
मुंबई। हिंद-दी-चादर के नाम से विख्यात सिखों के नौवें गुरु गुरु तेग बहादुर के 350वें शहीदी समागम का आयोजन पूरे राज्य में श्रद्धा, उत्साह और भव्यता के साथ किया गया। नागपुर और नांदेड में अल्पसंख्यक विकास विभाग, राज्यस्तरीय समन्वय समिति तथा सिख सिकलीगर, बंजारा, लबाना, मोहयाल, सिंधी, वाल्मीकि, उदासीन एवं भगत नामदेव संप्रदाय समुदाय के संयुक्त तत्वावधान में कार्यक्रम सफलतापूर्वक संपन्न हुए। इन आयोजनों में राज्य और देशभर से लाखों श्रद्धालु शामिल हुए। कार्यक्रमों के माध्यम से युवा पीढ़ी को गुरु तेग बहादुर के शौर्य, त्याग और अद्वितीय बलिदान से परिचित कराने का विशेष प्रयास किया गया। इसी कड़ी में 28 फरवरी और 1 मार्च को खारघर, नवी मुंबई में एक भव्य कार्यक्रम का आयोजन प्रस्तावित है। इस अवसर पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, केंद्रीय मंत्री अमित शाह तथा महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस की प्रमुख उपस्थिति रहेगी।
शूरवीर दानवीर राय लखिशा बंजारा का ऐतिहासिक योगदान
मध्यकालीन भारत के शूरवीर, दानवीर और लोककल्याण के प्रति समर्पित योद्धा राय लखिशा बंजारा का जीवन पराक्रम और मानवता का प्रेरक उदाहरण माना जाता है। उनका जन्म 4 जुलाई 1580 को पंजाब के खैरपुर (वर्तमान पाकिस्तान) में हुआ था। वे एक समृद्ध और प्रभावशाली बंजारा परिवार से थे। बताया जाता है कि नई दिल्ली के रायसीना, मालचा, बाराखंबा और नरेला गांवों की स्थापना में उनका महत्वपूर्ण योगदान रहा। दिल्ली के मध्य स्थित इन गांवों की भूमि राजस्व अभिलेखों में उनके नाम दर्ज होने का उल्लेख मिलता है। वर्तमान राष्ट्रपति भवन जिस क्षेत्र में स्थित है, वह भी ऐतिहासिक रूप से उनके प्रभाव क्षेत्र से जुड़ा माना जाता है। मथुरा-वृंदावन (जयसिंहपुरा) में उनकी सात एकड़ भूमि आज भी विद्यमान है, जो उदासीन आश्रम के अधीन है। बुंदेलखंड के सागर क्षेत्र में उन्हें लोकनायक के रूप में सम्मानित किया जाता है, जहां “सागर तालाब” उनके नाम से प्रसिद्ध है और उनकी प्रतिमा स्थापित है। राय लखिशा बंजारा ने लोककल्याण के लिए सैकड़ों तालाबों और कुओं का निर्माण कराया तथा व्यापारिक मार्गों पर प्रत्येक 10 किलोमीटर पर तांडे और धर्मशालाएं बनवाईं। उनके द्वारा निर्मित कुएं आज भी “बंजारा बावड़ी” के नाम से प्रसिद्ध हैं। ऐतिहासिक उल्लेखों के अनुसार, बाबा बंदा सिंह बहादुर द्वारा निर्मित लोहगढ़ किला के निर्माण में भी उनका महत्वपूर्ण योगदान रहा। उन्होंने निर्माण कार्य के लिए श्रमिक, सामग्री और संसाधन उपलब्ध कराए। दिल्ली का लाल किला, गुरुद्वारा रकाबगंज साहिब और अन्य ऐतिहासिक स्थल उनके योगदान के साक्षी माने जाते हैं।
गुरु तेग बहादुर के अंतिम संस्कार में ऐतिहासिक भूमिका
सन् 1675 में गुरु तेग बहादुर के बलिदान के बाद उनके पार्थिव शरीर को सम्मानपूर्वक प्राप्त करने और अंतिम संस्कार कराने में राय लखिशा बंजारा की महत्वपूर्ण भूमिका रही। उन्होंने दिल्ली के रायसीना रकाबगंज क्षेत्र में उनका अंतिम संस्कार कराया तथा अस्थियों को एक कलश में सुरक्षित स्थापित किया। उधर, 16 नवंबर 1675 को भाई जेता बंजारा द्वारा गुरु तेग बहादुर का शीश उनके पुत्र गुरु गोविंद सिंह (तत्कालीन गोविंद राय) को सौंपा गया और 17 नवंबर को आनंदपुर साहिब में अंतिम संस्कार संपन्न हुआ। विश्व इतिहास में यह अद्वितीय घटना मानी जाती है, जहां शरीर और शीश का अंतिम संस्कार दो अलग-अलग स्थानों पर किया गया। बताया जाता है कि 15 जनवरी 1783 को राय लखिशा बंजारा के घर की नींव खोदते समय वह कलश पुनः प्राप्त हुआ। यह स्थान वर्तमान संसद भवन के सामने स्थित क्षेत्र से जुड़ा माना जाता है, जहां उनकी स्मृति में ‘भाई लखिशा बंजारा हॉल’ का निर्माण किया गया है। राय लखिशा बंजारा ने 28 मई 1680 को दिल्ली के मालचा क्षेत्र में अंतिम सांस ली। उनका जीवन पराक्रम, त्याग और धर्म की रक्षा के लिए समर्पण की अमिट गाथा है, जो आज भी समाज को प्रेरित करती है।




