15 वर्षीय बेटे की डूबने से मौत की दोबारा जांच से बॉम्बे हाई कोर्ट का इनकार
दृष्टिबाधित माता-पिता ने जताया था गड़बड़ी का संदेह, कोर्ट ने कहा— रिकॉर्ड में हत्या या पुलिस जांच पर संदेह का कोई आधार नहीं

मुंबई। बॉम्बे हाई कोर्ट ने वर्ष 2018 में 15 वर्षीय लड़के की मौत की जांच किसी अन्य एजेंसी को सौंपने अथवा नए सिरे से जांच कराने की मांग खारिज कर दी है। मृतक के माता-पिता, जो दोनों पूरी तरह दृष्टिबाधित हैं, ने बेटे की मौत की परिस्थितियों पर संदेह जताया था। हालांकि अदालत ने रिकॉर्ड पर मौजूद सामग्री के आधार पर पुलिस के इस निष्कर्ष में हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया कि लड़के की मौत दुर्घटनावश डूबने से हुई थी। जस्टिस अजय गडकरी और जस्टिस कमल खाता की पीठ ने 22 सितंबर को माता-पिता की याचिका खारिज कर दी। माता-पिता का कहना था कि उनका बेटा हर्षद उनका एकमात्र सहारा था और उसकी मौत जिन परिस्थितियों में हुई, उन्हें लेकर उनके मन में कई सवाल हैं। याचिका के अनुसार, हर्षद 2 सितंबर 2018 को एक दोस्त के घर गया था, लेकिन वापस नहीं लौटा। एक दिन इंतजार करने के बाद माता-पिता ने 3 सितंबर को भारतीय दंड संहिता की धारा 363 के तहत अपहरण की FIR दर्ज कराई। उनका कहना था कि 6 सितंबर को पुलिस ने उन्हें बताया कि हर्षद की डूबने से मौत हो गई है। माता-पिता ने इस निष्कर्ष पर सवाल उठाते हुए कहा था कि शव पर मिले कपड़े कथित तौर पर उनके बेटे के नहीं थे। उन्होंने यह भी दावा किया कि एक पड़ोसी ने पहले उनके परिवार को धमकी दी थी, लेकिन उस संबंध में उनकी शिकायत दर्ज नहीं की गई। पुलिस अधिकारियों और प्रधानमंत्री सहित विभिन्न अधिकारियों को आवेदन देने के बाद भी कथित रूप से कोई संतोषजनक जवाब नहीं मिलने पर उन्होंने हाई कोर्ट का रुख किया। पुलिस ने अदालत को बताया कि मामले में माता-पिता और स्थानीय निवासियों के बयान दर्ज करने सहित विस्तृत जांच की गई थी। जांच में सामने आया कि हर्षद पास के एक जलाशय में तैरने गया था और उस स्थान पर बच्चे अक्सर आया-जाया करते थे। पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट में शरीर पर कोई बाहरी या अंदरूनी चोट नहीं मिली और मौत का कारण डूबना बताया गया। केमिकल एनालाइजर की रिपोर्ट में भी किसी तरह का जहर नहीं मिलने की बात सामने आई। अदालत ने यह भी गौर किया कि उल्हासनगर के सब-डिविजनल मजिस्ट्रेट ने मामले को डूबने से हुई आकस्मिक मौत के रूप में स्वीकार किया था। पीठ ने कहा कि दृष्टिबाधित माता-पिता का संदेह समझ में आता है, लेकिन रिकॉर्ड में ऐसी कोई सामग्री नहीं है जिससे किसी गड़बड़ी की पुष्टि हो। अदालत को हत्या की आशंका या पुलिस की जांच पर संदेह करने का कोई ठोस आधार नहीं मिला। इसी आधार पर हाई कोर्ट ने मामले की जांच ट्रांसफर करने अथवा नए सिरे से जांच कराने की मांग वाली याचिका खारिज कर दी।
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