दृष्टिकोण: अराजकता की राजनीति और लोकतंत्र की परीक्षा

डॉ. सुधाकर आशावादी
सहमति और असहमति स्वस्थ लोकतंत्र की पहचान है। आम आदमी के लिए कल्याणकारी योजनाओं के साथ-साथ आम आदमी को राष्ट्र के प्रति उसकी जिम्मेदारियों का बोध कराना भी अनिवार्य होता है। भारत में अधिकारों के लिए भीड़ का सड़कों पर उतर आना नई बात नहीं है, लेकिन नागरिकों में कर्तव्यबोध का अभाव चिंता का विषय है। सर्वविदित है कि अंतरराष्ट्रीय चुनौतियों के बीच देश आगे बढ़ रहा है, लेकिन आम नागरिकों द्वारा वंशवादी राजनीति को नकारने के चलते हताश-निराश राजनेता तर्कहीन चिंतन के आधार पर देश में अराजकता का वातावरण बनाने पर उतारू रहते हैं। ऐसे तत्व न न्यायपालिका का सम्मान करते हैं और न ही राष्ट्रीय अनुशासन का अनुपालन करते हैं। ऐसे तत्वों की भाषा भी इतनी अमर्यादित होती है कि सभ्य समाज में जिसे स्वीकृति मिलना संभव नहीं होता। ऐसे में देश में अराजकता फैलाने वाले तत्वों पर किसी भी प्रकार का संवैधानिक शिकंजा न कसे जाने तथा अराजक गतिविधियों हेतु मिलने वाली फंडिंग के विरुद्ध कठोर कार्रवाई न होने के कारण देश की सामान्य गति को अवरुद्ध करने के प्रयास निरंतर हो रहे हैं। कौन नहीं जानता कि दिल्ली के जंतर-मंतर या रामलीला मैदान में होने वाले आंदोलनों में भीड़ जुटाने के नाम पर भाड़े की भीड़ का खर्चा भाड़े की भीड़ वहन नहीं करती। भीड़ में सम्मिलित महिला और पुरुषों के वक्तव्य भीड़ को भाड़े पर जुटाए जाने की पुष्टि करते हैं। जो राजनीतिक दल और नेता जनता का विश्वास खो चुके हैं तथा जिनके पैरों तले से राजनीति की जमीन खिसक चुकी है, वे येन-केन-प्रकारेण सत्ता में आने के लिए कुतर्क का प्रचार करते हैं। कभी उस चुनाव व्यवस्था को कटघरे में खड़ा करने का प्रयास करते हैं, जो व्यवस्था उनके द्वारा ही देश में लागू की गई थी, कभी आधुनिक संचार युग में आदिम युग की व्यवस्था लागू करने की वकालत करते हैं और भाड़े की भीड़ से दबाव बनाकर अपनी सुविधानुसार निर्णयों की अपेक्षा करते हैं। लोकतंत्र की सर्वाधिक दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति यही है कि जब सत्ता से दूर रहने की छटपटाहट तथाकथित सत्तालोभियों की सामान्य समझ को भी समाप्त कर देती है तथा वे केवल अपनी स्वार्थी सोच को ही अराजकता फैलाने का हथियार समझने लगते हैं। समस्या केवल एक दिशा में हो तो उसका निराकरण भी किया जा सकता है, लेकिन भारत में जाति, धर्म और क्षेत्र आधारित राजनीति के चलते तथाकथित दिशानायक देश के स्वस्थ लोकतंत्र को पंगु बनाने हेतु किसी भी हद तक राष्ट्र की प्रगति में बाधक बनने से नहीं चूक रहे हैं। यह बड़ी समस्या है, जिसका समुचित निदान करना राष्ट्र के लिए बड़ी चुनौती बन चुका है।

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