शिवसेना विवाद: शिंदे गुट की दलील, विधानसभा का कार्यकाल खत्म होने के बाद विधायकों की अयोग्यता की मांग बेअसर

नई दिल्ली। शिवसेना के नाम और चुनाव चिह्न को लेकर सुप्रीम कोर्ट में बुधवार को सुनवाई हुई। इस दौरान एकनाथ शिंदे गुट के वरिष्ठ अधिवक्ता ध्रुव मेहता ने जोरदार दलीलें पेश करते हुए उद्धव ठाकरे गुट की ओर से विधायकों को अयोग्य ठहराने की मांग पर सवाल उठाए। उन्होंने तर्क दिया कि महाराष्ट्र विधानसभा का कार्यकाल समाप्त हो चुका है, इसलिए अब पूर्व विधानसभा के सदस्यों को अयोग्य घोषित करने की मांग निष्फल हो गई है। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ के समक्ष मेहता ने कहा कि 21 जून 2022 को हुई विधायकों की बैठक में एकनाथ शिंदे विधायक दल के नेता बने हुए थे और भरत गोगावले को मुख्य सचेतक नियुक्त किया गया था। ऐसे में शिंदे गुट का व्हिप वैध था।
विधानसभा अध्यक्ष के अधिकारों का दिया हवाला
मेहता ने संविधान की दसवीं अनुसूची का हवाला देते हुए कहा कि विधायकों की अयोग्यता पर निर्णय लेने का अधिकार विधानसभा अध्यक्ष को है। यदि अध्यक्ष के फैसले में कानूनी त्रुटि हो तो सामान्यतः मामला दोबारा उनके पास भेजा जाना चाहिए। उन्होंने ‘राजेंद्र सिंह राणा’ और ‘सुभाष देसाई’ मामलों के फैसलों का भी उल्लेख किया। उन्होंने ‘किहोतो होलोहोन’ मामले का हवाला देते हुए कहा कि विधानसभा अध्यक्ष दसवीं अनुसूची के तहत न्यायाधिकरण के रूप में कार्य करते हैं और उनके फैसले की न्यायिक समीक्षा सीमित आधारों पर ही हो सकती है।
दिवाली के बाद फिर होगी सुनवाई
शिंदे गुट की ओर से यह भी दलील दी गई कि विधानसभा का कार्यकाल समाप्त होने के बाद पूर्व सदस्यों को अयोग्य ठहराने का आदेश प्रभावी राहत नहीं दे सकता। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने इन दलीलों पर अभी कोई अंतिम निर्णय नहीं दिया है। बुधवार की सुनवाई पूरी हो गई और मामले की अगली सुनवाई दिवाली के बाद होगी।
