दृष्टिकोण: हिंदी के प्रति कितने समर्पित हैं हम?

डॉ.सुधाकर आशावादी
किसी कवि ने लिखा है – ‘सातों दिन भगवान के क्या मंगल क्या पीर, जिस दिन सोया देर तक भूखा रहा फ़कीर।’ व्यवहारिक सत्य भी यही है, कि दिनचर्या में जागरूकता की महत्वपूर्ण भूमिका है। यदि हम अपने कर्तव्य के प्रति जागरूक नहीं हैं, तब हमें अपने अधिकारों की बात नहीं करनी चाहिए। बहरहाल चौदह सितम्बर हिंदी दिवस से प्रारंभ होने वाली औपचारिकता हिंदी सप्ताह और हिंदी पखवाड़े तक निभाई जाती है, शेष ग्यारह महीने पन्द्रह दिन हिंदी हमारी संवाद की भाषा तो रहती है, मगर काम काज की नहीं। विषय हिंदी दिवस मनाने या न मनाने का नहीं है, विषय हिंदी दिवस की औपचारिकता निभाने का है, कि अधिकांश क्षेत्रों में हिंदी जिस प्रकार प्रचलन में है, उसके लिए विशेष दिवस, विशेष सप्ताह व विशेष पखवाड़ा मनाने की औपचारिकता निभाना कहाँ तक औचित्यपूर्ण है? विगत चालीस पचास बरसों से हिंदी दिवस पर बैंक, सहित अनेक सरकारी प्रतिष्ठानों में हिंदी को प्रोत्साहित करने के लिए विशेष कार्यक्रम आयोजित किये जाते हैं, जिनके लिए निर्धारित धनराशि का आवंटन किया जाता है। हिंदी के प्रोत्साहन के लिए सुलेख प्रतियोगिता, निबंध प्रतियोगिता, कविता लेखन जैसी प्रतियोगिता के कार्यालय स्तर पर आयोजन किये जाते हैं, जिनमें संस्थान के अधिकारियों व कर्मचारियों की भागीदारी होती है। हिंदी सप्ताह या हिंदी पखवाड़े के समापन के लिए हिंदी से जुड़े किसी विद्वान् लेखक, कवि या शिक्षाविद को मुख्य अतिथि बनाकर आमंत्रित किया जाता है। एक या डेढ़ घंटे के कार्यक्रम की औपचारिकता निभाकर हिंदी का महिमामंडन कर लिया जाता है। ऐसे कार्यक्रमों की विशेषता यह होती है, कि संस्थानों के गिने चुने कर्मचारियों व अधिकारियों के बीच ही आयोजित होने वाली प्रतियोगिता के पुरस्कारों की बन्दरबांट कर ली जाती है। हिंदी में हस्ताक्षर करने, हिंदी को कार्य व्यवहार में अपनाने का संकल्प लिया जाता है तथा हिंदी के नाम पर औपचारिकता पूरी की जाती है। मेरा मानना है, कि क्या केवल एक दिवस, एक सप्ताह या पखवाड़ा हिंदी के लिए पर्याप्त है? हिंदी के प्रति यदि समर्पित भाव नहीं है, तब हिंदी दिवस की औपचारिकता निभाना हास्यास्पद लगता है। विडंबना यह है कि हिंदी के नाम पर औपचारिकता निभाने वालों को पारिवारिक उत्सवों के निमंत्रण पत्र हिंदी में छपवाने में भी शर्म आती है, वे अपनी संतानों को हिंदी माध्यम के विद्यालयों में पढ़ाने से परहेज करते हैं। यही नहीं जिनकी आजीविका मुख्य रूप से हिंदी पर निर्भर है, उनके परिवारों में हिंदी का कितना सम्मान है, यह भी किसी से छुपा नहीं है। सो हिंदी का सम्मान मन से होना अपेक्षित है तथा इसके विस्तार के लिए उन प्रान्तों में हिंदी से जुड़े दिवस, सप्ताह व पखवाड़े मनाए जाना तर्कसंगत है, जहाँ हिंदी को अपनी सार्थकता सिद्ध करनी है।

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