प्रदूषण के अंधकार में दीपावली की रोशनी कैसे मनाएं?

सौरभ वार्ष्णेय
आस्था, परंपरा और उत्सव के नाम पर क्या हम आने वाली पीढिय़ों की सांसों से समझौता कर सकते हैं? दिल्ली देश की राजधानी ही नहीं, बल्कि राजनीतिक, प्रशासनिक, आर्थिक और सांस्कृतिक गतिविधियों का एक बड़ा केंद्र भी है। यहां देश के कोने-कोने से लोग अपने सपनों को साकार करने आते हैं। दिल्ली-एनसीआर ऐसा क्षेत्र है, जहां हर कोई बेहतर भविष्य, रोजगार और जीवन की संभावनाएं तलाशता है। लेकिन विडंबना देखिए कि जिस शहर को लोग अपने सपनों का ठिकाना बनाना चाहते हैं, उसी शहर की हवा आज उनकी जिंदगी के लिए खतरा बनती जा रही है। प्रदूषण की मार ऐसी है कि खुले आसमान के नीचे सांस लेना भी किसी चुनौती से कम नहीं रह गया है। ऐसे में सवाल उठना स्वाभाविक है कि आखिर प्रदूषण के इस घुटन भरे माहौल में हम दीपावली का पर्व कैसे मनाएं? दीपावली भारतीय संस्कृति और परंपरा का ऐसा पर्व है, जिसका धार्मिक, आध्यात्मिक और सामाजिक महत्व सदियों पुराना है। यह अंधकार पर प्रकाश, असत्य पर सत्य और बुराई पर अच्छाई की विजय का प्रतीक है। मान्यता है कि चौदह वर्ष का वनवास पूरा करने के बाद भगवान श्रीराम जब माता सीता और लक्ष्मण के साथ अयोध्या लौटे थे, तब उनके स्वागत में अयोध्यावासियों सहित पूरे अखंड भारत ने घर-घर दीप जलाकर खुशियां मनाई थीं। तभी से दीपावली का पर्व प्रकाश और उल्लास के प्रतीक के रूप में मनाया जाता है। इस दिन मां लक्ष्मी की पूजा-अर्चना कर सुख, समृद्धि और खुशहाली की कामना भी की जाती है।लेकिन समय के साथ दीपावली मनाने के तौर-तरीकों में काफी बदलाव आया है। मिट्टी के दीपों, घरों की सजावट, पारिवारिक मेल-मिलाप और पारंपरिक मिठाइयों का स्थान धीरे-धीरे दिखावे और आतिशबाजी की प्रतिस्पर्धा ने ले लिया है। आसमान को रंग-बिरंगी रोशनी से भर देने की होड़ में हम यह भूल जाते हैं कि कुछ घंटों का हमारा मनोरंजन किसी दूसरे के लिए सांसों का संकट बन सकता है। हजारों की संख्या में छोड़े जाने वाले पटाखे वातावरण में जहरीले कण, धुआं और हानिकारक गैसें घोल देते हैं। इसका प्रभाव केवल दीपावली की रात तक सीमित नहीं रहता, बल्कि पहले से प्रदूषित हवा की स्थिति को और गंभीर बना देता है। दिल्ली-एनसीआर की स्थिति इस लिहाज से विशेष चिंता का विषय है। यहां पहले ही वाहनों का धुआं, औद्योगिक उत्सर्जन, निर्माण कार्यों से उड़ती धूल, कूड़ा जलाने और आसपास के क्षेत्रों में पराली जलाने जैसे अनेक कारणों से वायु प्रदूषण का दबाव बना रहता है। ऐसे में आतिशबाजी इस संकट को और बढ़ाने का काम करती है। इसका सबसे अधिक खामियाजा बच्चों, बुजुर्गों, गर्भवती महिलाओं और सांस संबंधी समस्याओं से जूझ रहे लोगों को भुगतना पड़ता है। कई मासूम बच्चे ऐसी हवा में सांस लेने को मजबूर होते हैं, जो उनके स्वस्थ बचपन और बेहतर भविष्य के लिए खतरा बन सकती है। प्रदूषण केवल आंखों में जलन, खांसी या सांस फूलने तक सीमित नहीं है, बल्कि लंबे समय तक इसके संपर्क में रहने से हृदय और फेफड़ों से जुड़ी गंभीर बीमारियों का जोखिम भी बढ़ता है।
विडंबना यह है कि हम एक ओर मां लक्ष्मी से घर में सुख-समृद्धि और खुशहाली की प्रार्थना करते हैं, वहीं दूसरी ओर अपनी ही गतिविधियों से जीवन की सबसे अनमोल संपत्ति यानी स्वच्छ हवा को दूषित कर देते हैं। जिस दीपावली का उद्देश्य जीवन में प्रकाश और सकारात्मकता लाना है, क्या उसे धुएं और जहरीली हवा के बीच मनाना उचित है? क्या कुछ मिनटों की आतिशबाजी उन लोगों की तकलीफ से अधिक महत्वपूर्ण हो सकती है, जिन्हें प्रदूषण के कारण अस्पतालों का रुख करना पड़ता है?
यहां यह समझना भी जरूरी है कि दीपावली पर पटाखे न चलाने की अपील किसी धार्मिक परंपरा या आस्था के विरोध में नहीं है। भारतीय संस्कृति तो प्रकृति को पूजने और उसके संरक्षण का संदेश देती रही है। हमारे पर्व और त्योहार भी प्रकृति के साथ सामंजस्य बनाकर जीवन जीने की प्रेरणा देते हैं। ऐसे में पर्यावरण की रक्षा करना हमारी धार्मिक और सामाजिक जिम्मेदारी का ही हिस्सा होना चाहिए। भगवान श्रीराम के आदर्शों में मर्यादा, करुणा, त्याग और लोककल्याण का विशेष स्थान है। उनके आगमन की खुशी में मनाए जाने वाले पर्व पर यदि हम किसी दूसरे के जीवन को संकट में डालें, तो हमें अपनी उत्सव परंपरा के वास्तविक उद्देश्य पर विचार करना चाहिए।
सरकार और न्यायालय समय-समय पर प्रदूषण को नियंत्रित करने के लिए कदम उठाते रहे हैं। पटाखों की बिक्री, उनके इस्तेमाल और ध्वनि प्रदूषण को लेकर दिशा निर्देश भी जारी किए जाते हैं। लेकिन केवल सरकारी आदेशों से इस समस्या का समाधान संभव नहीं है। जब तक नागरिक स्वयं अपनी जिम्मेदारी नहीं समझेंगे, तब तक प्रदूषण के खिलाफ लड़ाई अधूरी रहेगी। यह भी जरूरी है कि नियमों का पालन केवल कागजों तक सीमित न रहे। प्रशासन को अवैध पटाखों की बिक्री और प्रतिबंधित आतिशबाजी पर प्रभावी निगरानी रखनी चाहिए। साथ ही पर्यावरण के अनुकूल विकल्पों के प्रति जागरूकता बढ़ानी होगी। दीपावली की खुशी मनाने के लिए आतिशबाजी अनिवार्य नहीं है। हम मिट्टी के दीपक जलाकर, घरों को सजाकर, जरूरतमंद परिवारों की मदद करके, बच्चों को मिठाइयां बांटकर और परिवार के साथ समय बिताकर भी इस पर्व को यादगार बना सकते हैं। स्थानीय कुम्हारों से मिट्टी के दीप खरीदना न केवल हमारी परंपरा को जीवित रखेगा, बल्कि उनके रोजगार को भी सहारा देगा। सामूहिक रूप से दीपोत्सव आयोजित करना और पर्यावरण संरक्षण का संकल्प लेना इस पर्व को और अधिक सार्थक बना सकता है। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि हमें अपनी आने वाली पीढिय़ों के बारे में सोचना होगा। क्या हम अपने बच्चों को ऐसा वातावरण देना चाहते हैं, जहां दीपावली के अगले दिन उन्हें स्वच्छ हवा के बजाय प्रदूषण की चादर मिले? क्या हम चाहते हैं कि त्योहारों की खुशी के बाद अस्पतालों में मरीजों की संख्या बढ़े? यदि नहीं, तो बदलाव की शुरुआत हमें स्वयं से करनी होगी।
दीपावली अंधकार को मिटाकर प्रकाश फैलाने का पर्व है। आज आवश्यकता इस बात की है कि हम केवल अपने घरों को ही नहीं, बल्कि अपने विचारों को भी रोशन करें। आतिशबाजी के शोर और धुएं से ऊपर उठकर जीवन, स्वास्थ्य और प्रकृति को प्राथमिकता दें। आखिर त्योहार तभी सार्थक है, जब उसकी खुशियां सभी के हिस्से में आएं। इस दीपावली संकल्प लें कि घर-आंगन में दीप जलेंगे, लेकिन किसी की सांसों में धुआं नहीं भरेंगे। क्योंकि असली दीपावली वही है, जिसमें रोशनी भी हो, खुशहाली भी हो और हर किसी के हिस्से में स्वच्छ हवा भी आए।
