विदेशी तकनीक पर निर्भरता और राष्ट्रीय सुरक्षा के नए खतरे

महेन्द्र तिवारी
आधुनिक युद्ध में संचार और तकनीकी स्वावलंबन कितना महत्वपूर्ण है, यह बात हाल ही में यूक्रेन और अमेरिका के बीच उत्पन्न हुए सैटेलाइट इंटरनेट विवाद से पूरी तरह स्पष्ट हो गई है। रूसी हमलों का डटकर सामना कर रहे यूक्रेन के सामने एक नई और अप्रत्याशित चुनौती खड़ी हो गई। यूक्रेन के राष्ट्रपति ने सार्वजनिक रूप से यह चिंता व्यक्त की कि युद्ध क्षेत्र में काम कर रही उनकी सैटेलाइट इंटरनेट सेवाओं की गति को अचानक काफी कम कर दिया गया है। आधुनिक युद्ध प्रणाली में मानव रहित विमानों यानी ड्रोन का उपयोग बहुत बढ़ गया है और ये सभी विमान इसी इंटरनेट तकनीक के सहारे अपनी दिशा और लक्ष्य तय करते हैं। गति धीमी होने से यूक्रेन के कई सटीक और महत्वपूर्ण सैन्य अभियान अंतिम समय में विफल हो गए, जिससे रूसी सेना के खिलाफ उनकी रक्षात्मक पकड़ कमजोर हुई है। यूक्रेनी रक्षा विशेषज्ञों ने पाया कि उनके संचार उपकरणों पर एक अघोषित तकनीकी प्रतिबंध लगा दिया गया है। जब भी कोई ड्रोन या उपकरण 160 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार को पार करता है, तो उपग्रह से उसका संपर्क तुरंत कट जाता है। कई बार यह बाधा 110 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार पर भी काम करने लगती है। सबसे बड़ी परेशानी यह रही कि इस तकनीकी बदलाव से पहले यूक्रेनी सेना को किसी भी प्रकार की सूचना नहीं दी गई थी। तेजी से हमला करने वाले ड्रोन इसी उच्च गति पर उड़ते हैं, और बीच हवा में उनका संपर्क टूट जाने से वे दिशाहीन होकर गिर जाते हैं। यह स्थिति युद्ध के मैदान में लड़ रहे सैनिकों के लिए सीधे तौर पर जानलेवा साबित हो रही है। इस मुद्दे पर बढ़ती आलोचनाओं के बाद मशहूर कारोबारी एलन मस्क को सामने आकर सफाई देनी पड़ी। मस्क ने स्पष्ट किया कि नागरिक सेवा और सैन्य उपग्रह सेवा की कार्यप्रणाली बिल्कुल अलग है। उन्होंने साफ शब्दों में कहा कि जिस सैन्य उपग्रह प्रणाली का उपयोग यूक्रेन कर रहा है, उसका पूरा स्वामित्व और नियंत्रण अमेरिकी रक्षा विभाग के अधीन है। किसी भी क्षेत्र में इंटरनेट की गति को सीमित करने, उसे चालू रखने या पूरी तरह से बंद करने का अधिकार केवल अमेरिकी सेना और अंततः राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के पास है। मस्क के इस बयान ने यह स्पष्ट कर दिया कि पर्दे के पीछे से युद्ध का नियंत्रण अब सीधे वाशिंगटन के हाथों में जा चुका है। अंतरराष्ट्रीय मामलों के जानकार इसे मात्र एक तकनीकी समस्या नहीं मान रहे हैं। इसे कूटनीतिक दबाव की एक सोची समझी रणनीति के रूप में देखा जा रहा है। अमेरिका काफी समय से यह प्रयास कर रहा है कि यूक्रेन रूसी तेल उत्पादन केंद्रों पर अपने हमले रोक दे, क्योंकि इन हमलों से वैश्विक ऊर्जा बाजार में अस्थिरता आ रही है। माना जा रहा है कि अमेरिका अपनी बात मनवाने के लिए इस संचार प्रणाली को एक हथियार की तरह इस्तेमाल कर रहा है। इंटरनेट की गति को कम करना यूक्रेन को यह संदेश देने का प्रयास है कि अमेरिकी सैन्य सहायता उनकी शर्तों के अधीन ही जारी रहेगी। इस घटनाक्रम ने केवल यूक्रेन ही नहीं, बल्कि यूरोप के अन्य देशों की भी चिंता बढ़ा दी है। पोलैंड जैसे सहयोगी देशों के राजनयिक इस बात से हैरान हैं कि एक सहयोगी देश की सेना को बीच युद्ध में इस तरह बेबस कर दिया गया। यह विवाद एक नया कूटनीतिक सवाल खड़ा करता है कि क्या विदेशी संचार तकनीक पर निर्भर रहकर कोई भी देश स्वतंत्र रूप से युद्ध लड़ सकता है। यह घटना साबित करती है कि भविष्य की लड़ाई सिर्फ तोप और मिसाइलों से नहीं जीती जाएगी, बल्कि डेटा और संचार नेटवर्क पर जिसका नियंत्रण होगा, वही युद्ध के परिणाम तय करेगा।
