Thursday, February 5, 2026
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मुंबई में प्रस्तावित ‘बिहार भवन’ पर सियासी घमासान, मनसे और बिहार सरकार आमने-सामने

मनसे की धमकी पर अशोक चौधरी का तीखा जवाब—‘मुंबई किसी की निजी जागीर नहीं’

मुंबई/पटना। महाराष्ट्र की राजधानी मुंबई में प्रस्तावित ‘बिहार भवन’ को लेकर सियासत गरमा गई है। बिहार सरकार और महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना (मनसे) आमने-सामने आ गई हैं। मनसे की ओर से निर्माण रोकने की धमकी दिए जाने के बाद बिहार सरकार ने कड़ा रुख अपनाया है। बिहार कैबिनेट ने हाल ही में मुंबई के पोर्ट ट्रस्ट क्षेत्र में स्थित 0.68 एकड़ जमीन पर 30 मंजिला भव्य ‘बिहार भवन’ के निर्माण के लिए 314.2 करोड़ रुपये के बजट को मंजूरी दी है। इस भवन का उद्देश्य मुंबई में रहने वाले बिहार के प्रवासियों को ठहरने की सुविधा और प्रशासनिक सहायता उपलब्ध कराना बताया गया है। हालांकि, इस घोषणा के बाद मनसे ने तीखा विरोध जताया है। 20 जनवरी को मनसे नेता यशवंत किल्लेदार ने चेतावनी दी कि उनकी पार्टी मुंबई में ‘बिहार भवन’ का निर्माण नहीं होने देगी। उनका कहना है कि बिहार सरकार को मुंबई में पैसा खर्च करने के बजाय अपने राज्य में किसानों, शिक्षा, महंगाई और बेरोजगारी जैसी समस्याओं पर ध्यान देना चाहिए। मनसे के विरोध पर बिहार के मंत्री अशोक चौधरी ने तीखा पलटवार करते हुए कहा कि मुंबई किसी एक दल या व्यक्ति की निजी जागीर नहीं है, बल्कि पूरे देश की है। उन्होंने कहा, “यह कोई राजशाही नहीं है। मुंबई और महाराष्ट्र भारत के हर नागरिक के हैं।” चौधरी ने साफ कहा कि बिहार सरकार इस प्रोजेक्ट को हर हाल में आगे बढ़ाएगी। इस मुद्दे पर बिहार में भी विरोध के स्वर सुनाई दे रहे हैं। राष्ट्रीय जनता दल (राजद) ने नीतीश सरकार की प्राथमिकताओं पर सवाल उठाए हैं। राजद सांसद सुधाकर सिंह ने कहा कि जब बिहार में स्वास्थ्य सुविधाओं की भारी कमी है और कैंसर जैसे गंभीर रोगों के लिए आधुनिक अस्पताल नहीं हैं, तब मुंबई में 314 करोड़ रुपये का भवन बनाना चिंताजनक है। वहीं, भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) ने इस पूरे मामले में संतुलित रुख अपनाया है। भाजपा के राष्ट्रीय प्रवक्ता गुरु प्रकाश पासवान ने ‘बिहार भवन’ को राज्य सरकार का नीतिगत निर्णय बताया, लेकिन मनसे द्वारा इस्तेमाल की गई भाषा की कड़ी आलोचना करते हुए उसे “अस्वीकार्य” और “अक्षम्य” करार दिया। इस विवाद ने अब दो राज्यों के बीच राजनीतिक तनाव के साथ-साथ विकास और प्राथमिकताओं को लेकर नई बहस छेड़ दी है। एक ओर प्रवासी बिहारियों के लिए सुविधाएं देने का तर्क है, तो दूसरी ओर बिहार के भीतर बुनियादी जरूरतों को प्राथमिकता देने की मांग तेज होती जा रही है।

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