दीपावली: दीप जले, मन उजले

हेमेन्द्र क्षीरसागर
भारतीय संस्कृति में पर्व और त्योहार केवल उत्सव मनाने के अवसर नहीं हैं, बल्कि वे जीवन-दर्शन, आध्यात्मिक चेतना, सामाजिक समरसता और सांस्कृतिक विरासत के संवाहक भी हैं। इन्हीं पर्वों में दीपावली का विशेष स्थान है। कार्तिक मास की अमावस्या को मनाया जाने वाला दीपोत्सव भारत के सबसे बड़े और महत्त्वपूर्ण त्योहारों में से एक है। यह पर्व आध्यात्मिक रूप से अंधकार पर प्रकाश, असत्य पर सत्य और बुराई पर अच्छाई की विजय का प्रतीक है।  दीपावली का मूल संदेश है तमसो मा ज्योतिर्गमय अर्थात् हे प्रभु! हमें अंधकार से प्रकाश की ओर ले चलिए। उपनिषदों में निहित यह प्रार्थना भारतीय जीवन-दर्शन की उस शाश्वत भावना को अभिव्यक्त करती है। जो मनुष्य को अज्ञान से ज्ञान, निराशा से आशा और नकारात्मकता से सकारात्मकता की ओर प्रेरित करती है। दीपावली का धार्मिक और सामाजिक महत्त्व भारतीय जनमानस में गहराई से रचा-बसा है। यह पर्व केवल हिंदू धर्म तक सीमित नहीं है, बल्कि सिख, जैन और बौद्ध परंपराओं में भी विभिन्न रूपों में इसका महत्त्व स्वीकार किया गया है। जैन धर्मावलंबी इसे भगवान महावीर के निर्वाण दिवस के रूप में मनाते हैं। वहीं सिख समुदाय के लिए यह पर्व बंदी छोड़ दिवस के रूप में विशेष महत्त्व रखता है। इस प्रकार दीपावली भारतीय उपमहाद्वीप की विविध धार्मिक और सांस्कृतिक परंपराओं को जोड़ने वाला उत्सव भी है। दीपावली मनाने के पीछे अनेक पौराणिक और धार्मिक मान्यताएं प्रचलित हैं। इनमें सबसे लोकप्रिय मान्यता भगवान श्रीराम के अयोध्या आगमन से जुड़ी है। मान्यता है कि चौदह वर्ष का वनवास पूर्ण करने और रावण पर विजय प्राप्त करने के बाद जब भगवान श्रीराम, माता सीता और लक्ष्मण अयोध्या लौटे। तब उनके स्वागत में अयोध्यावासियों ने घी के दीपक जलाकर पूरी नगरी को प्रकाश से आलोकित कर दिया। कार्तिक अमावस्या की सघन अंधकारमय रात्रि असंख्य दीपों की रोशनी से जगमगा उठी। तभी से दीपावली को श्रीराम के स्वागत और धर्म की विजय के प्रतीक पर्व के रूप में मनाने की परंपरा प्रचलित हुई। एक अन्य पौराणिक मान्यता भगवान श्रीकृष्ण द्वारा नरकासुर के वध से संबंधित है। कहा जाता है कि भगवान श्रीकृष्ण ने अपनी पत्नी सत्यभामा की सहायता से अत्याचारी असुर राजा नरकासुर का अंत किया था। नरकासुर के आतंक और अत्याचार से मुक्ति मिलने की खुशी में लोगों ने दीप जलाकर प्रसन्नता व्यक्त की। इसी घटना की स्मृति में नरक चतुर्दशी और दीपोत्सव मनाने की परंपरा भी जुड़ी हुई है। इसके अतिरिक्त कुछ मान्यताओं में पांडवों के वनवास और उनके पुनः लौटने की खुशी को भी दीपोत्सव की परंपरा से जोड़ा जाता है। दीपावली का संबंध धन, वैभव और समृद्धि की अधिष्ठात्री देवी मां लक्ष्मी से भी है। पौराणिक मान्यता के अनुसार समुद्र मंथन के दौरान मां लक्ष्मी का प्राकट्य हुआ था। इसी कारण दीपावली की अमावस्या को घर-घर में दीप प्रज्वलित कर मां लक्ष्मी और भगवान गणेश की पूजा-अर्चना की जाती है।  भारतीय जनमानस में यह विश्वास है कि स्वच्छता, पवित्रता, सद्भाव और सकारात्मक विचारों से परिपूर्ण वातावरण में सुख-समृद्धि का वास होता है। कुछ परंपराओं में मां काली की आराधना का भी विशेष विधान है। विशेषकर पूर्वी भारत में दीपावली की रात्रि को काली पूजा श्रद्धा और भक्ति के साथ संपन्न की जाती है। इस प्रकार एक ही पर्व विभिन्न क्षेत्रों में अलग-अलग धार्मिक मान्यताओं और उपासना पद्धतियों के साथ मनाया जाता है। वस्तुतः दीपावली का वास्तविक अर्थ केवल घरों, प्रतिष्ठानों और बाजारों को रोशनी से सजाना नहीं है, बल्कि अपने अंतर्मन के अंधकार को दूर करना भी है। दीप जले, मन उजले तो आए नया सवेरा। ऐसे यह पर्व हमें आत्मचिंतन का अवसर देता है कि हमारे भीतर व्याप्त अहंकार, ईर्ष्या, द्वेष, लोभ और नकारात्मकता जैसे विकार किस प्रकार दूर हों। दीपक स्वयं जलकर दूसरों को प्रकाश देता है। उसका यह गुण हमें परोपकार, त्याग, सहयोग और सेवा की प्रेरणा देता है। 

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