चिरंतन शांति…

जब इंसान इस दुनिया से चला जाता है,
तब सब कुछ शांत हो जाता है…
न कोई सवाल बचता है,
न कोई उम्मीद,
न किसी से शिकायत,
न किसी से मोह…
जहां मनुष्य के शरीर को
अग्नि के हवाले किया जाता है,
उस स्थान को श्मशान कहते हैं…
लेकिन श्मशान केवल
देह जलाने की जगह नहीं है,
वह है—
चिरंतन शांति का अंतिम पड़ाव।
न वहां दुःख होता है,
न सुख का मोह,
न पैसों के पीछे भागने की होड़,
न रिश्तों की उलझन…
न किसी को खुश करने की कोशिश,
न किसी से प्रेम पाने की अपेक्षा…
जिस शांति के लिए इंसान
अपनी पूरी जिंदगी घिसता रहता है,
रोता है, दौड़ता है,
खुद को भूल जाता है…
वही शांति आखिर में
एक मुट्ठी राख में मिल जाती है।
सबके लिए जीते-जीते
हम अपने ही मन को दुखाते रहते हैं,
सबको खुश रखने की कोशिश में
अपनी ही शांति खो देते हैं…
शरीर थक जाता है,
मन टूट जाता है,
लेकिन संसार की भागदौड़
कभी खत्म नहीं होती।
किसी के लिए कितना भी करो,
कितना भी प्रेम दो,
कितना भी त्याग करो…
फिर भी कभी न कभी
इसी संसार के लोग
आपकी उपेक्षा कर देते हैं।
शायद इसी का नाम संसार है…
लेकिन सवाल यह नहीं है
कि मृत्यु के बाद शांति मिलेगी या नहीं?
वह तो मिलनी ही है…
सवाल सिर्फ इतना है—
क्या हम जीवित रहते हुए
अपने मन को थोड़ी-सी शांति देंगे?
क्योंकि सच्चा इंसान वह नहीं
जो संसार छोड़ने के बाद शांत हो गया…
सच्चा इंसान वह है
जो संसार में रहते हुए भी
अपने मन की शांति बचाकर रखता है।
मोह रखता है,
लेकिन उसमें बंधता नहीं…
प्रेम करता है,
लेकिन खुद को खोता नहीं…
कर्तव्य निभाता है,
लेकिन अपने अस्तित्व को
राख नहीं होने देता…
क्योंकि आखिर में
श्मशान में मिलने वाली शांति
चिरंतन होती है…
लेकिन मुझे लगता है—
उस चिरंतन शांति से पहले
जीते-जी मिले
दो पल की सच्ची शांति ही
इस बात की निशानी है
कि हमने जिंदगी सच में जी है।
इसलिए इतना मत दौड़ो
कि खुद को ही पीछे छोड़ दो…
जियो…
प्रेम करो…
कर्तव्य निभाओ…लेकिन कभी-कभी
इस दुनिया की भीड़ से बाहर निकलो,
अपने पास बैठो…
और खुद से पूछो—“जिस शांति के लिए
मृत्यु की प्रतीक्षा करनी पड़ती है,
उस शांति को
मैं जीते-जी ही
क्यों न खोज लूं?” — विचारक कविता
