
मुंबई। कम पानी में उगने वाले और स्वास्थ्य की दृष्टि से अत्यंत लाभकारी तृणधान्य (मोटे अनाज) के उत्पादन और विपणन को सुदृढ़ करने के लिए राज्यस्तरीय मोटा अनाज (मिलेट्स) टास्क फोर्स गठित करने की आवश्यकता है। मंगलवार को यह बात कृषि विभाग के अपर मुख्य सचिव विकासचंद्र रस्तोगी ने कही। उन्होंने कहा कि बीज बोने से लेकर बिक्री तक की पूरी मूल्य श्रृंखला को मजबूत करने के लिए समन्वित नीति और बाजार व्यवस्था जरूरी है। सह्याद्री अतिथि गृह में कृषि विभाग और एम.एस.स्वामीनाथन रिसर्च फाउंडेशन (एमएसएसआरएफ) के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित एक दिवसीय कृषि कार्यशाला में वे बोल रहे थे। इस अवसर पर शोधकर्ता, किसान प्रतिनिधि और मोटे अनाज क्षेत्र के विशेषज्ञ बड़ी संख्या में उपस्थित थे। कार्यशाला में बताया गया कि ज्वार और बाजरा बड़े तृणधान्य हैं, जबकि रागी (नाचणी), कुटकी, कोदो, सांवा, वरई जैसे छोटे तृणधान्य विभिन्न क्षेत्रों में अलग-अलग नामों से जाने जाते हैं। राज्य की जलवायु के अनुकूल इन फसलों के विस्तार, पोषण मूल्य बढ़ाने और उपभोक्ता मांग पैदा करने पर गहन चर्चा की गई। वक्ताओं ने कहा कि स्वाद, रंग और प्रस्तुति पर ध्यान देकर खासकर युवाओं में मोटे अनाज से बने उत्पादों की लोकप्रियता बढ़ाई जा सकती है। रस्तोगी ने कहा कि जलवायु परिवर्तन और वर्षा पर बढ़ती निर्भरता के चलते महाराष्ट्र जैसे राज्य में मोटे अनाज अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। हालांकि गुणवत्तापूर्ण बीजों की कमी, बाजार की सीमित उपलब्धता, जागरूकता का अभाव और मूल्य श्रृंखला की चुनौतियां अभी भी बड़ी बाधाएं हैं। प्रस्तावित टास्क फोर्स इन सभी समस्याओं के समाधान पर काम करेगी।
पोषण और आय दोनों के लिए जरूरी हैं मोटे अनाज: डॉ. सौम्या स्वामीनाथन
एमएसएसआरएफ की अध्यक्ष डॉ. सौम्या स्वामीनाथन ने कहा कि मोटे अनाज न केवल स्थानीय जलवायु के अनुकूल और टिकाऊ हैं, बल्कि पोषण की कमी को दूर करने में भी अहम भूमिका निभाते हैं। ये छोटे किसानों को बेहतर आय का साधन भी बन सकते हैं। कुपोषण और मोटापे जैसी समस्याओं से निपटने के लिए आहार में विविधता लाने पर उन्होंने जोर दिया। कार्यशाला में एमएसएसआरएफ के जैवविविधता निदेशक डॉ. ई.डी. इस्राइल ऑलिवर किंग, भारतीय मोटा अनाज अनुसंधान संस्थान की निदेशक डॉ. तारा सत्यवती, वैज्ञानिक डॉ. पी. संजना रेड्डी, आईसीआरआईसैट के वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ. वेत्रिवेंथन मणी सहित कई विशेषज्ञों ने शोध, उन्नत किस्मों, जैवविविधता संरक्षण और समुदाय आधारित पहलों पर विचार साझा किए। महिला किसानों ने भी मोटे अनाज की खेती, बाजार तक पहुंच और संसाधनों से जुड़ी जमीनी चुनौतियों को सामने रखा। कृषि विश्वविद्यालयों के विशेषज्ञों ने स्थानीय परिस्थितियों के अनुरूप उपयुक्त किस्मों, अनुसंधान और विस्तार सेवाओं के बेहतर समन्वय की आवश्यकता पर बल दिया।




