दिल्ली चलो रैली से कितना बदलेगा सियासी परिदृश्य?

सौरभ वार्ष्णेय
भारतीय लोकतंत्र में चुनाव केवल सरकार चुनने का माध्यम नहीं, बल्कि जनता के विश्वास, संवैधानिक संस्थाओं की निष्पक्षता और नागरिक अधिकारों की अभिव्यक्ति का आधार हैं। ऐसे में जब चुनाव प्रक्रिया अथवा मतदाता सूची की शुद्धता पर सवाल उठते हैं, तो उनका महत्व किसी एक राजनीतिक दल या गठबंधन तक सीमित नहीं रहता। यह लोकतंत्र की विश्वसनीयता से जुड़ा विषय बन जाता है। इसी संदर्भ में इंडिया गठबंधन ने चुनाव आयोग के खिलाफ अपना राजनीतिक अभियान तेज करने की तैयारी की है। गठबंधन की प्रस्तावित ‘दिल्ली चलो रैली और मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ प्रतीकात्मक ‘जन महाभियोग की घोषणा ने चुनावी पारदर्शिता, संवैधानिक जवाबदेही और विपक्ष की राजनीति को एक बार फिर चर्चा के केंद्र में ला दिया है। वहीं एसआईआर का आशय था कि मतदाता सूचि को संशोधित किया जाये जबकि बार बार सिस्टम की नाकामी साबित सामने आ रही है। ऐसे में इंडिया गठबंधन के दिल्ली चलो रैली से किना सियासी परिदृश्य बदलेगा यह देखने वाली बात होगी? इंडिया गठबंधन को ले तो इनके प्रस्तावित कार्यक्रम के अनुसार, 30 अक्टूबर को मुख्य चुनाव आयुक्त के खिलाफ प्रतीकात्मक ‘जन महाभियोग आयोजित किया जाएगा, जबकि एक नवंबर को दिल्ली के रामलीला मैदान में ‘दिल्ली चलोÓ रैली होगी। कांग्रेस महासचिव केसी वेणुगोपाल के अनुसार, इस कार्यक्रम के माध्यम से मुख्य चुनाव आयुक्त को पद से हटाने की मांग को लेकर जनता के सामने अपना पक्ष रखा जाएगा। गठबंधन का आरोप है कि मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी एसआईआर की प्रक्रिया में अनियमितताएं हुई हैं। हालांकि, इन आरोपों की वास्तविकता का आकलन संबंधित तथ्यों, दस्तावेजों और चुनाव आयोग के जवाब के आधार पर ही किया जाना चाहिए। भारत जैसे विशाल लोकतंत्र में मतदाता सूची तैयार करना और उसे नियमित रूप से अद्यतन रखना एक चुनौतीपूर्ण कार्य है। पात्र मतदाताओं के नाम सूची में शामिल हों और अपात्र नाम हटाए जाएं, यह सुनिश्चित करना निर्वाचन व्यवस्था की जिम्मेदारी है। लेकिन इस प्रक्रिया में किसी पात्र नागरिक का नाम छूटने, गलत तरीके से हटने या किसी अन्य प्रकार की त्रुटि की शिकायत सामने आती है, तो उसे गंभीरता से लिया जाना चाहिए। एसआईआर जैसी प्रक्रिया का उद्देश्य मतदाता सूची को अधिक सटीक बनाना हो सकता है, लेकिन उसकी सफलता केवल प्रशासनिक आंकड़ों से नहीं, बल्कि पारदर्शिता और नागरिकों के भरोसे से तय होगी। यदि किसी मतदाता को अपना नाम हटाए जाने या शामिल नहीं किए जाने की आशंका है, तो उसे आपत्ति दर्ज कराने, दस्तावेज प्रस्तुत करने और समयबद्ध समाधान प्राप्त करने का प्रभावी अवसर मिलना चाहिए। विशेष रूप से गरीबों, प्रवासी श्रमिकों, बुजुर्गों और उन नागरिकों के लिए व्यवस्था सरल होनी चाहिए, जिनके पास आवश्यक दस्तावेज जुटाने के सीमित साधन हैं। इंडिया गठबंधन ने इसी प्रक्रिया में कथित गड़बडिय़ों को अपना प्रमुख मुद्दा बनाया है। अब महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि क्या विपक्ष अपने आरोपों को ठोस प्रमाणों के साथ सामने रख पाएगा और क्या चुनाव आयोग प्रत्येक शिकायत का स्पष्ट एवं तथ्यपरक उत्तर देगा? लोकतांत्रिक व्यवस्था में आरोप लगाने का अधिकार विपक्ष को है, लेकिन आरोपों की जांच और निष्कर्ष तथ्यों के आधार पर ही निकलने चाहिए। चुनाव आयोग एक संवैधानिक संस्था है, जिसकी विश्वसनीयता लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है। उसकी जिम्मेदारी केवल चुनाव संपन्न कराना नहीं, बल्कि यह सुनिश्चित करना भी है कि पूरी प्रक्रिया निष्पक्ष, पारदर्शी और कानून के अनुरूप हो। आयोग के प्रति जनता का विश्वास कमजोर पड़ता है, तो चुनाव परिणामों की स्वीकार्यता और राजनीतिक व्यवस्था की स्थिरता भी प्रभावित हो सकती है। इसलिए चुनाव आयोग को विपक्ष की आलोचना को केवल राजनीतिक आरोप मानकर खारिज करने के बजाय, जहां आवश्यक हो, तथ्यों के साथ जवाब देना चाहिए। मतदाता सूची में संशोधन, नाम हटाने की प्रक्रिया, दावों और आपत्तियों के निस्तारण तथा शिकायतों पर कार्रवाई से संबंधित जानकारी सार्वजनिक करना इस दिशा में उपयोगी कदम हो सकता है। दूसरी ओर, किसी संवैधानिक पदाधिकारी पर लगाए गए आरोपों को प्रमाणित मान लेना भी उचित नहीं होगा। मुख्य चुनाव आयुक्त के खिलाफ इस्तीफे की मांग करना विपक्ष का राजनीतिक अधिकार है, लेकिन पद से हटाने की प्रक्रिया संवैधानिक और कानूनी प्रावधानों के अनुरूप ही हो सकती है। प्रतीकात्मक ‘जन महाभियोग जनता के बीच राजनीतिक संदेश देने का माध्यम हो सकता है, परंतु वह अपने आप में किसी संवैधानिक पदाधिकारी को हटाने की औपचारिक कानूनी प्रक्रिया का विकल्प नहीं है। रामलीला मैदान में प्रस्तावित रैली इंडिया गठबंधन के लिए अपनी एकजुटता प्रदर्शित करने का अवसर भी होगी। चुनावी पारदर्शिता जैसे मुद्दे पर विपक्ष विभिन्न दलों को एक मंच पर लाने का प्रयास कर रहा है। यदि गठबंधन इस अभियान को केवल नारों और आरोपों तक सीमित रखने के बजाय प्रभावित मतदाताओं की शिकायतों, दस्तावेजी साक्ष्यों और सुधार के ठोस सुझावों से जोड़ता है, तो उसे व्यापक जनसमर्थन मिल सकता है।लेकिन विपक्ष के सामने एक चुनौती यह भी है कि जनता के सामने उसकी विश्वसनीयता केवल सरकार या चुनाव आयोग की आलोचना से नहीं बनेगी। उसे यह बताना होगा कि मतदाता सूची की त्रुटियों को दूर करने के लिए वह कौन-से व्यावहारिक उपाय चाहता है और नागरिकों के मतदान के अधिकार की रक्षा के लिए उसकी स्पष्ट कार्ययोजना क्या है। राजनीतिक दलों के लिए यह भी जरूरी है कि वे अपनी शिकायतों को संबंधित वैधानिक मंचों पर उठाएं और उपलब्ध कानूनी उपायों का उपयोग करें।वहीं, सत्तापक्ष और चुनाव आयोग की ओर से भी अपेक्षा की जाती है कि वे इस मुद्दे को केवल विपक्ष की राजनीति बताकर टालने के बजाय सार्वजनिक विश्वास को मजबूत करने वाले कदम उठाएं। लोकतंत्र में संस्थाओं की प्रतिष्ठा आलोचना से नहीं, बल्कि पारदर्शी कामकाज, जवाबदेही और निष्पक्ष आचरण से मजबूत होती है। इंडिया गठबंधन की ‘दिल्ली चलो रैली और मुख्य चुनाव आयुक्त के खिलाफ प्रस्तावित प्रतीकात्मक कार्यक्रम का वास्तविक महत्व इस बात से तय होगा कि इससे मतदाता सूची की शुद्धता और चुनावी प्रक्रिया में पारदर्शिता को लेकर कितनी सार्थक चर्चा आगे बढ़ती है। केवल भीड़ जुटाना या राजनीतिक आरोपों को दोहराना किसी समस्या का स्थायी समाधान नहीं है। इसी तरह, शिकायतों को अनदेखा करना भी लोकतांत्रिक विश्वास के लिए उचित नहीं होगा। जरूरत इस बात की है कि मतदाता सूची से जुड़ी प्रत्येक गंभीर शिकायत की निष्पक्ष जांच हो, प्रभावित नागरिकों को न्याय मिले और चुनाव आयोग अपने निर्णयों तथा प्रक्रियाओं के संबंध में पर्याप्त पारदर्शिता बनाए रखे। विपक्ष को भी अपने आरोपों के समर्थन में प्रमाण प्रस्तुत करने चाहिए और राजनीतिक आंदोलन को संस्थागत सुधारों से जोडऩा चाहिए। लोकतंत्र की मजबूती सत्ता पक्ष की जीत या विपक्ष की हार से नहीं, बल्कि इस विश्वास से तय होती है कि प्रत्येक पात्र नागरिक का मत सुरक्षित है और चुनाव प्रक्रिया कानून के अनुसार निष्पक्ष ढंग से संचालित होती है। अंतत: चुनाव आयोग, राजनीतिक दलों और सरकार—सभी की जवाबदेही जनता के प्रति है। यदि ‘दिल्ली चलो अभियान इस जवाबदेही को मजबूत करने और मतदाता के अधिकारों की रक्षा के लिए ठोस पहल का माध्यम बनता है, तो इसका महत्व किसी एक रैली या राजनीतिक टकराव से कहीं अधिक होगा।
