जयप्रकाश और संपूर्ण क्रांति: लोकतंत्र के मूल्यों की पुनर्स्थापना का आह्वान

रविशंकर कुमार चौधरी
भारत के लोकतांत्रिक इतिहास में 5 जून, 1974 एक ऐसा दिन है जो व्यापक सामाजिक और वैचारिक जागरण का प्रतीक बन गया। इसी दिन लोकनायक जयप्रकाश नारायण ने पटना के ऐतिहासिक गांधी मैदान से संपूर्ण क्रांति का आह्वान किया था। यह आंदोलन केवल किसी सरकार के खिलाफ विरोध का स्वर नहीं था, बल्कि लोकतंत्र की आत्मा को जगाने वाला वह प्रयास था जिसने व्यवस्था परिवर्तन की मांग करते हुए राष्ट्र को पुनर्रचना की दिशा में सोचने को विवश किया। संपूर्ण क्रांति’ का अर्थ था – राजनीतिक सत्ता के परिवर्तन से आगे जाकर समाज, संस्कृति, अर्थव्यवस्था, शिक्षा और नैतिक जीवन के हर स्तर पर बदलाव की आवश्यकता को स्वीकार करना। 1970 के दशक में भारत गंभीर आर्थिक संकट, महंगाई, बेरोजगारी और शासन व्यवस्था की विफलताओं से जूझ रहा था। युवाओं और छात्रों में असंतोष गहराता जा रहा था, विशेषकर बिहार जैसे राज्यों में जहाँ शैक्षणिक और प्रशासनिक ढांचे चरमराने लगे थे। इन्हीं परिस्थितियों में छात्रों द्वारा शुरू किए गए आंदोलनों को व्यापक दिशा देने के लिए जयप्रकाश नारायण को नेतृत्व के लिए आमंत्रित किया गया। उन्होंने न केवल आंदोलन का नेतृत्व स्वीकार किया, बल्कि इसे वैचारिक स्वरूप देते हुए संपूर्ण क्रांति का नाम दिया, जिसका उद्देश्य था- नए भारत की संरचना। जेपी का मानना था कि लोकतंत्र केवल चुनावों और सत्ता परिवर्तन तक सीमित नहीं होना चाहिए, बल्कि यह जनभागीदारी, पारदर्शिता, सेवा और नैतिकता पर आधारित होना चाहिए। उन्होंने राजनीति को जनसेवा का माध्यम मानते हुए उसमें युवाओं की भागीदारी को आवश्यक बताया। उनका विश्वास था कि यदि व्यवस्था शोषणकारी और भ्रष्ट हो चुकी है तो उसके ढांचे में बदलाव आवश्यक है। उन्होंने राजनीतिक, सामाजिक, शैक्षणिक, आर्थिक, सांस्कृतिक और नैतिक – इन सात क्षेत्रों में समांतर क्रांति की आवश्यकता पर बल दिया। धीरे-धीरे जेपी का नेतृत्व संपूर्ण राष्ट्र में लोकतांत्रिक चेतना का वाहक बन गया। जब इस आंदोलन की तीव्रता ने तत्कालीन इंदिरा गांधी सरकार की नींव हिला दी, तब सत्ता ने इसे दबाने का रास्ता चुना। 25 जून, 1975 को आपातकाल की घोषणा कर दी गई। नागरिक अधिकारों का हनन, प्रेस की स्वतंत्रता पर अंकुश और विपक्षी नेताओं की गिरफ्तारी जैसे कठोर कदम उठाए गए। किंतु संपूर्ण क्रांति की चेतना को बलपूर्वक दबाया नहीं जा सका। जनता के भीतर जाग चुकी लोकतांत्रिक चेतना ने 1977 के आम चुनाव में सत्ता परिवर्तन के रूप में ऐतिहासिक परिणाम दिए और पहली बार कांग्रेस को सत्ता से बाहर होना पड़ा। कहा जाता है कि जब इंदिरा गांधी 1977 का चुनाव हार गईं और नई सरकार उनसे राजनीतिक बदला लेने पर तुली थी, तो यह बात जेपी को पता चली। वे चिंतित हुए और उन्होंने बयान दिया कि इंदिरा गांधी का राजनीतिक जीवन अभी खत्म नहीं हुआ है। यह जनता पार्टी के लोगों के लिए संदेश था कि बदले की राजनीति न की जाए। वे इंदिरा गांधी से मिलने उनके आवास भी गए। कहा जाता है कि उस भेंट के दौरान इंदिरा गांधी भावुक हो गईं। जेपी ने पूछा- अब जब तुम प्रधानमंत्री नहीं हो तो तुम्हारा खर्च कैसे चलेगा?” इंदिरा गांधी ने जवाब दिया कि नेहरू जी की पुस्तकों की रॉयल्टी से उनका जीवन-यापन हो जाएगा। जेपी ने उन्हें आश्वस्त किया कि उनके साथ कोई राजनीतिक ज्यादती नहीं की जाएगी। इस बारे में उन्होंने मोरारजी देसाई और चरण सिंह से भी अपील की। संपूर्ण क्रांति महज एक राजनीतिक आंदोलन नहीं था, बल्कि वह विचारधारा थी जो आज भी लोकतंत्र की मजबूती के लिए प्रेरणा स्रोत है। वर्तमान समय में जब लोकतांत्रिक संस्थानों की स्वतंत्रता, नैतिक मूल्यों की रक्षा और जवाबदेही जैसे पहलुओं पर पुनः प्रश्न उठने लगे हैं, तब जयप्रकाश नारायण का आह्वान हमें यह स्मरण कराता है कि लोकतंत्र को जीवंत बनाए रखने के लिए निरंतर सुधार, सजगता और साहसिक हस्तक्षेप आवश्यक हैं। वास्तव में, संपूर्ण क्रांति लोकतंत्र के मूल्यों की पुनर्स्थापना और नैतिक पुनर्जागरण का आह्वान है। (लेखक तेज नारायण बनैली महाविद्यालय, भागलपुर में इतिहास के विभागाध्यक्ष हैं।)
