
गौ वध बंद करने की बात पर कांग्रेस से बीजेपी बहुत आगे निकल चुकी है। इंदिरा गांधी जब प्रधानमंत्री थीं, तब स्वामी करपात्री जी के नेतृत्व में आंदोलन चला था। दिल्ली में साधु-संतों पर पुलिस ने लाठियां चलवाई थीं। तब करपात्री जी ने कांग्रेस को शाप दिया था। कांग्रेस ने भले गौ हत्या पर प्रतिबंध नहीं लगाया, लेकिन किसी बूचड़खाना संचालक से, जो गौ हत्या करके बीफ का निर्यात करते थे, कभी चुनावी चंदा नहीं वसूला। दूसरी बात, सन 2014 के पूर्व गौ-बीफ निर्यात में भारत का विश्व में विभिन्न मतानुसार 9वें से 14वें स्थान पर था। कांग्रेस पर मुस्लिम तुष्टिकरण का आरोप लगाने और खुद को हिंदूवादी पार्टी बताने वाली बीजेपी 2014 में सत्ता में आई, तो भारत गौ मांस निर्यातकों में विश्व में ब्राज़ील के बाद दूसरे स्थान पर पहुंच गया। यही नहीं, गौ मांस निर्यातकों से 250 करोड़ रुपये चुनावी चंदा भी वसूला गया। यही नहीं, बीजेपी के मंत्री गिरिराज सिंह ने तो बाकायदा झटका मीट का खूब प्रचार-प्रसार भी किया। पिछले कई वर्षों से गौ हत्या पर प्रतिबंध लगाने की मांग करते हुए शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद महाराज पूरे देश में घूम-घूमकर हिंदुओं को जागृत कर रहे हैं। उनकी भाषा कटु अवश्य होती है, लेकिन होती सत्य है। उनका यही सत्य सत्ता और प्रशासन को नागवार गुजरता है, क्योंकि वे सीधे-सीधे खुद को हिंदुत्व का ठेकेदार कहने वाली पार्टी बीजेपी के शीर्ष नेताओं पर आरोप लगाते हैं। यही कारण है कि प्रयाग स्नान के समय उनका घोर अपमान किया गया। हिंदू तब भी सोते रहे थे, आज भी सो रहे हैं। जैसा कि संसद में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने कहा था, भारत का हिंदुत्व बीजेपी का हिंदुत्व नहीं है। कांग्रेस ने कभी हिंदू और हिंदुत्व की राजनीति नहीं की, तो यह भी कभी नहीं कहा कि मुसलमानों के खिलाफ नफरत करो। धर्मनिरपेक्षता का अर्थ है कि सरकार किसी भी धर्म का समर्थन नहीं करेगी। यही सेक्युलर का वास्तविक अर्थ है। लेकिन मंडल आयोग लागू करने वाली प्रधानमंत्री वी.पी. सिंह सरकार, जिसे गैर-कांग्रेसी दलों का समर्थन था, उसी अवधि में कश्मीरी पंडितों की सामूहिक हत्याएं और महिलाओं के साथ सामूहिक बलात्कार हुए। बीजेपी तब भी वी.पी. सिंह सरकार का समर्थन कर रही थी। कश्मीरी पंडितों पर हो रहे जुल्म पर हिंदुत्ववादी बीजेपी एक शब्द भी नहीं बोल सकी। वी.पी. सिंह सरकार से समर्थन तब वापस लिया गया, जब मंडल आयोग लागू कर ओबीसी जातियों को आरक्षण दिया गया। तब हिंदुओं और हिंदुत्व की ठेकेदार पार्टी बीजेपी ने सरकार से समर्थन वापस ले लिया, जिससे सरकार गिर गई। लालकृष्ण आडवाणी ने तब कहा था कि हमारे पास चुनाव लड़ने का कोई मुद्दा ही नहीं बचा, इसलिए बाबरी मस्जिद के खिलाफ रथयात्रा शुरू की गई। हालांकि, यह भी कहा जाता है कि बाबरी विध्वंस में आरएसएस, बीजेपी और विहिप का हाथ नहीं था। तब हिंदुत्ववादी पार्टी शिवसेना ने बाबरी मस्जिद तोड़ने में सहयोग किया था। जब इलाहाबाद हाईकोर्ट और फिर सुप्रीम कोर्ट में मामला चल रहा था, तब आरएसएस, बीजेपी, विहिप और बजरंग दल का दूर-दूर तक पता नहीं था। शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद ने ही कोर्ट में राम जन्मभूमि होने के प्रमाण प्रस्तुत किए थे, जिनके आधार पर निर्णय लिखा गया। बाद में इसका श्रेय बीजेपी ने ले लिया। बीजेपी पर यह आरोप लगाया जाता है कि वह हिंदुत्व और धर्म के नाम पर हिंदुओं में शत्रुता पैदा कर वोट बैंक बनाने का प्रयास करती है। वहीं तमिलनाडु में विजय सुपरस्टार ने बिल्कुल नई पार्टी बनाई, चुनाव जीता और सरकार बनाई। उनकी सरकार के सभी मंत्री उच्च शिक्षित हैं। विजय स्वयं ईसाई हैं। उनके पिता ईसाई और मां हिंदू हैं। उनकी मां आज भी हिंदू रीति-रिवाजों का पालन करती हैं। विजय ने मंदिर में जाकर पूजा कर यह संदेश दिया कि वे सभी धर्मों का सम्मान करते हैं। सबसे अहम दो कार्य विजय ने किए। पहला, गौ हत्या पर तमिलनाडु में पूरी तरह प्रतिबंध लगा दिया। दूसरा, स्कूल चाहे निजी हो या सरकारी, छात्रों के परिचय-पत्र पर जाति नहीं लिखी जाएगी। तमिलनाडु में 80 प्रतिशत हिंदू हैं। सरकार बने एक महीना भी नहीं हुआ था कि अमेरिकी पूंजीपतियों ने विजय से मुलाकात कर उनके निर्णयों और कार्यों से प्रभावित होकर तमिलनाडु में अरबों रुपये के निवेश की घोषणा कर दी। निवेशक वहीं आना चाहते हैं, जहां शांति का माहौल हो। तमिलनाडु की पुलिस भी जनता की मित्र बनकर काम करती दिखाई देने लगी है। जैसा शासक होता है, वैसा ही प्रशासन अपने चरित्र और कार्यशैली को ढाल लेता है। विजय ने कभी हिंदूवादी होने का प्रचार नहीं किया, न ही ईसाई होने का मुद्दा बनाया। सबको साथ लेकर चलने वाले मुख्यमंत्री विजय देश के लिए एक आदर्श मुख्यमंत्री साबित हो रहे हैं। वे बैर या बदले की राजनीति से कोसों दूर, खुले दिल और खुले दिमाग के नेता बताए जाते हैं।



