों के विचार और ग्रंथ आज भी प्रासंगिक हैं। प्राचीन भारतीय शिक्षा प्रणाली में शास्त्र और संवाद को महत्व दिया जाता था। शिक्षा केवल सैद्धांतिक ज्ञान तक सीमित नहीं थी, बल्कि उसमें व्यावहारिक समझ और कौशल विकास पर भी जोर था। इसी दृष्टिकोण से राष्ट्रीय, सामाजिक और व्यक्तिगत विकास का मार्ग प्रशस्त होता है। उन्होंने सम्मेलन में प्रस्तुत ‘जनरेशन वॉव’ (वर्ल्ड ऑफ वंडरफुल जनरेशन) की अवधारणा का उल्लेख करते हुए कहा कि आज की पीढ़ी सूचना के विस्फोट के बीच जन्मी है और तेजी से विकसित हो रही तकनीक के साथ आगे बढ़ रही है। उसके सामने बड़ी मात्रा में उपलब्ध सूचनाओं को ज्ञान में बदलने और उनका विवेकपूर्ण उपयोग करने की चुनौती है। सूचना को समझना, सही और गलत में अंतर करना तथा उसे नैतिकता और संवेदनशीलता के साथ व्यवहार में लाना ही वास्तविक ज्ञान है। मुख्यमंत्री ने कहा कि वर्तमान समय में शिक्षकों की भूमिका केवल विद्यार्थियों को जानकारी देने तक सीमित नहीं रहनी चाहिए। उन्हें विद्यार्थियों की विचार प्रक्रिया को सही दिशा देने और उनमें तर्क, विवेक तथा स्वतंत्र चिंतन की क्षमता विकसित करने पर ध्यान देना चाहिए। सम्मेलन में शिक्षा से जुड़ी इन चुनौतियों पर चर्चा होना महत्वपूर्ण है। प्राचीन भारत की शैक्षणिक समृद्धि का उल्लेख करते हुए फडणवीस ने कहा कि विभिन्न आक्रमणों और ऐतिहासिक परिस्थितियों के कारण देश की अनेक शैक्षणिक संस्थाएं और व्यवस्थाएं कमजोर हुईं। उन्होंने विलियम एडम के सर्वेक्षण का हवाला देते हुए बंगाल, बिहार और पंजाब में बड़ी संख्या में स्कूलों तथा मद्रास प्रेसीडेंसी में व्याकरण विद्यालयों का उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि समाज सुधारकों के प्रयासों से शिक्षा के प्रसार को फिर गति मिली और देश विकास की दिशा में आगे बढ़ा। उन्होंने राष्ट्रीय शिक्षा नीति का उल्लेख करते हुए कहा कि शिक्षा व्यवस्था में नई पद्धतियों और तकनीक को अपनाने के साथ मातृभाषा को भी महत्व देना चाहिए। विकसित देशों की शिक्षा प्रणालियों में मातृभाषा की अहम भूमिका है। तकनीक के अधीन होने के बजाय उसका कुशलतापूर्वक उपयोग करना जरूरी है, ताकि विद्यार्थियों का सर्वांगीण विकास हो सके। स्कूली शिक्षा राज्यमंत्री डॉ. पंकज भोयर ने कहा कि ‘वर्ल्ड ऑफ वंडरफुल जनरेशन’ की अवधारणा के तहत सम्मेलन में शिक्षा क्षेत्र की चुनौतियों पर विस्तृत चर्चा हुई। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में देश 2047 तक विकसित भारत के लक्ष्य की ओर बढ़ रहा है। महाराष्ट्र में ‘मुख्यमंत्री माझी शाला, सुंदर शाला’ और ‘मुख्यमंत्री विज्ञान विद्यार्थी वारी’ जैसे उपक्रमों के माध्यम से विद्यार्थियों के विकास पर ध्यान दिया जा रहा है। उन्होंने कहा कि शिक्षा का उद्देश्य केवल ज्ञान प्राप्त करना नहीं, बल्कि समाज में सकारात्मक परिवर्तन लाना भी है। प्राचार्य और शिक्षक विद्यार्थियों के भविष्य को आकार देने के साथ उनकी प्रतिभा को निखारने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। समारोह में मुख्यमंत्री फडणवीस के हाथों ‘पाथेय–द गोल्डन एलिक्सिर’ ई-स्मरणिका का विमोचन किया गया। शिक्षा और संस्कृति के क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान देने वाले व्यक्तियों को ‘नचिकेता’ और ‘सुपर नचिकेता’ पुरस्कारों से सम्मानित किया गया। सर्वश्रेष्ठ नचिकेत पुरस्कार डॉ. नितीश भारद्वाज को, जबकि लाइफटाइम नचिकेत पुरस्कार रजिया हुसैन और श्रद्धा केळापुरे को प्रदान किया गया। अकादमिक्स कंसल्टेंट की निदेशक एवं प्रमुख डॉ. इंदिरा नयना तथा सेंटर प्वाइंट स्कूल की प्राचार्य कंचन उके को सुपर नचिकेता पुरस्कार से सम्मानित किया गया। कार्यक्रम का संचालन डॉ. मृणालिनी दस्तुरे ने किया, जबकि मंगेश चिनेवार ने आभार व्यक्त किया। समारोह में शिक्षक, विद्यार्थी और नागरिक बड़ी संख्या में उपस्थित थे।

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