महाराष्ट्र धर्म स्वतंत्रता अधिनियम को चुनौती देने वाली याचिका वापस

बॉम्बे हाई कोर्ट ने कहा— ठोस व्यक्तिगत शिकायत और तथ्य स्पष्ट करें, नई याचिका दाखिल करने की छूट

मुंबई। बॉम्बे हाई कोर्ट ने गुरुवार को ‘महाराष्ट्र धर्म स्वतंत्रता अधिनियम, 2026’ की संवैधानिक वैधता को चुनौती देने वाली याचिका वापस लेने की अनुमति दे दी। अदालत ने कहा कि याचिका में यह स्पष्ट करने वाले ठोस तथ्य नहीं हैं कि कानून से याचिकाकर्ता व्यक्तिगत रूप से किस तरह प्रभावित हुआ है। मुख्य न्यायाधीश एम.सी.त्रिपाठी और न्यायमूर्ति अद्वैत सेठना की पीठ ने सुनवाई के दौरान कहा कि याचिका में विशिष्ट तथ्यात्मक शिकायत का अभाव है और यह एक सामान्य कानूनी चुनौती जैसी प्रतीत होती है। पीठ ने याचिकाकर्ता से कहा कि वह यह स्पष्ट करे कि कानून के कारण उसके धार्मिक अधिकारों के इस्तेमाल में वास्तविक रूप से किस तरह बाधा आई। अदालत ने बेहतर तथ्यात्मक आधार के साथ नई याचिका दायर करने की बात कही, ताकि मामले की वास्तविक परिस्थितियों का आकलन किया जा सके। यह याचिका ठाणे जिले के भिवंडी निवासी एक 70 वर्षीय इस्लामिक शिक्षक ने दायर की थी। उनकी ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता यूसुफ मुछला ने तर्क दिया कि कानून संविधान के अनुच्छेद 25 के तहत प्राप्त धर्म की स्वतंत्रता के अधिकार का उल्लंघन करता है। याचिकाकर्ता ने अधिनियम में ‘प्रलोभन’ की परिभाषा के साथ धारा 6 और 7 में निर्धारित प्रक्रिया को भी चुनौती दी थी। याचिका में कहा गया कि धर्म परिवर्तन की इच्छा रखने वाले व्यक्ति को 60 दिन पहले अधिकारियों को सूचना देने और इस सूचना को सार्वजनिक किए जाने की प्रक्रिया उसकी निजता और व्यक्तिगत धार्मिक स्वतंत्रता में हस्तक्षेप करती है। सुनवाई के दौरान पीठ ने बार-बार यह सवाल उठाया कि कानून ने याचिकाकर्ता को व्यक्तिगत रूप से किस प्रकार प्रभावित किया है और क्या इससे संबंधित कोई वास्तविक घटना या परिस्थिति याचिका में दर्ज है। ‘महाराष्ट्र धर्म स्वतंत्रता अधिनियम, 2026’ का उद्देश्य बल, धोखाधड़ी, दबाव, प्रलोभन, गलत बयानी, अनुचित प्रभाव अथवा विवाह के माध्यम से कराए जाने वाले धर्मांतरण को रोकना बताया गया है। कानून के कुछ प्रावधानों को लेकर व्यक्तिगत स्वतंत्रता, निजता और धार्मिक विकल्पों पर प्रभाव पड़ने की आशंकाएं भी जताई गई हैं। सुनवाई के दौरान मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि राज्य की चिंता बल या दबाव से कराए जाने वाले धर्मांतरण को लेकर है और इसे स्वेच्छा से धर्म परिवर्तन से अलग देखा जाना चाहिए। वरिष्ठ अधिवक्ता मुछला ने याचिका में अतिरिक्त तथ्य शामिल करने के लिए संशोधन की अनुमति मांगी, लेकिन पीठ ने यह अनुरोध स्वीकार नहीं किया। इसके बाद याचिकाकर्ता ने याचिका वापस ले ली। अदालत ने स्पष्ट किया कि याचिकाकर्ता आवश्यक तथ्यों और व्यक्तिगत शिकायत के आधार के साथ नई याचिका दाखिल कर दोबारा अदालत का दरवाजा खटखटा सकता है।

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