राजनीति में शब्दों की मर्यादा: जब वाणी विवेक पर भारी पड़ जाए

पवन वर्मा
श्रीमद्भगवद्गीता में भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं…
अनुद्वेगकरं वाक्यं सत्यं प्रियहितं च यत्। स्वाध्यायाभ्यसनं चैव वाङ्मयं तप उच्यते।।
अर्थात ऐसी वाणी, जो दूसरों के मन में अनावश्यक उद्वेग पैदा न करे, सत्य हो, प्रिय हो और हितकारी हो, वाणी का तप कहलाती है। यह श्लोक केवल व्यक्तिगत जीवन में बोलचाल का सलीका सिखाने के लिए नहीं है। सार्वजनिक जीवन, राजनीति और सत्ता के शीर्ष पर बैठे लोगों के लिए भी इसका महत्व उतना ही है। कब बोलना है, किस परिस्थिति में बोलना है और किन शब्दों का इस्तेमाल करना है, इसका विवेक ही किसी व्यक्ति की राजनीतिक परिपक्वता की पहचान बनता है। राजनीति में मतभेद स्वाभाविक हैं। सत्ता पक्ष से सवाल पूछना, सरकार की नीतियों की आलोचना करना, सरकार को कठघरे में खड़ा करना और चुनाव में उसके खिलाफ जनमत तैयार करना विपक्ष का अधिकार ही नहीं, लोकतंत्र की जरूरत भी है। लेकिन जब राजनीतिक तर्क की जगह व्यक्तिगत कटाक्ष लेने लगें और असहमति जताने के लिए ऐसे शब्द चुने जाएं, जिनसे विवाद का विस्तार मुद्दों से हटकर परिवार तक पहुंच जाए, तब यह विचार करना जरूरी हो जाता है कि राजनीति किस दिशा में जा रही है। कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे की प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को लेकर की गई टिप्पणी ने इसी प्रश्न को फिर सामने ला दिया है। बिहार की राजधानी पटना में 25 अक्टूबर को एक कार्यक्रम के दौरान खड़गे ने कहा, “मोदी का बाप भी जाएगा।” यह टिप्पणी बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री श्रीकृष्ण सिंह की जयंती पर आयोजित कार्यक्रम में उस समय आई, जब श्रोताओं में से एक व्यक्ति प्रधानमंत्री के पद से मोदी के न जाने की बात कह रहा था। इसके बाद बयान पर विवाद खड़ा हो गया। भाजपा ने इसे प्रधानमंत्री के दिवंगत पिता को लेकर की गई अमर्यादित टिप्पणी बताया, जबकि कांग्रेस ने संदर्भ और वैचारिक आशय का हवाला देते हुए उनका बचाव किया।
विवाद का केंद्र केवल एक वाक्य नहीं है। असली सवाल यह है कि देश की सबसे पुरानी राजनीतिक पार्टियों में से एक के राष्ट्रीय अध्यक्ष से सार्वजनिक मंच पर किस तरह की भाषा की अपेक्षा की जाती है। खड़गे कोई सामान्य कार्यकर्ता नहीं हैं। वह दशकों के राजनीतिक अनुभव वाले नेता हैं, संसद में विपक्ष की आवाज हैं और कांग्रेस जैसे राष्ट्रीय दल का नेतृत्व कर रहे हैं। उनके शब्दों का प्रभाव किसी स्थानीय सभा में दिए गए सामान्य भाषण से कहीं अधिक होता है। इसलिए उनके बयान को केवल क्षणिक आवेश बताकर नजरअंदाज करना आसान नहीं है। खड़गे की टिप्पणी के बाद भाजपा ने 26 अक्टूबर को देशभर में विरोध प्रदर्शन किए। दिल्ली, पटना, जम्मू, बेंगलुरु, लखनऊ, जयपुर, रांची, कोलकाता, गांधीनगर और गुवाहाटी समेत कई शहरों में पार्टी कार्यकर्ता सड़कों पर उतरे। कई स्थानों पर कांग्रेस अध्यक्ष के खिलाफ नारेबाजी हुई, पोस्टर जलाए गए और कांग्रेस नेतृत्व से माफी की मांग की गई। कुछ जगहों पर प्रदर्शनकारियों को पुलिस ने बैरिकेड लगाकर रोका। भाजपा ने इसे प्रधानमंत्री और उनके परिवार के प्रति अपमानजनक भाषा का मामला बताते हुए खड़गे से बिना शर्त माफी की मांग की। भाजपा का विरोध केवल एक बयान के प्रति नाराजगी तक सीमित नहीं रहा। पार्टी ने इसे प्रधानमंत्री पद की गरिमा और सार्वजनिक जीवन में भाषा की मर्यादा से जोड़ दिया। रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह सहित भाजपा के वरिष्ठ नेताओं ने टिप्पणी की आलोचना की। पार्टी की मांग है कि कांग्रेस नेतृत्व इस मामले में अपनी जिम्मेदारी स्वीकार करे। हालांकि, लोकतंत्र में विरोध का तरीका भी उतना ही महत्वपूर्ण है जितना विरोध का कारण। किसी बयान के खिलाफ आवाज उठाना राजनीतिक अधिकार है, लेकिन प्रदर्शन का उद्देश्य संवाद की संभावना को खत्म करना नहीं, मर्यादा के महत्व को रेखांकित करना होना चाहिए। विरोध शांतिपूर्ण और मुद्दे पर केंद्रित रहे, तभी वह अपनी बात का नैतिक आधार मजबूत कर सकता है। कांग्रेस ने खड़गे के बयान को लेकर अलग पक्ष रखा है। पार्टी के नेता पवन खेड़ा ने दावा किया कि कार्यक्रम में पहले खड़गे के साथ अभद्र व्यवहार किया गया था। कांग्रेस की दलील है कि उनकी टिप्पणी को प्रधानमंत्री के जैविक पिता के संदर्भ में नहीं, बल्कि वैचारिक विरोध के संदर्भ में समझा जाना चाहिए। पार्टी के कुछ अन्य नेताओं ने भी बयान के आशय और उसके राजनीतिक संदर्भ की ओर ध्यान दिलाया। यहां एक बुनियादी बात समझने की जरूरत है।
किसी मंच पर उकसाने वाली टिप्पणी हो जाए तो उसका जवाब देने का दबाव बन सकता है। वरिष्ठ नेताओं को भी कभी-कभी आवेश का सामना करना पड़ता है। लेकिन सार्वजनिक जीवन में पद और अनुभव के साथ अपेक्षाएं भी बढ़ती हैं। सामने वाला अनुचित भाषा का इस्तेमाल करे, तब भी जवाब देते समय अपने शब्दों का चयन करना ही नेतृत्व की परीक्षा है। कांग्रेस की यह दलील भी अपने आप में पर्याप्त नहीं कि खड़गे के शब्दों को उनके आशय के आधार पर ही देखा जाए। सार्वजनिक भाषण में आशय महत्वपूर्ण होता है, लेकिन शब्दों का सामान्य अर्थ और उनसे पैदा होने वाली प्रतिक्रिया भी उतनी ही महत्वपूर्ण है। यदि कोई नेता किसी राजनीतिक विचारधारा का विरोध करना चाहता है, तो उसे उसी विचारधारा, उसके संगठन और उसकी नीतियों पर स्पष्ट प्रहार करना चाहिए। पारिवारिक संबोधनों के सहारे राजनीतिक संदेश देने से मूल मुद्दा पीछे छूट जाता है। इसी तरह भाजपा को भी यह कसौटी अपने नेताओं पर समान रूप से लागू करनी होगी। सार्वजनिक जीवन में भाषा की मर्यादा कोई ऐसा नियम नहीं हो सकती, जो केवल विपक्ष पर लागू हो। प्रधानमंत्री हों, मुख्यमंत्री हों, केंद्रीय मंत्री हों या विपक्ष के नेता,सभी के शब्दों को एक ही नैतिक पैमाने पर परखा जाना चाहिए। इस विवाद का एक दूसरा पहलू भी है। देश की राजनीति पहले से ही तीखे ध्रुवीकरण के दौर से गुजर रही है। चुनावी सभाओं में एक-दूसरे की नीतियों को चुनौती देने के बजाय कई बार नेताओं के व्यक्तिगत जीवन, परिवार और पुराने बयानों को बहस का केंद्र बना दिया जाता है। इसका तात्कालिक लाभ सुर्खियों और सोशल मीडिया पर चर्चा के रूप में मिल सकता है, लेकिन लोकतांत्रिक विमर्श को इससे स्थायी नुकसान पहुंचता है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की नीतियों से असहमति रखने वाले दलों के पास महंगाई, रोजगार, आर्थिक विकास, सामाजिक न्याय, संघीय ढांचे और सरकारी जवाबदेही जैसे अनेक मुद्दे हैं। कांग्रेस इन विषयों पर सरकार को घेर सकती है और उसे अपने निर्णयों का हिसाब देने के लिए बाध्य कर सकती है। यही विपक्ष की सार्थक भूमिका है। जब बहस व्यक्तिगत टिप्पणी पर केंद्रित हो जाती है, तो सरकार की नीतियों पर जवाब मांगने का अवसर भी कमजोर पड़ता है। दूसरी ओर, भाजपा को भी यह समझना होगा कि हर विवाद को केवल विरोधी दल की राजनीतिक विफलता के रूप में पेश करने से व्यापक सार्वजनिक विमर्श नहीं बनता। किसी अनुचित टिप्पणी का विरोध करते समय मुद्दे की गंभीरता बनाए रखना जरूरी है। लोकतंत्र में किसी नेता के प्रति सम्मान का अर्थ उसकी आलोचना से परहेज करना नहीं है। प्रधानमंत्री के पद की गरिमा और प्रधानमंत्री की नीतियों की समीक्षा, दोनों एक साथ संभव हैं। स्वस्थ लोकतंत्र में असहमति और व्यक्तिगत कटुता के बीच अंतर रखना आवश्यक है। मल्लिकार्जुन खड़गे का लंबा राजनीतिक अनुभव उन्हें इस विवाद में और अधिक जिम्मेदार बनाता है। राजनीति में कई बार क्षणिक प्रतिक्रिया पूरे भाषण पर भारी पड़ जाती है। नेता जिस विषय पर जनता से संवाद करने आया होता है, उसकी चर्चा पीछे छूट जाती है और एक विवादित वाक्य सुर्खियां बन जाता है। पटना के कार्यक्रम में भी चर्चा का केंद्र चुनाव, विचारधारा और लोकतांत्रिक संस्थाओं से हटकर मात्र एक टिप्पणी पर आ गया। यह किसी भी राजनीतिक दल के लिए विचार करने का विषय होना चाहिए। वरिष्ठता का अर्थ केवल अधिक वर्षों का राजनीतिक अनुभव नहीं है। वरिष्ठता का अर्थ यह भी है कि कठिन परिस्थिति में संयम बनाए रखा जाए, विरोधी के उकसावे के बावजूद संवाद की सीमा न टूटे और अपनी बात को ऐसे शब्दों में रखा जाए, जिनका बचाव करने के लिए बाद में लंबी सफाई न देनी पड़े। यदि खड़गे का उद्देश्य प्रधानमंत्री की राजनीति या भाजपा की विचारधारा का विरोध करना था, तो उस उद्देश्य को अधिक स्पष्ट और प्रभावी भाषा में व्यक्त किया जा सकता था। वैचारिक संघर्ष के लिए शब्दों की कमी नहीं है। सवाल शब्दों की उपलब्धता का नहीं, उनके चयन का है। भारतीय लोकतांत्रिक परंपरा में राजनीतिक विरोध का लंबा इतिहास रहा है। नेताओं ने एक-दूसरे की नीतियों की तीखी आलोचना की है, सरकारों को चुनौती दी है और चुनावों में कड़े शब्दों का इस्तेमाल भी किया है। लेकिन आलोचना की धार और व्यक्तिगत अपमान में अंतर है। पहली लोकतंत्र को मजबूत करती है, दूसरा बहस को संकीर्ण बनाता है।
भगवद्गीता का वाणी संबंधी संदेश इसी संदर्भ में प्रासंगिक है। सत्य बोलना आवश्यक है, लेकिन सत्य को किस तरह कहा जा रहा है, यह भी महत्वपूर्ण है। सार्वजनिक जीवन में भाषा का उद्देश्य केवल सामने वाले को परास्त करना नहीं, अपनी बात को स्पष्टता और प्रभाव के साथ रखना भी है। शब्दों में संयम कमजोरी नहीं, बल्कि आत्मविश्वास का संकेत है। भाजपा के देशव्यापी प्रदर्शनों ने इस विवाद को राष्ट्रीय राजनीतिक बहस का विषय बना दिया है। अब कांग्रेस के सामने सवाल है कि वह अपने अध्यक्ष की टिप्पणी को लेकर किस तरह की राजनीतिक और नैतिक जिम्मेदारी स्वीकार करती है। वहीं भाजपा के सामने चुनौती है कि वह भाषा की मर्यादा के अपने आग्रह को सभी राजनीतिक परिस्थितियों में समान रूप से निभाए। आखिरकार, लोकतंत्र में सरकारें बदलती हैं, नेता आते-जाते हैं और राजनीतिक विचारधाराओं के बीच संघर्ष चलता रहता है। लेकिन सार्वजनिक जीवन की भाषा ही तय करती है कि यह संघर्ष स्वस्थ प्रतिस्पर्धा बना रहेगा या व्यक्तिगत कटुता में बदल जाएगा। राजनीति में किसने किसे हराया, यह चुनाव तय करते हैं लेकिन किसने अपने शब्दों पर कितना संयम रखा, इसका फैसला इतिहास करता है। खड़गे की टिप्पणी से उपजा विवाद सभी राजनीतिक दलों के लिए आत्ममंथन का अवसर है। गीता का संदेश स्पष्ट है वाणी की शक्ति तभी सार्थक है, जब उसके साथ विवेक भी हो,इसीलिए तो बचपन से ही सिखाया जाता है -ऐसी बानी बोलिए, मन का आपा खोए।औरन को शीतल करे,आपहुं शीतल होए।

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