विदेशी फंडिंग का आरोप: सनसनी से नहीं, सबूतों से तय होनी चाहिए सच्चाई

सौरभ वार्ष्णेय
बिना प्रमाण गंभीर आरोप लगाना लोकतंत्र, राजनीतिक विमर्श और सार्वजनिक विश्वसनीयता के लिए कितना उचित? यह सवाल अपने आप में ही प्रश्रचिन्ह लगा रहा है। अंतरराष्ट्रीय राजनीति में किसी देश के आंतरिक मामलों में विदेशी हस्तक्षेप की आशंका को पूरी तरह खारिज नहीं किया जा सकता। दुनिया के अनेक देशों में राजनीतिक गतिविधियों, चुनावी प्रक्रियाओं और जन आंदोलनों पर बाहरी प्रभाव को लेकर समय-समय पर सवाल उठते रहे हैं। लेकिन किसी आशंका को प्रमाणित तथ्य के रूप में प्रस्तुत करना और किसी राजनीतिक दल पर विदेशी धन लेकर देश में अशांति फैलाने का आरोप लगाना दो अलग-अलग बातें हैं। यही अंतर जिम्मेदार पत्रकारिता, निष्पक्ष राजनीतिक विमर्श और लोकतांत्रिक मूल्यों की बुनियाद है। हाल ही में अमेरिकी गायिका और अभिनेत्री मैरी मिलबेन के नाम से सोशल मीडिया के जरिये सामने आए एक बयान में भारत में सक्रिय एक राजनीतिक दल को अमेरिका से भारी वित्तीय सहायता मिलने का आरोप लगाया गया है। इस दावे में यह भी कहा गया है कि विदेशी धन का इस्तेमाल भारत की आंतरिक शांति को प्रभावित करने, सामाजिक विद्वेष बढ़ाने और केंद्र सरकार के कामकाज में बाधाएं उत्पन्न करने के लिए किया जा रहा है। आरोपों के समर्थन में कुछ व्यक्तियों और कथित वित्तीय समूहों का भी उल्लेख किया गया है। ऐसे गंभीर आरोप सामने आने के बाद सबसे महत्वपूर्ण सवाल यही है कि इन दावों के समर्थन में ठोस सबूत क्या हैं? क्या किसी बैंक खाते का विवरण सामने आया है? क्या किसी वित्तीय लेन-देन का दस्तावेज उपलब्ध है? क्या संबंधित एजेंसी ने कोई जांच की है? क्या किसी विश्वसनीय जांच रिपोर्ट या आधिकारिक दस्तावेज में इन आरोपों की पुष्टि हुई है? यदि इन सवालों के जवाब उपलब्ध नहीं हैं, तो ऐसे बयानों को प्रमाणित समाचार की तरह प्रस्तुत करना उचित नहीं होगा।
किसी राजनीतिक दल को विदेशी धन मिलने का आरोप सामान्य राजनीतिक टिप्पणी नहीं है। यह एक गंभीर आरोप है, जिसका संबंध देश की संप्रभुता, राजनीतिक पारदर्शिता और कानून के पालन से जुड़ा है। यदि किसी दल या संगठन को अवैध विदेशी वित्तपोषण प्राप्त हुआ है, तो इसकी निष्पक्ष जांच होनी चाहिए। दोष सिद्ध होने पर कानून के अनुसार कार्रवाई भी होनी चाहिए। लेकिन जांच से पहले ही किसी संगठन को देशविरोधी गतिविधियों में शामिल घोषित कर देना न्याय के सिद्धांतों के अनुरूप नहीं है। राजनीति में आरोप लगाना आसान है, लेकिन उन्हें प्रमाणित करना कठिन। इसलिए यह आवश्यक है कि आरोप लगाने वाला व्यक्ति अपने दावों के समर्थन में विश्वसनीय दस्तावेज, वित्तीय रिकॉर्ड या अन्य सत्यापन योग्य साक्ष्य प्रस्तुत करे। केवल सोशल मीडिया पोस्ट, राजनीतिक बयान अथवा किसी विदेशी नागरिक की टिप्पणी अपने आप में किसी गंभीर आरोप का प्रमाण नहीं बन जाती। यहां यह भी स्पष्ट होना चाहिए कि उपलब्ध विवरण के आधार पर मैरी मिलबेन के नाम से प्रसारित आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं मानी जा सकती। जब तक विश्वसनीय साक्ष्य सामने नहीं आते, तब तक इन्हें आरोप या दावा ही कहा जाना चाहिए, स्थापित तथ्य नहीं। लोकतंत्र में राजनीतिक दलों के बीच मतभेद स्वाभाविक हैं। सत्तापक्ष और विपक्ष, दोनों को अपनी विचारधारा रखने, सरकार की नीतियों की आलोचना करने और जनता के सामने अपना पक्ष रखने का अधिकार है। यही लोकतंत्र की शक्ति है। लेकिन जब राजनीतिक विरोध को विदेशी साजिश, देशविरोधी गतिविधि या राष्ट्रीय सुरक्षा के संकट से जोड़ दिया जाता है, तब यह देखना जरूरी हो जाता है कि ऐसा निष्कर्ष किन तथ्यों के आधार पर निकाला गया है। यदि किसी राजनीतिक दल को बदनाम करने के उद्देश्य से अपुष्ट आरोपों को बार-बार प्रसारित किया जाता है, तो इससे जनता के बीच भ्रम पैदा हो सकता है। दूसरी ओर, यदि वास्तव में विदेशी वित्तपोषण के जरिए गैरकानूनी गतिविधियां संचालित की जा रही हैं, तो उनकी अनदेखी भी नहीं की जा सकती। इसलिए न तो हर आरोप को राजनीतिक षड्यंत्र कहकर खारिज करना उचित है और न ही हर आरोप को सच मान लेना। भारत एक संप्रभु लोकतांत्रिक देश है। यहां राजनीतिक गतिविधियों, संगठनों और विदेशी अंशदान से संबंधित मामलों में कानून लागू होते हैं। विदेशी योगदान विनियमन अधिनियम सहित संबंधित कानूनी प्रावधानों के तहत पात्र संस्थाओं के विदेशी अंशदान पर नियमन और निगरानी की व्यवस्था है। किसी विशिष्ट मामले में कौन-सा कानून लागू होगा, यह संबंधित संस्था, धन के स्रोत, प्राप्तकर्ता और लेन-देन की प्रकृति पर निर्भर करता है। यदि किसी विदेशी संस्था या व्यक्ति द्वारा भारतीय कानूनों का उल्लंघन करके धन उपलब्ध कराने के प्रमाण मिलते हैं, तो सक्षम एजेंसियों को जांच करनी चाहिए। लेकिन विदेशी नागरिकों की राजनीतिक टिप्पणियों को अपने आप विदेशी फंडिंग का सबूत नहीं माना जा सकता। इसी प्रकार, किसी राजनीतिक दल की सरकार विरोधी गतिविधि मात्र से यह निष्कर्ष भी नहीं निकाला जा सकता कि उसके पीछे विदेशी धन है। भारत की संप्रभुता की रक्षा करना जितना जरूरी है, उतना ही जरूरी है कि इस विषय का इस्तेमाल राजनीतिक प्रतिद्वंद्वियों के विरुद्ध बिना प्रमाण आरोप लगाने के लिए न किया जाए। मैरी मिलबेन पहले भी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भारत की कुछ नीतियों के समर्थन में अपनी राय व्यक्त कर चुकी हैं। किसान आंदोलन के दौरान कृषि सुधारों पर उनका रुख और बीबीसी की डॉक्यूमेंट्री ‘इंडिया द मोदी क्वेश्चन को लेकर उनकी टिप्पणियां सार्वजनिक विमर्श का हिस्सा रही हैं। लेकिन किसी व्यक्ति का पहले किसी सरकार का समर्थन करना या किसी नीति के पक्ष में बोलना, उसके नए आरोपों की सत्यता का प्रमाण नहीं बन जाता।
राजनीतिक समर्थन और तथ्यात्मक प्रमाण दो अलग-अलग विषय हैं। किसी व्यक्ति की प्रतिष्ठा, अंतरराष्ट्रीय पहचान या किसी नेता के प्रति उसकी प्रशंसा के आधार पर उसके प्रत्येक दावे को सही नहीं माना जा सकता। उसी तरह, किसी व्यक्ति के राजनीतिक विचारों से असहमति होने के कारण उसके प्रत्येक कथन को गलत भी नहीं ठहराया जा सकता। हर दावे की जांच उसके प्रमाणों के आधार पर होनी चाहिए।आज सोशल मीडिया के दौर में सनसनीखेज दावे तेजी से फैलते हैं। कई बार किसी बयान को आकर्षक शीर्षक देकर इस तरह प्रसारित किया जाता है कि पाठक आरोप और सच्चाई के बीच का अंतर भूल जाते हैं। इससे लोकतांत्रिक संवाद प्रभावित होता है और समाज में अनावश्यक अविश्वास पैदा हो सकता है। समाचार माध्यमों की जिम्मेदारी है कि वे किसी भी गंभीर आरोप को प्रकाशित करने से पहले उसके स्रोत, संदर्भ और प्रमाणों की पड़ताल करें। संबंधित राजनीतिक दल या व्यक्ति का पक्ष लें, आधिकारिक रिकॉर्ड की जांच करें और जहां पुष्टि उपलब्ध न हो, वहां स्पष्ट रूप से लिखें कि दावा स्वतंत्र रूप से सत्यापित नहीं हुआ है। पाठकों को भी चाहिए कि वे किसी सनसनीखेज पोस्ट को तुरंत सच मानने या आगे प्रसारित करने से पहले उसकी विश्वसनीयता जांचें। राष्ट्रहित का अर्थ केवल किसी सरकार या राजनीतिक दल का समर्थन करना नहीं है इसका अर्थ सत्य, कानून, पारदर्शिता और लोकतांत्रिक संस्थाओं के प्रति प्रतिबद्धता भी है।
यदि भारत में किसी राजनीतिक दल या संगठन को अवैध विदेशी वित्तीय सहायता मिलने का ठोस प्रमाण है, तो उसे सार्वजनिक किया जाना चाहिए और कानून के अनुसार जांच होनी चाहिए। लेकिन यदि आरोप केवल बयानबाजी और अपुष्ट दावों पर आधारित हैं, तो उन्हें तथ्य के रूप में प्रचारित करना जनता को भ्रमित करने जैसा होगा। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के समर्थकों को अपने नेता के पक्ष में विचार रखने का पूरा अधिकार है। विपक्षी दलों को सरकार की आलोचना करने का भी समान लोकतांत्रिक अधिकार है। दोनों के लिए एक ही कसौटी होनी चाहिए तथ्य और प्रमाण। भारत की प्रतिष्ठा किसी सनसनीखेज बयान से न तो बनती है और न ही बिगडऩी चाहिए। देश की प्रतिष्ठा मजबूत होती है निष्पक्ष जांच, पारदर्शी व्यवस्था, स्वतंत्र पत्रकारिता और न्यायपूर्ण कार्रवाई से। इसलिए विदेशी फंडिंग के इस कथित मामले में भी भावनात्मक प्रतिक्रियाओं के बजाय प्रमाण सामने लाने की मांग की जानी चाहिए। लोकतंत्र में आरोप लगाना अधिकार हो सकता है, लेकिन आरोप को सच मानने से पहले प्रमाण मांगना जनता का अधिकार और पत्रकारिता का दायित्व है।
