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संपादकीय: विनाश की ओर बढ़ती दुनिया!

अमरीका और ईरान के बीच शांति की उम्मीद एक बार फिर युद्ध की आग में झुलसती दिखाई दे रही है। महज 20-21 दिन तक चले कथित युद्धविराम के बाद 8 जुलाई को तड़के अमरीका द्वारा ईरान के 80 से अधिक ठिकानों पर किए गए ताबड़तोड़ हमलों ने पश्चिम एशिया को एक बार फिर गंभीर संकट में डाल दिया है। इसके जवाब में ईरान ने भी कई खाड़ी देशों में स्थित अमरीकी सैन्य ठिकानों को बैलिस्टिक मिसाइलों और ड्रोन से निशाना बनाने का दावा किया है। अचानक तेज हुए इस सैन्य टकराव ने न केवल खाड़ी देशों में भय और अस्थिरता पैदा कर दी है, बल्कि पूरी दुनिया के सामने एक व्यापक युद्ध का खतरा खड़ा कर दिया है। सवाल यह है कि जिस संघर्ष को बातचीत और कूटनीति के जरिए समाप्त करने की उम्मीद की जा रही थी, वह आखिर इतनी जल्दी दोबारा विनाशकारी युद्ध में कैसे बदल गया? बंदर अब्बास, सिरिक बंदरगाह, केश्म द्वीप और बुशहर परमाणु केंद्र के आसपास हुए हमलों की खबरें स्थिति की गंभीरता को दर्शाती हैं। ईरान की आईआरजीसी की दर्जनों पावर बोट्स को नष्ट करने के दावे भी किए गए हैं। दूसरी ओर इजरायल भी ईरान के खिलाफ सैन्य कार्रवाई की तैयारी में दिखाई दे रहा है। इजरायली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू द्वारा ईरान के पास कथित ‘रासायनिक हथियार’ होने का आरोप इतिहास की उन घटनाओं की याद दिलाता है, जब इराक के खिलाफ जैविक और रासायनिक हथियार रखने के आरोपों को युद्ध का आधार बनाया गया था। बाद में ऐसे हथियार नहीं मिले, लेकिन तब तक इराक तबाही और अस्थिरता के लंबे दौर में प्रवेश कर चुका था। सवाल यह है कि क्या दुनिया एक बार फिर उसी इतिहास को दोहराने की दिशा में बढ़ रही है?
अमरीकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा युद्धविराम समाप्त होने की घोषणा और ईरान के खिलाफ बेहद कठोर भाषा का इस्तेमाल कूटनीति की संभावनाओं को और कमजोर करता दिखाई देता है। ईरानी नेतृत्व के साथ बातचीत को ‘वक्त की बर्बादी’ बताना और ईरान के तटों को ‘नरक’ बनाने जैसी धमकियां किसी जिम्मेदार वैश्विक नेतृत्व की भाषा नहीं कही जा सकतीं। युद्ध चाहे किसी भी पक्ष द्वारा शुरू किया जाए, उसका सबसे बड़ा नुकसान आम नागरिकों, वैश्विक अर्थव्यवस्था और उन देशों को उठाना पड़ता है, जिनका इस संघर्ष से प्रत्यक्ष संबंध भी नहीं होता। युद्धविराम के टूटने और सैन्य हमलों के बाद कच्चे तेल की कीमतों में तेज उछाल और दुनिया के शेयर बाजारों में गिरावट इसका प्रत्यक्ष उदाहरण है। होर्मुज जलडमरूमध्य को बंद करने की ईरानी घोषणा ने वैश्विक अर्थव्यवस्था के सामने एक और बड़ा संकट खड़ा कर दिया है। यह समुद्री मार्ग दुनिया की ऊर्जा आपूर्ति के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है। यदि यहां लंबे समय तक तनाव बना रहता है, तो कच्चे तेल की कीमतों में और वृद्धि हो सकती है, जिसका सीधा असर महंगाई, परिवहन लागत और आम नागरिकों की जेब पर पड़ेगा। सैकड़ों जहाजों और हजारों नाविकों के फंसने की खबरें युद्ध के मानवीय और आर्थिक प्रभावों की गंभीरता को सामने रखती हैं। भारत भी इस संकट से अछूता नहीं रह सकता। भारतीय जहाजों और नाविकों की सुरक्षा के साथ-साथ रुपये की कमजोरी और महंगे कच्चे तेल का असर देश की अर्थव्यवस्था पर पड़ना स्वाभाविक है। सबसे चिंताजनक तथ्य यह है कि ये हमले ऐसे समय हुए हैं, जब बातचीत और कूटनीतिक समाधान की आवश्यकता पहले से कहीं अधिक थी। प्रतिबंधों को हटाने, फिर दोबारा लागू करने और सैन्य कार्रवाई शुरू करने की घटनाएं बताती हैं कि अंतरराष्ट्रीय राजनीति में विश्वास का संकट लगातार गहराता जा रहा है। जब समझौतों और युद्धविराम की उम्र महज कुछ सप्ताह रह जाए, तब भविष्य में किसी भी देश को बातचीत की मेज तक लाना और कठिन हो जाता है।
ईरान ने साफ कर दिया है कि होर्मुज जलडमरूमध्य को वह अपनी शर्तों पर ही खोलेगा, जबकि अमरीका सैन्य दबाव और नाकेबंदी की रणनीति पर आगे बढ़ता दिखाई दे रहा है। दोनों देशों के बीच बढ़ता टकराव अब केवल द्विपक्षीय संघर्ष नहीं रह गया है। इसमें खाड़ी देश, इजरायल और दुनिया की बड़ी आर्थिक शक्तियां प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से प्रभावित हो रही हैं। यदि सैन्य कार्रवाई का यह सिलसिला नहीं रुका, तो इसका परिणाम एक ऐसे व्यापक युद्ध के रूप में सामने आ सकता है, जिसकी कीमत पूरी दुनिया को चुकानी पड़ेगी। युद्ध किसी समस्या का स्थायी समाधान नहीं होता। इतिहास गवाह है कि बम और मिसाइलें सरकारों और सैन्य ठिकानों को नष्ट कर सकती हैं, लेकिन वे स्थायी शांति स्थापित नहीं कर सकतीं। अमरीका और ईरान दोनों को यह समझना होगा कि अहंकार, धमकियों और प्रतिशोध की राजनीति अंततः विनाश की ओर ही ले जाती है। आज आवश्यकता नए हमलों और जवाबी हमलों की नहीं, बल्कि संयम, संवाद और विश्वसनीय कूटनीति की है। दुर्भाग्य से वर्तमान परिस्थितियां इसके बिल्कुल विपरीत दिशा में जाती दिखाई दे रही हैं। दुनिया एक बार फिर युद्ध के मुहाने पर खड़ी है और सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या वैश्विक नेतृत्व समय रहते विनाश की इस दौड़ को रोक पाएगा, या मानवता को एक और भयावह युद्ध की कीमत चुकानी पड़ेगी?

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