क्या मुंबई में खौफ फिर लौट आया है?

सौरभ वार्ष्णेय
मुंबई को देश की आर्थिक राजधानी ही नहीं, बल्कि सपनों के शहर के रूप में भी जाना जाता है। यहां हर दिन लाखों लोग बेहतर भविष्य की उम्मीद लेकर पहुंचते हैं। मायानगरी की चमक-दमक, फिल्मी सितारों की लोकप्रियता, उद्योग व्यापार की रफ्तार और चौबीसों घंटे सक्रिय रहने वाली जिंदगी मुंबई की पहचान है। लेकिन जब इसी महानगर में सरेआम गोलीबारी की घटनाएं सामने आती हैं, तो एक सवाल स्वाभाविक रूप से उठता है । क्या मुंबई में खौफ फिर लौट आया है? क्या कभी संगठित अपराध और अंडरवर्ल्ड की दहशत के लिए चर्चा में रहने वाला यह शहर एक बार फिर असुरक्षा के साये में जाने लगा है?अभिनेता टाइगर श्रॉफ की गाड़ी पर जुहू के पुष्पा पार्क इलाके के पास कथित गोलीबारी की घटना ने सुरक्षा व्यवस्था को लेकर गंभीर चिंताएं पैदा की हैं। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, बाइक सवार तीन लोग वहां पहुंचे और अचानक टाइगर श्रॉफ की गाड़ी पर गोलियां चलाने लगे। इस घटना में अभिनेता के सुरक्षित होने की बात सामने आई है, जबकि उनके ड्राइवर और पास में मौजूद एक ऑटो-रिक्शा चालक के घायल होने की सूचना है। घायलों को उपचार के लिए अस्पताल पहुंचाया गया और पुलिस हमलावरों की तलाश में जुटी है।यदि घटना से जुड़ी ये जानकारियां जांच में पुष्ट होती हैं, तो यह केवल किसी फिल्मी सितारे की सुरक्षा का मामला नहीं रह जाता। यह उस आम नागरिक की सुरक्षा का भी प्रश्न बन जाता है, जो रोजी-रोटी कमाने के लिए सड़क पर निकलता है, ऑटो चलाता है, टैक्सी में सफर करता है या अपने काम से घर लौट रहा होता है।
किसी चर्चित अभिनेता की गाड़ी पर गोलीबारी होने से खबर सुर्खियों में आना स्वाभाविक है। टाइगर श्रॉफ की लोकप्रियता के कारण इस घटना पर देशभर की निगाहें टिकना भी असामान्य नहीं है। मगर इस घटना का सबसे गंभीर पहलू यह है कि गोलीबारी की चपेट में वे लोग भी आ सकते थे, जिनका न तो फिल्मी दुनिया से कोई संबंध है और न ही किसी विवाद से। ड्राइवर और ऑटो-रिक्शा चालक जैसे आम लोग ऐसी घटनाओं में बिना किसी गलती के अपनी जान जोखिम में डाल देते हैं। सवाल यह है कि अगर सार्वजनिक स्थानों पर इस तरह अचानक गोलियां चलाई जा सकती हैं, तो आम नागरिक कितने सुरक्षित हैं? सड़क पर खड़ा व्यक्ति, बाजार में खरीदारी करने वाला परिवार, देर रात ड्यूटी से लौटता कर्मचारी और अपने बच्चों के साथ बाहर निकला अभिभावक । इन सभी को सुरक्षा का भरोसा मिलना चाहिए। कानून-व्यवस्था का वास्तविक आकलन केवल बड़े लोगों की सुरक्षा से नहीं, बल्कि आम जनता के भयमुक्त जीवन से होता है।
मुंबई ने एक दौर में अंडरवर्ल्ड, जबरन वसूली और संगठित अपराध की चुनौतियों का सामना किया है। उस दौर में फिल्म उद्योग, कारोबारी जगत और आम नागरिकों के बीच भय का वातावरण पैदा करने वाली घटनाएं भी हुई थीं। पुलिस की कार्रवाई, खुफिया तंत्र की सक्रियता और कानून के सख्त इस्तेमाल से शहर ने कई मोर्चों पर अपनी स्थिति मजबूत की। ऐसे में गोलीबारी जैसी कोई घटना लोगों को उस पुराने दौर की याद दिला सकती है। हालांकि, किसी एक घटना के आधार पर यह निष्कर्ष निकालना उचित नहीं होगा कि मुंबई में अंडरवर्ल्ड का पुराना आतंक लौट आया है। इसके पीछे व्यक्तिगत रंजिश, आपराधिक गिरोहों की गतिविधि, धमकी, वसूली या कोई अन्य कारण है या नहीं, यह जांच पूरी होने के बाद ही स्पष्ट होगा। लेकिन इतना तय है कि ऐसी घटनाओं को हल्के में लेने की गुंजाइश नहीं है। समय रहते अपराधियों की पहचान, उनके नेटवर्क का खुलासा और हथियारों की उपलब्धता के स्रोत तक पहुंचना जरूरी है। यदि घटना के पीछे संगठित अपराध का हाथ निकलता है, तो कार्रवाई केवल गोली चलाने वालों तक सीमित नहीं रहनी चाहिए, बल्कि पूरे नेटवर्क को ध्वस्त करने की दिशा में बढऩी चाहिए। मुंबई पुलिस देश के सबसे अनुभवी पुलिस बलों में गिनी जाती है। शहर की आबादी, आर्थिक गतिविधियों और संवेदनशील प्रतिष्ठानों को देखते हुए यहां सुरक्षा व्यवस्था बनाए रखना एक बड़ी जिम्मेदारी है। ऐसे में पुलिस के सामने चुनौती केवल घटना के बाद आरोपियों को गिरफ्तार करने की नहीं, बल्कि भविष्य में इस तरह की वारदातों को रोकने की भी है। जांच एजेंसियों को घटनास्थल के सीसीटीवी फुटेज, प्रत्यक्षदर्शियों के बयान, इस्तेमाल किए गए हथियारों और हमलावरों के आने-जाने के रास्तों की पड़ताल करनी चाहिए। गोलीबारी के पीछे की मंशा का पता लगाना भी उतना ही महत्वपूर्ण है। क्या किसी को डराने की कोशिश की गई? क्या किसी तरह की धमकी दी गई थी? क्या यह किसी आपराधिक गिरोह की गतिविधि है? इन सभी सवालों के जवाब तथ्यों और साक्ष्यों के आधार पर सामने आने चाहिए। साथ ही, घायल लोगों को बेहतर उपचार उपलब्ध कराने और उनके बयान दर्ज करने की प्रक्रिया में संवेदनशीलता बरतना जरूरी है। पुलिस की जांच पारदर्शी होनी चाहिए, ताकि जनता के बीच फैलने वाली अफवाहों और अनावश्यक भय पर भी अंकुश लगाया जा सके। किसी महानगर में गोलीबारी की घटना केवल पुलिस की गश्त पर सवाल नहीं उठाती, बल्कि यह भी पूछती है कि अपराधियों तक हथियार कैसे पहुंच रहे हैं। यदि जांच में अवैध हथियारों के इस्तेमाल की पुष्टि होती है, तो हथियारों की तस्करी और उनकी आपूर्ति करने वाले नेटवर्क पर कार्रवाई अनिवार्य हो जाती है। अपराध रोकने के लिए सड़कों पर पुलिस की मौजूदगी के साथ-साथ खुफिया जानकारी जुटाने, संदिग्ध गतिविधियों पर नजर रखने और विभिन्न सुरक्षा एजेंसियों के बीच समन्वय को मजबूत करना होगा। संवेदनशील इलाकों में प्रभावी निगरानी, त्वरित पुलिस प्रतिक्रिया और तकनीक का जिम्मेदार इस्तेमाल अपराधियों के लिए मुश्किलें बढ़ा सकता है।सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि कानून का भय अपराधियों के मन में होना चाहिए, नागरिकों के मन में नहीं। यदि अपराधी इस विश्वास के साथ वारदात करते हैं कि वे आसानी से बच निकलेंगे, तो यह व्यवस्था के लिए गंभीर चेतावनी है। त्वरित जांच, निष्पक्ष अभियोजन और दोष सिद्ध होने पर कानून के अनुसार सजा ही न्याय व्यवस्था में विश्वास मजबूत कर सकती है। ऐसी घटनाओं के बाद सोशल मीडिया पर तरह-तरह के दावे और अपुष्ट जानकारियां प्रसारित होने लगती हैं। कभी किसी गिरोह का नाम उछाला जाता है, तो कभी बिना प्रमाण किसी बड़े षड्यंत्र की चर्चा होने लगती है। इससे जांच प्रभावित हो सकती है और आम लोगों में बेवजह डर फैल सकता है।मीडिया की जिम्मेदारी है कि वह घटना की गंभीरता को सामने लाए, पुलिस से जवाबदेही मांगे और जनता को सही जानकारी दे। लेकिन जांच पूरी होने से पहले किसी व्यक्ति या संगठन को दोषी ठहराना पत्रकारिता के मूल सिद्धांतों के विरुद्ध है। लोकतंत्र में सवाल पूछना जरूरी है, मगर सवालों के जवाब तथ्यों और प्रमाणों के आधार पर तलाशना उससे भी अधिक जरूरी है।
मुंबई की पहचान उसकी जीवंतता, मेहनतकश लोगों और विपरीत परिस्थितियों से उबरने की क्षमता से बनी है। किसी गोलीबारी की घटना से पूरे शहर को असुरक्षित घोषित करना उचित नहीं, लेकिन ऐसी वारदातों को सामान्य मान लेना भी खतरनाक है। शहर की आर्थिक गतिविधियों और सामाजिक जीवन को निर्भय बनाए रखने के लिए नागरिकों का भरोसा कायम रहना चाहिए।महाराष्ट्र सरकार और मुंबई पुलिस को यह सुनिश्चित करना होगा कि अपराधियों के खिलाफ कार्रवाई निष्पक्ष, प्रभावी और समयबद्ध हो। फिल्मी सितारों और अन्य महत्वपूर्ण व्यक्तियों की सुरक्षा के साथ आम नागरिकों की सुरक्षा भी प्राथमिकता होनी चाहिए, जो रोज सड़कों पर काम करते हैं और शहर की अर्थव्यवस्था को गति देते हैं।टाइगर श्रॉफ की गाड़ी पर कथित गोलीबारी की घटना मुंबई के लिए एक गंभीर चेतावनी है। अभी यह कहना जल्दबाजी होगी कि शहर में अंडरवर्ल्ड का पुराना खौफ लौट आया है, लेकिन यह सवाल जरूर उठता है कि अपराधियों के हौसले बढऩे की किसी भी संभावना को समय रहते कैसे रोका जाए। पुलिस को जांच के जरिए सच्चाई सामने लानी होगी, अपराधियों को कानून के कटघरे में खड़ा करना होगा और जनता को सुरक्षा का भरोसा देना होगा। मुंबई को डर के साये में नहीं, विश्वास और सुरक्षा के वातावरण में आगे बढऩा चाहिए। मायानगरी की असली ताकत उसकी चमक-दमक नहीं, बल्कि उसके नागरिकों का साहस और कानून पर उनका भरोसा है। इस भरोसे को बनाए रखना ही शासन और पुलिस की सबसे बड़ी कसौटी है।
