संपादकीय: मतदाता सूची में गड़बड़ी!

भारतीय लोकतंत्र में मतदाता सूची की शुद्धता निष्पक्ष चुनाव की पहली शर्त है। लेकिन विशेष गहन पुनरीक्षण यानी एसआईआर की प्रक्रिया को लेकर लगातार उठ रहे सवालों ने चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली और पारदर्शिता पर नई बहस छेड़ दी है। मतदाताओं के नाम हटने, गलत जानकारी दर्ज होने और पंजीकरण प्रक्रिया में कथित अनियमितताओं के बाद अब उत्तर प्रदेश में मतदाताओं के नाम तथा उनके पिता के नाम बदल दिए जाने के आरोप सामने आए हैं। यदि इन आरोपों की पुष्टि होती है, तो यह केवल प्रशासनिक लापरवाही नहीं, बल्कि नागरिकों के मताधिकार से जुड़ा अत्यंत गंभीर मामला होगा। कांग्रेस ने लखनऊ में आयोजित प्रेस कॉन्फ्रेंस में उत्तर प्रदेश की पीलीभीत सदर विधानसभा सीट की मतदाता सूची को लेकर कई गंभीर दावे किए हैं। पार्टी के अनुसार इस विधानसभा क्षेत्र में 13,150 मतदाताओं के नाम बदल दिए गए, जबकि उनके मतदाता पहचान-पत्र के एपिक नंबर और क्रम संख्या यथावत रहे। इसके अतिरिक्त 804 ऐसे मतदाताओं के नाम सूची से हटाने का आरोप लगाया गया है, जो अब भी संबंधित क्षेत्र में निवास करते हैं। कांग्रेस ने लगभग 2,600 ऐसे नाम सूची में जोड़े जाने का भी दावा किया है, जिनका उस क्षेत्र से संबंध नहीं है। इस प्रकार एक विधानसभा क्षेत्र में कुल 16,554 प्रविष्टियों को लेकर सवाल उठाए गए हैं। ये आंकड़े फिलहाल राजनीतिक आरोपों का हिस्सा हैं और इनकी स्वतंत्र जांच आवश्यक है। लेकिन सवाल यह है कि यदि किसी मतदाता का नाम या उसके पिता का नाम बिना उचित प्रक्रिया के बदल जाता है, तो इसकी जिम्मेदारी किसकी होगी? एक सामान्य नागरिक अपने मतदाता पहचान-पत्र और सरकारी दस्तावेजों पर भरोसा करता है। मतदान के दिन सूची में उसका विवरण अलग मिलने पर उसे कठिनाइयों का सामना करना पड़ सकता है। इसलिए ऐसी शिकायतों को मामूली तकनीकी त्रुटि बताकर नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए। मतदाता सूची तैयार करने और उसमें संशोधन करने की प्रक्रिया पूरी तरह पारदर्शी होनी चाहिए। प्रत्येक बदलाव का स्पष्ट रिकॉर्ड उपलब्ध होना आवश्यक है। किस अधिकारी ने किस आधार पर नाम बदला, किस आवेदन पर प्रविष्टि हटाई गई और संबंधित मतदाता को इसकी सूचना दी गई या नहीं, इन सभी सवालों के जवाब मिलने चाहिए। यदि किसी सॉफ्टवेयर की त्रुटि से गड़बड़ी हुई है, तो उसका तकनीकी परीक्षण होना चाहिए। वहीं जानबूझकर छेड़छाड़ के प्रमाण मिलने पर जिम्मेदार व्यक्तियों के खिलाफ कानूनी कार्रवाई आवश्यक होगी। चुनाव आयोग के डिजिटल पोर्टल और मतदाता डेटाबेस के केंद्रीकरण को लेकर भी सवाल उठाए गए हैं। चुनावी व्यवस्था में तकनीक का उपयोग पारदर्शिता और सुविधा बढ़ाने के लिए होना चाहिए, न कि ऐसी स्थिति पैदा करने के लिए जिसमें स्थानीय निर्वाचन अधिकारियों और नागरिकों को महत्वपूर्ण जानकारी तक पहुंचने में कठिनाई हो। आयोग को स्पष्ट करना चाहिए कि मतदाता सूची में बदलाव करने के अधिकार किन अधिकारियों के पास हैं और प्रत्येक संशोधन की निगरानी किस प्रकार की जाती है। एसआईआर का उद्देश्य मतदाता सूची को त्रुटिरहित बनाना है। मृत व्यक्तियों, दोहरी प्रविष्टियों और अन्य अपात्र नामों को हटाना जरूरी है, लेकिन इस प्रक्रिया में किसी पात्र मतदाता का नाम गलत तरीके से हटना भी उतना ही गंभीर विषय है। मतदाता सूची की शुद्धता और नागरिकों के मतदान अधिकार की सुरक्षा एक-दूसरे के पूरक हैं। किसी एक उद्देश्य की पूर्ति के नाम पर दूसरे की अनदेखी नहीं की जा सकती। उत्तर प्रदेश और पश्चिम बंगाल में मतदाता सूची से बड़ी संख्या में नाम हटाए जाने को लेकर भी राजनीतिक विवाद जारी है। इन मामलों में यह स्पष्ट करना आवश्यक है कि कितनी प्रविष्टियां किन कारणों से हटाई गईं, कितने नागरिकों ने आपत्तियां दर्ज कराईं और कितनों के नाम जांच के बाद बहाल हुए। केवल बड़े आंकड़े जारी करने से पारदर्शिता सुनिश्चित नहीं होती। प्रत्येक प्रभावित नागरिक को अपनी स्थिति जानने और गलती सुधारने का प्रभावी अवसर मिलना चाहिए। चुनाव आयोग एक संवैधानिक संस्था है और उसकी विश्वसनीयता देश की लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है। इसलिए आयोग से जुड़े सवालों का जवाब राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप के बजाय दस्तावेजों, तकनीकी जांच और स्पष्ट तथ्यों के आधार पर सामने आना चाहिए। विपक्ष की ओर से लगाए गए आरोपों की निष्पक्ष जांच जितनी जरूरी है, उतना ही जरूरी आयोग का पक्ष और उपलब्ध साक्ष्य सार्वजनिक होना भी है। लोकतंत्र में एक भी पात्र नागरिक का मताधिकार प्रशासनिक गलती या अनुचित प्रक्रिया के कारण प्रभावित नहीं होना चाहिए। मतदाता सूची में कथित गड़बड़ियों की स्वतंत्र जांच, त्रुटियों का समयबद्ध सुधार और प्रत्येक संशोधन की जवाबदेही सुनिश्चित करना आवश्यक है। चुनाव आयोग की विश्वसनीयता केवल संवैधानिक अधिकारों से नहीं, बल्कि पारदर्शी कार्यप्रणाली और नागरिकों के भरोसे से मजबूत होती है।
